विज्ञापन

Explainer: क्यों भाजपा की अवध वाली रणनीति में अहम हैं सपा के बागी विधायक, फायदे वाला समीकरण क्या है

अवध के रायबरेली, प्रतापगढ़, उन्नाव, गोंडा, बाराबंकी, लखनऊ, अयोध्या, सीतापुर और प्रयागराज समेत कई जिलों में सवर्ण समुदाय प्रभावशाली भी है.

Explainer: क्यों भाजपा की अवध वाली रणनीति में अहम हैं सपा के बागी विधायक, फायदे वाला समीकरण क्या है
  • यूपी के आगामी चुनावों में कई बागी विधायक समाजवादी पार्टी से भाजपा में शामिल होकर पार्टी की ताकत बढ़ा रहे हैं
  • अवध क्षेत्र में भाजपा को जातीय समीकरण के आधार पर ब्राह्मण और राजपूत वोटरों से समर्थन मिलने की संभावना है
  • भाजपा के लिए अवध की सीटें महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है
लखनऊ:

उत्तर प्रदेश में चुनाव कुछ महीने ही दूर है और अब बिसात बिछने लगी है. धर्मेंद्र कश्यप और राजपाल सैनी जैसे नेता सपा में शामिल हुए हैं तो वहीं अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह और विनोद चतुर्वेदी शामिल हैं. इससे पहले मनोज पांडेय और पूजा पाल भी भाजपा में आ गए हैं. विनोद चतुर्वेदी जालौन से विधायक हैं, लेकिन बाकी सभी अवध या उसके आसपास के ही इलाकों के हैं. ये वे विधायक हैं, जो 2024 के राज्यसभा चुनाव में बागी हुए थे. कुल 7 विधायकों में से मनोज पांडेय और पूजा पाल पहले ही भाजपा में आ गए थे. माना जा रहा है कि भाजपा के लिए यह अहम है. 

ऐसा इसलिए क्योंकि अवध में लंबे समय तक कांग्रेस मजबूत थी और 2014 के बाद से ही उसने खुद को यहां स्थापित कर लिया है. इसके अलावा भाजपा को यहां का सामाजिक समीकरण भी अपने पक्ष में दिखता है. पूजा पाल प्रयागराज की चायल सीट से विधायक हैं. यहां भाजपा को हराकर ही वह जीती थीं. इस बार यदि वह भाजपा के टिकट पर जीतीं तो पार्टी को एक अतिरिक्त सीट मिलेगी. इसी तरह ऊंचाहार के विधायक मनोज पांडेय तो अब कैबिनेट मंत्री भी हैं. सपा सरकार में भी वह मंत्री थे और उनका कद तेजी से बढ़ा है. ऐसे में उनकी एंट्री पार्टी को एक और अतिरिक्त सीट दिला सकती है. वह ऊंचाहार में काफी मजबूत माने जाते हैं. 

इस तरह भाजपा को अवध में ऐसी सीटों पर इन बागियों के जरिए जीत की उम्मीद जगी है, जहां वह कमजोर है या फिर लंबे समय से वहां जीती नहीं है. एक वजह यह भी है कि यहां जातीय समीकरण भी भाजपा को अपने पक्ष में लगता है. जाति के हिसाब से देखें तो अवध प्रदेश में ऊंची जातियों की आबादी कुल वोटरों का एक-चौथाई से थोड़ा ज़्यादा है. यह आंकड़ा सूबे के अन्य हिस्सों के मुकाबले थोड़ा अधिक है. इनमें अकेले ब्राह्मण 11 फीसदी हैं और राजपूत 7.8% हैं. अवध क्षेत्र में सवर्ण मतदाताओं में विशेषकर ब्राह्मणों और क्षत्रियों की संख्या अच्छी खासी है.

अवध में दूसरे इलाकों के मुकाबले सवर्ण अधिक 

यही नहीं रायबरेली, प्रतापगढ़, उन्नाव, गोंडा, बाराबंकी, लखनऊ, अयोध्या, सीतापुर और प्रयागराज समेत कई जिलों में वे प्रभावशाली भी हैं. राजनीतिक दल इस वर्ग को साधने के लिए हमेशा से यहां विशेष रणनीति बनाते रहे हैं. इस इलाके में OBC कुल वोटरों का 32% हैं और इनमें अति पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी 12.3% है. पिछड़ी जातियों में ज़्यादा संपन्न लोगों में यादव 12.1%, कुर्मी 4.1% और लोध 3.2% हैं. अति पिछड़ा वर्ग में कई अलग-अलग समूहों से मिलकर बने हैं, जिनमें मौर्य/कुशवाहा/शाक्य, निषाद, सैनी, कहार, लोहार, सुनार, नाई, कलवार, माली, नोनिया और पाल शामिल हैं, जो इस इलाके के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं.

दलित वोटों में भी यहां भाजपा की कैसे मजबूत हुई पैठ?

भाजपा को यहां दलित वर्ग में भी एक उम्मीद इसलिए दिखती है क्योंकि जाटवों के अलावा पासी समाज की भी अच्छी संख्या है. पासी वोटर बीते कई चुनावों से भाजपा के पक्ष में रहा है. पासी फैक्टर अवध क्षेत्र में वास्तविक 'गेमचेंजर' जाना जाता है, जिसमें ज्यादातर लखनऊ, बाराबंकी, अयोध्या, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली और प्रतापगढ़ शामिल हैं. इस क्षेत्र में कुल दलित आबादी का लगभग 50% पासी हैं. इसके अलावा जाटव मतदाता भी यहां अच्छी संख्या में हैं, लेकिन पासी बहुलता इस क्षेत्र की दलित राजनीति की मुख्य विशेषता है.
 

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
UP News, UP News Hindi, Up Election News, Up Election News 2027, Up Election News In Hindi
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com