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'थारा फूफा जिंदा है' वाले 106 वर्षीय दूलीचंद का निधन, 102 साल की उम्र में दूल्हा बनकर हिलाया था सरकारी सिस्टम

हरियाणा के रोहतक के 106 वर्षीय दुलीचंद का निधन हो गया. वही दुलीचंद जिन्होंने पेंशन बंद होने पर 102 साल की उम्र में दूल्हा बनकर 'थारा फूफा जिंदा है' आंदोलन चलाया था. उनके संघर्ष के बाद न सिर्फ उनकी बल्कि कई अन्य लोगों की पेंशन भी बहाल हुई थी.

'थारा फूफा जिंदा है' वाले 106 वर्षीय दूलीचंद का निधन, 102 साल की उम्र में दूल्हा बनकर हिलाया था सरकारी सिस्टम

हरियाणा के रोहतक जिले में सरकारी सिस्टम की लापरवाही के खिलाफ 'थारा फूफा जिंदा है' का नारा बुलंद करने वाले 106 वर्षीय बुजुर्ग दूलीचंद का निधन हो गया है. शनिवार शाम को उन्होंने अपने पैतृक गांव गांधरा स्थित घर पर अंतिम सांस ली. रविवार को गमगीन माहौल में गांधरा गांव में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां उनके बड़े बेटे ने उन्हें मुखाग्नि दी. अपने पीछे 10 बच्चों और करीब 70 सदस्यों का भरा-पूरा परिवार छोड़ने वाले दूलीचंद का जाना केवल एक बुजुर्ग का जाना नहीं है, बल्कि उस आवाज का खामोश होना है जिसने अपने अनोखे अंदाज से सोए हुए सिस्टम को जगाने का काम किया था. 'थारा फूफा जिंदा है' का उनका नारा सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही के खिलाफ आम आदमी की लड़ाई का प्रतीक बन गया था. 

102 साल की उम्र में दूल्हा बनकर निकाली थी अनोखी बारात

यह पूरा संघर्ष करीब चार साल पहले मार्च 2022 में शुरू हुआ था, जब अधिकारियों ने रिकॉर्ड में बड़ी लापरवाही बरतते हुए जीवित दूलीचंद को मृत घोषित कर दिया और उनकी बुढ़ापा पेंशन बंद कर दी. परिवार के अनुसार, उनकी आखिरी पेंशन 2 मार्च 2022 को आई थी, जिसके बाद वे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहे पर कोई सुनवाई नहीं हुई. आखिरकार, दूलीचंद ने सामाजिक कार्यकर्ता नवीन जयहिंद के संपर्क में आकर एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार की.

Thara Fufa Zinda Hai Dulichand: 102 साल की उम्र में अनोखा विरोध करके रोहतक के दुलीचंद ने सिस्टम को हिला दिया था.

Thara Fufa Zinda Hai Dulichand: 102 साल की उम्र में अनोखा विरोध करके रोहतक के दुलीचंद ने सिस्टम को हिला दिया था.

102 साल की उम्र में सेहरा सजाकर, शेरवानी पहनकर, आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए और हाथ में फरसा व लाठी लिए वे रथ पर सवार हुए. रोहतक की सड़कों से होते हुए जिला उपायुक्त कार्यालय तक उनकी अनोखी बारात निकाली गई, जिसमें कई ऐसे बुजुर्ग भी शामिल हुए जो कागजों में 'मृत' घोषित कर दिए गए थे

आंदोलन का बड़ा असर: दोबारा शुरू हुई पेंशन  

दूलीचंद के हाथों में लहराती 'मैं जिंदा हूं' और 'थारा फूफा जिंदा है' की तख्तियों ने पूरे देश का ध्यान खींचा. इस अनोखे और कड़े विरोध प्रदर्शन का असर यह हुआ कि सोए हुए प्रशासन को जागना पड़ा. अधिकारियों ने इसके तुरंत बाद विशेष कैंप लगाए, जिसमें न केवल दूलीचंद बल्कि उनके जैसे सैकड़ों प्रभावित बुजुर्गों, विधवा महिलाओं और दिव्यांगजनों की पेंशन संबंधी समस्याओं का समाधान किया गया. इस आंदोलन के बाद दूलीचंद समेत अन्य पात्र लाभार्थियों की रुकी हुई पेंशन दोबारा शुरू हो सकी और यह संघर्ष उन सभी मूक नागरिकों के लिए एक बड़ी आवाज बन गया जो सरकारी दफ्तरों की लालफीताशाही का शिकार होते हैं.

नारे से प्रेरित होकर बनी फिल्म पहुंची कोर्ट के चौखट

दूलीचंद के इस अनूठे आंदोलन और उनके चर्चित नारे से प्रेरित होकर फिल्म निर्देशक संजय भसीन ने एक हरियाणवी फिल्म बनाई थी, जो बाद में कानूनी विवाद का कारण बन गई. दूलीचंद और नवीन जयहिंद ने आरोप लगाया कि फिल्म निर्माताओं ने उनकी अनुमति के बिना उनके वास्तविक जीवन और संघर्ष से जुड़ी सामग्री और नारों को चुराया है. इस मामले को लेकर दूलीचंद ने अदालत का रुख किया था, जहां निर्देशक सहित 12 लोगों के खिलाफ याचिका दायर की गई थी. यह कानूनी मामला वर्तमान में भी अदालत के सामने विचाराधीन है.

70 सदस्यों का विशाल कुनबा और उम्र का रहस्य

दूलीचंद अपने पीछे एक बेहद भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं, जिसमें उनके छह बेटे और चार बेटियां शामिल हैं. ये सभी विवाहित हैं. उनके परिवार में लगभग 40 पौत्र-पौत्रियां और करीब 20 पड़पौत्र-पड़पौत्रियां हैं. जिससे पूरा कुनबा लगभग 70 सदस्यों का बनता है. सरकारी दस्तावेजों के अनुसार उनकी उम्र 106 वर्ष दर्ज थी, जबकि गांधरा गांव के लोगों का कहना है कि उनकी वास्तविक उम्र लगभग 108 वर्ष हो चुकी थी. ग्रामीणों के अनुसार, वे अंतिम समय तक पूरी तरह स्वस्थ थे और उन्हें कोई गंभीर बीमारी नहीं थी.दुलीचंद की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग की पेंशन बहाल कराने की कहानी नहीं है. यह उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें एक आम नागरिक ने व्यवस्था की गलती को स्वीकार करने से इनकार किया और पूरे सिस्टम को अपनी मौजूदगी का एहसास कराया. 'थारा फूफा जिंदा है' आज भी एक नारे से ज्यादा सरकारी लापरवाही के खिलाफ नागरिक आवाज की ताकत का प्रतीक माना जाता है.
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