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करप्शन केस में बिचौलियों पर शिकंजा, हाईकोर्ट बोला- प्राइवेट व्यक्ति पर भी लागू होगा भ्रष्टाचार निवारण कानून

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केवल सरकारी कर्मचारी नहीं बल्कि निजी व्यक्ति भी भ्रष्टाचार में शामिल पाए जाने पर मुकदमा चल सकता है.

करप्शन केस में बिचौलियों पर शिकंजा, हाईकोर्ट बोला- प्राइवेट व्यक्ति पर भी लागू होगा भ्रष्टाचार निवारण कानून
भ्रष्टाचार के मामले में किसान को राहत देने वाला आदेश रद्द, बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला
  • बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में निजी व्यक्तियों को भी दंडनीय करार दिया है
  • कोई व्यक्ति सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार में मदद या साजिश में शामिल होता है तो उस पर मुकदमा चल सकता है
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी का सरकारी कर्मचारी होना आवश्यक नहीं है, भ्रष्टाचार में संलिप्तता ही मुख्य आधार
मुंबई:

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) को लेकर एक अहम कानूनी व्यवस्था दी है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई निजी व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार करने में मदद करता है, उसे उकसाता है या आपराधिक साजिश में शामिल होता है, तो उसके खिलाफ भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. इसके लिए आरोपी का सरकारी कर्मचारी होना जरूरी नहीं है.

सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा सकता कि वह सरकारी कर्मचारी नहीं!

जस्टिस महरोज पठान की पीठ ने यह फैसला मौदा के एक किसान से जुड़े मामले में सुनाया. अदालत ने उस सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें किसान को केवल इस आधार पर आरोपमुक्त कर दिया गया था कि वह सरकारी कर्मचारी नहीं है. कोर्ट ने माना कि किसान को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा सकता कि वह सरकारी कर्मचारी नहीं है. अगर कोई भी शख्‍स भ्रष्‍टाचार में शामिल है, तो उसे सजा मिलेगी. सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक ये नियम लागू नहीं है.  

पी. नल्लाम्माल बनाम राज्य मामले का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पी. नल्लाम्माल बनाम राज्य मामले का हवाला दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-12 के तहत भ्रष्टाचार से जुड़े अपराध को बढ़ावा देने, उसमें सहायता करने या उकसाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. इस धारा के तहत तीन से सात साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है. यह प्रावधान तब भी लागू हो सकता है, जब मूल अपराध वास्तव में घटित न हुआ हो.

हाईकोर्ट ने मामले को नए सिरे से मेरिट के आधार पर तय करने के लिए अतिरिक्त सत्र न्यायालय को वापस भेजा है और 2016 से लंबित इस मामले को 8 महीने के भीतर निपटाने का निर्देश दिया है.

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