योगी आदित्यनाथ और हिमंत बिस्वा सरमा की तरह अपराध पर सख्त कार्रवाई की राजनीति क्या अब पश्चिम बंगाल में भी जड़ें जमा रही है? बारुईपुर और गाइघाटा की घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की कार्यशैली को लेकर बंगाल में यही चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है. रेप के आरोपियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस, एनकाउंटर को लेकर छिड़ी बहस और महिलाओं की सुरक्षा को केंद्र में रखकर शुभेंदु अधिकारी ने राज्य की राजनीति में नया विमर्श खड़ा कर दिया है. भाजपा समर्थक इसे अपराध के खिलाफ निर्णायक नेतृत्व की पहचान बता रहे हैं, जबकि विपक्ष मानवाधिकार, न्यायिक प्रक्रिया और पुलिस कार्रवाई की सीमाओं पर सवाल उठा रहा है. ऐसे में मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि बंगाल में भाजपा के उस राजनीतिक मॉडल का भी बन गया है, जो वर्षों से उत्तर प्रदेश और असम में उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता रहा है.
बारुईपुर से गाइघाटा तक एक ही संदेश
दक्षिण 24 परगना के बारुईपुर से लेकर उत्तर 24 परगना के गाइघाटा तक हुए दो एनकाउंटर ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विमर्श खड़ा कर दिया है. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन दोनों मामलों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि रेप और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनकी सरकार का रुख पूरी तरह जीरो टॉलरेंस वाला होगा. जुलाई और फिर अक्टूबर में हुई घटनाओं के बाद अब चर्चा सिर्फ कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मॉडल की भी होने लगी है जिसकी तुलना उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और असम में हिमंत बिस्वा सरमा की सख्त प्रशासनिक शैली से की जा रही है.
वाम राजनीति बनाम सख्त कार्रवाई का मॉडल
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा से प्रभावित रही है. वाम दलों का मानना रहा है कि अत्यधिक पुलिस कार्रवाई और राज्य शक्ति का आक्रामक इस्तेमाल मानवाधिकारों के लिए खतरा बन सकता है.
यही वजह है कि शुभेंदु के कदमों को राष्ट्रीय भाजपा मॉडल के विस्तार के रूप में भी देखा जा रहा है.
बंगाल में योगी मॉडल का असर कितना?
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की पहचान अपराध और माफिया के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई से जुड़ी रही है. भाजपा का दावा है कि उनकी सरकार ने माफिया नेटवर्क और बाहुबलियों पर लगाम लगाई. पार्टी लंबे समय से यह आरोप लगाती रही है कि मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में उत्तर प्रदेश में 'माफिया राज' की धारणा मजबूत हुई थी और कई अपराधी राजनीतिक संरक्षण के कारण बच निकलते थे. योगी आदित्यनाथ ने इसी धारणा को चुनौती देते हुए अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को अपनी राजनीतिक पहचान बनाया.
शुभेंदु क्यों आ रहे हैं उसी फ्रेम में?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी अब पश्चिम बंगाल में कुछ वैसी ही राजनीतिक लाइन अपनाते दिखाई दे रहे हैं. भाजपा के कोर वोटर के लिए यह संदेश स्वाभाविक रूप से आकर्षक हो सकता है. साथ ही यह मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है. इससे व्यापक राजनीतिक बहस भी पैदा हो रही है. चाहे समर्थन मिले या विरोध, दोनों ही स्थितियों में चर्चा का केंद्र शुभेंदु अधिकारी और उनकी राजनीति बन रहे हैं. भाजपा के लिए यह स्थिति राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकती है.
विपक्ष क्यों उठा रहा है सवाल?
सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा है कि उनकी पार्टी बलात्कार के खिलाफ है, लेकिन हर मामले में एनकाउंटर को जरूरी नहीं मानती. उनका तर्क है कि इस तरह की कार्रवाई से कई बार यह आशंका पैदा होती है कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ हुई हो. हालांकि जिस घटना को लेकर विवाद चल रहा है, उसमें आरोपी को पुलिस वाहन में ले जाया जा रहा था और उसी दौरान पुलिस कार्रवाई हुई. यही वजह है कि मामला अब केवल अपराध या कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और पुलिस कार्रवाई की सीमाओं पर भी बहस का विषय बन गया है.
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शुभेंदु को मिल सकते हैं तीन राजनीतिक फायदे
राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक इस पूरी रणनीति से शुभेंदु अधिकारी को कम से कम तीन बड़े फायदे मिल सकते हैं.
पहला, महिलाओं की सुरक्षा और अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई के मुद्दे पर उन्हें जनसमर्थन मिल सकता है. हालांकि विपक्ष इसकी आलोचना कर रहा है, लेकिन वही विरोध राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ाकर भाजपा को लाभ भी पहुंचा सकता है.
दूसरा, यह रुख भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की राजनीतिक लाइन से पूरी तरह मेल खाता है. अमित शाह और पार्टी नेतृत्व वर्षों से इसी तरह की कानून-व्यवस्था संबंधी राजनीति को बढ़ावा देते रहे हैं.
तीसरा, इस मुद्दे ने शुभेंदु अधिकारी से जुड़े दूसरे विवादों को राजनीतिक चर्चा के केंद्र से पीछे धकेल दिया है. जिन सवालों पर पहले बहस होती थी, अब उनकी जगह महिलाओं की सुरक्षा और अपराध पर कार्रवाई की चर्चा ने ले ली है.
कोलकाता चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक संदेश
नवंबर में संभावित कोलकाता नगर निगम चुनाव को देखते हुए यह रणनीति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. शुभेंदु अधिकारी लगातार ऐसी छवि बनाने में जुटे हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनकी सरकार किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी.भाजपा के लिए यह छवि चुनावी राजनीति में बड़ा हथियार बन सकती है. खासकर तब, जब पार्टी बंगाल में अपना जनाधार बढ़ाने और शहरी क्षेत्रों में राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रही हो. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शुभेंदु अधिकारी वास्तव में योगी आदित्यनाथ और हिमंत बिस्वा सरमा की तरह अपराध पर सख्ती वाली राजनीति को राज्य में स्थापित कर रहे हैं, या फिर यह आगामी चुनावों से पहले तैयार किया जा रहा एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव है. फिलहाल इतना जरूर है कि बारुईपुर से गाइघाटा तक की घटनाओं ने बंगाल की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है.
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