एक तरफ दिल्ली पुलिस सुनंदा पुष्कर के विसरा को जांच के लिे विदेश भेजने की तैयारी कर रही है तो वहीं दूसरी ओर जाने माने फोरेंसिक एक्सपर्टस मानते हैं कि मौत के एक साल बाद उठाए गए इस कदम के नतीजे शायद ही निकले। उनके मुताबिक अब बहुत देर हो चुकी है।
दरअसल एम्स ने अपनी रिपोर्ट में जिन छह तरह के जहरों का हवाला देकर कहा था कि उनकी जांच भारत में नहीं हो सकती, उनमें मेटालिक रेडियोएक्टिव जहर थैलियम और पोलोनियम भी हैं।
हालांकि एक्सपर्टस मानते हैं कि सालभर बाद दुनिया के किसी भी लैब में ज़हर की पहचान नामुमकिन है।
करीब 25,000 हजार पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार कर चुके जाने माने फोरेंसिक एक्सपर्ट के एल शर्मा का कहना है कि अगर डॉक्टरों को यह शक है कि किसी के शरीर में मेटालिक रेडियोएक्टिव जहर हो सकता है तो पोस्टमार्टम के वक्त ही शरीर के एक्सरे के जरिए इसकी पहचान हो सकती है, लेकिन विसरा सैंपल लेने के बाद इस तरह का जहर धीरे धीरे सैंपल से खत्म हो जाता है और फिर दुनिया की कोई भी फोरेंसिक लैब इसकी जांच नहीं कर सकती।
एक्सपर्ट के मुताबिक, दुनिया के अहम ज़हरों में कोरोसिव, मेटालिक, सोमनीफेरस, वेजिटेबल और वेनम हैं। कई बार अलग-अलग दवाएं खा लेने से भी ज़हर बन जाता है। थैलियम और पोलोनियम की जांच पोस्टमार्टम के वक्त एक्स-रे से हो सकती है।
लेकिन एम्स के डॉक्टरों ने ऐसा नहीं किया इस बात पर भी सवाल उठ रहे हैं कि सुनंदा पुष्कर सरीखी हाइप्रोफाइल हस्ती के विसरा जांच में एक साल कैसे लग गया।
जाने माने मेडिको लीगल एक्सपर्ट आर एल शर्मा का कहना है कि सुनंदा का विसरा पहले सीएफएसएल में जांच के लिए गया उसके विसरा सैंपल कितना बचा होगा और कैसा होगा इसे लेकर भी सवाल हैं उनका कहना है कि अगर विसरा सैंपल की जांच में बहुत देरी हो जाय तो कई तरह के जहर अपने आप ही खत्म हो जाते हैं और दिल्ली में ऐसी कई विसरा रिपोर्ट आई है, जिनके नतीजें कुछ नहीं निकले।
शर्मा कहते हैं कि एक विसरा सैंपल की जांच में महज 3 घंटे लगते हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि आखिर सुनंदा जैसे हाइप्रोफाइल मामले की विसरा जांच में एक साल क्यों लगाया गया। इतना ही नहीं फोरेंसिक एक्सपर्ट आशंका जता रहे हैं कि अगर सुनंदा को ज़हर दिया गया तो कोई बिना स्वाद और बिना गंध वाले ज़हर को खिलाया गया होगा इंजेक्शन के इस्तेमाल की संभावना कम लगती है क्योंकि इंजेक्शन से जहर देने के लिए कई लोगों की जरूरत होगी।
के एल शर्मा का कहना है कि सुनंदा के हाथ में जो दांत से काटने का निशान है उसका माउल्ड यानि उसके नमूने लेना जरूरी था, क्योंकि शक के दायरे में आए लोगों के दांत का इम्प्रेशन लेकर दोनों का मिलान किया जा सकता है, लेकिन इस केस में ऐसा कुछ नहीं किया गया।
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