दीवार, क्रांति, चांदनी, हम दिल दे चुके सनम और बागबान जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के प्रॉड्यूशर-डिस्ट्रीब्यूटर रहे घनश्याम दास जैन के सम्मान में डाक डिकट और स्मारक सिक्का जारी होने वाला है. 17 अक्टूबर को घनश्याम दास जैन की जन्मशती के मौके पर राजधानी दिल्ली में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित जा रहा है. जिसमें उनके संगीत, समाजसेवा और फिल्म के क्षेत्र में किए गए योगदान को सम्मानित किया जाएगा. फिल्म इंडस्ट्री से इतर घनश्याम दास जैन ने संगीत की दुनिया में भी बड़ा नाम कमाया था. उन्हें संगीत सम्राट की उपाधि भी मिली थी.
17 अक्टूबर को दिल्ली में होगा कार्यक्रम
17 अक्टूबर को दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम में घनश्याम दास जैन की 101 कृतियों पर आधारित विरासत ग्रंथ "संगीतमय विरासत: एक शताब्दी" का लोकार्पण भी होगा. जिसमें उनके गीतों और नाटकों का विशाल संकलन है. साथ ही भारत सरकार द्वारा स्वीकृत 100 रुपये का स्मारक सिक्का और 5 रुपये का स्मारक डाक टिकट भी जारी किया जाएगा.
1925 में अविभाजित भारत के मुल्तान में जन्मे घनश्याम दास जैन बचपन से ही विलक्षण संगीत प्रतिभा के धनी थे. मात्र पांच साल की उम्र में उन्होंने संगीत साधना शुरू कर दी थी और 12 वर्ष की उम्र में संगीत सिखाने लगे थे. उन्हें हारमोनियम, बांसुरी, तबला और वायलिन सहित कई वाद्ययंत्रों पर महारत हासिल थी.
भारत-पाक विभाजन के समय कई जैन और हिंदूओं को मुंबई पहुंचाया
संगीत और फिल्म की दुनिया से इतर घनश्याम दास जैन ने समाजसेवा के क्षेत्र में भी कई उल्लेखनीय काम किए. 1947 के भारत-पाक विभाजन के दौरान उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर सैकड़ों जैन और हिंदू शरणार्थियों को पाकिस्तान से सुरक्षित मुंबई पहुंचाया. विभाजन में अपनी पूरी संपत्ति गंवाने के बावजूद उन्होंने फिर से अपना साम्राज्य खड़ा किया. बाद में वे भारतीय फिल्म उद्योग के प्रमुख निर्माता और वितरक बने.
टी. नवीन फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन और मैग्नम फिल्म्स जैसे बैनरों के माध्यम से घनश्याम दास जैन ने कई बड़ी फिल्में बनाई. फिल्मों का वित्तपोषण और वितरण किया. उनकी सफलताओं के कारण फिल्म पत्रिका ट्रेड गाइड ने घनश्याम दास जैन को जैकपॉट डिस्ट्रीब्यूटर की उपाधि दी थी.

संगीत सम्राट घनश्याम दास जैन.
सर्प-दंश से बचे, फिर धर्मार्थ कार्यों में लगे
उनका जीवन एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव से भी जुड़ा रहा. साल 1950-51 के आसपास गुजरात के पवित्र शत्रुंजय तीर्थ से लौटते समय उन्हें विषैले सांप ने काट लिया था और डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था. अपनी आत्मकथा "सर्प-दंश" में उन्होंने उल्लेख किया है कि उनके आध्यात्मिक गुरु पंजाब केसरी आचार्य श्री विजय वल्लभ सूरीश्वर जी की कृपा से उन्हें पुनर्जीवन मिला.
इस आध्यात्मिक पुनर्जन्म के बाद उन्होंने अपना जीवन परोपकार को समर्पित कर दिया. उन्होंने अपनी आय का बड़ा हिस्सा धर्मार्थ कार्यों, अस्पतालों और मंदिर निर्माण के लिए दान किया. धार्मिक संगीत प्रस्तुतियों के लिए उन्होंने कभी पारिश्रमिक या उपहार स्वीकार नहीं किया. अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने 1980 और 1990 के दशक में "जैन कुशल युवक मंडल" और "सरगम मंडल" जैसी कई युवा एवं महिला संस्थाओं की स्थापना की.
1 दिसंबर 1997 को घनश्याम दास जैन का निधन हो गया, लेकिन उनकी सेवा और समर्पण की विरासत आज भी जीवित है. वर्ष 2013 में नई दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन में उनके नाम पर एक प्रमुख सड़क का नाम "श्री घनश्याम दास जैन मार्ग" रखा गया.
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