आने वाला नवंबर का महीना देश की राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है. एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में INDIA गठबंधन 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में 'वोट बचाओ, देश बचाओ' महारैली करने जा रहा है, जिसमें 10 लाख लोगों तक के जुटने का दावा किया जा रहा है. दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने भी 1 नवंबर से 30 नवंबर तक देशव्यापी पदयात्रा और जनसंपर्क अभियान का ऐलान कर दिया है. दिलचस्प बात यह है कि दोनों खेमे लोकतंत्र, जनता और चुनावी प्रक्रिया के मुद्दे को ही केंद्र में रखकर मैदान में उतर रहे हैं. ऐसे में नवंबर सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रमों का महीना नहीं, बल्कि NDA और INDIA गठबंधन के बीच नैरेटिव, जनसमर्थन और राजनीतिक प्रभाव की सीधी लड़ाई का महीना बनता दिख रहा है.
खरगे का 'चलो दिल्ली' बनाम शाह का 'चलो जनता के बीच'
इस सुपर मुकाबले की सबसे बड़ी खूबी दोनों खेमों के बिल्कुल अलग नारे और रणनीतियां हैं. विपक्षी गठबंधन के नेता मल्लिकार्जुन खरगे का नारा है 'चलो दिल्ली', जिसका उद्देश्य देश भर के कार्यकर्ताओं को राजधानी के केंद्र में इकट्ठा करके अपनी एकजुटता और ताकत का अहसास कराना है. इसके विपरीत, गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी का नारा है 'चलो जनता के बीच', जिसके तहत किसी एक मैदान में भीड़ जुटाने के बजाय पार्टी के तमाम मंत्री, मुख्यमंत्री और बड़े नेता सीधे जनता की चौखट पर जाएंगे. यह मुकाबला इस बात का फैसला करेगा कि दिल्ली के मंच से उठने वाली आवाज देश भर में ज्यादा गूंजेगी, या फिर घर-घर जाकर सीधे लोगों से किया जाने वाला जनसंपर्क बाजी मारेगा?
बीजेपी की एक महीने की पदयात्रा: अमित शाह संभालेंगे कमान
इस अभियान की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद इसकी अगुवाई करते नजर आएंगे. शाह 2 नवंबर को हैदराबाद और 5 नवंबर को हरियाणा में पदयात्राओं में हिस्सा लेंगे. इसके अलावा पार्टी ने विभिन्न राज्यों में वरिष्ठ नेताओं की तैनाती की योजना बनाई है, ताकि नवंबर भर अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार राजनीतिक गतिविधियां चलती रहें.
ऐसे में जहां कांग्रेस और उसके सहयोगी दल रामलीला मैदान में शक्ति प्रदर्शन के जरिए राष्ट्रीय संदेश देने की कोशिश करेंगे, वहीं बीजेपी गांव, कस्बों और शहरों तक पहुंचकर अपने पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करेगी.
एक दिन की रैली, एक महीने का अभियान
यही वह बिंदु है जो इस पूरे राजनीतिक मुकाबले को दिलचस्प बनाता है. INDIA गठबंधन का पूरा फोकस 1 नवंबर की 'वोट बचाओ, देश बचाओ' महारैली पर है. विपक्ष चुनाव आयोग, SIR प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए रामलीला मैदान से राष्ट्रीय संदेश देने की तैयारी में है. इसके लिए देशभर से कार्यकर्ताओं और समर्थकों को दिल्ली बुलाया जा रहा है. वहीं बीजेपी की रणनीति अलग है. पार्टी ने मुकाबले को एक दिन तक सीमित रखने के बजाय पूरे नवंबर महीने को राजनीतिक अभियान में बदल दिया है. पदयात्राओं, जनसभाओं और जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए बीजेपी सीधे लोगों तक पहुंचने की कोशिश करेगी. यानी विपक्ष जहां राजधानी में एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन करेगा, वहीं बीजेपी पूरे देश में अपनी संगठनात्मक ताकत का प्रदर्शन करने की तैयारी में है.
लोकतंत्र के मुद्दे पर आमने-सामने
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि दोनों खेमे लोकतंत्र की ही बात कर रहे हैं, लेकिन उनके निष्कर्ष बिल्कुल अलग हैं. विपक्ष का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों पर खतरा मंडरा रहा है, इसलिए जनता को सड़कों पर उतरना चाहिए. वहीं बीजेपी का दावा है कि विपक्ष बेबुनियाद आशंकाएं पैदा कर रहा है और जनता के बीच जाकर सच रखा जाएगा. यानी असली लड़ाई सिर्फ भीड़ जुटाने की नहीं है. सवाल यह है कि जनता के बीच किस पक्ष का राजनीतिक संदेश ज्यादा प्रभाव छोड़ता है और किसका नैरेटिव ज्यादा स्वीकार्य बनता है.
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NDA-INDIA की पहली बड़ी सड़क वाली लड़ाई?
दिलचस्प बात यह है कि लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला मौका होगा जब INDIA गठबंधन और NDA दोनों लगभग एक ही समय में जमीनी स्तर पर बड़े राजनीतिक अभियान चलाते नजर आएंगे. विपक्ष चुनाव आयोग, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, जबकि बीजेपी इन आरोपों को खारिज करते हुए सीधे जनता के बीच पहुंचने का अभियान चला रही है. ऐसे में राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ कार्यक्रमों की टक्कर नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति का मूड तय करने वाली शुरुआती लड़ाई के तौर पर भी देख रहे हैं.
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