धर्म का अर्थ भीतर की ओर एक कदम है. दुर्भाग्य से बहुत से लोगों के लिए धर्म का मतलब बस किसी खास समूह से जुड़ना रह गया है. इससे लोगों के बीच सिर्फ नफरत, टकराव और अलगाव ही पैदा हुआ है, जो लोग आज साथ हैं, वे जैसे ही खुद को अपने धर्म से जोड़कर देखते हैं, अचानक अलग हो जाते हैं. कल वे एक-दूसरे के घर जला रहे होते हैं. दस मिनट पहले तक उन्होंने ऐसी कोई बात सोची भी नहीं होती. जैसे ही वे किसी धार्मिक समूह से जुड़ते हैं, वे लड़ने को तैयार हो जाते हैं. अगर वे इन समूहों से न जुड़े होते, तो कम से कम उनके पास लड़ने की कोई वजह नहीं होती. हो सकता है कि कुछ लोग निजी वजहों से लड़े, वह अलग बात है, लेकिन लोगों के पूरे समूह के पास लड़ने की कोई वजह नहीं होती और पशु प्रवृत्ति को बड़े पैमाने पर भड़काने वाली ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती.
धर्म को लोगों को दिव्य बनाना चाहिए था, लेकिन यह उन्हें इंसान भी नहीं बना पा रहा है. वे जानवरों जैसे होते जा रहे हैं, क्योंकि जिस पल आप किसी समूह का हिस्सा बनते हैं, आप अपने समूह की रक्षा करना चाहते हैं. यह आपके भीतर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. यह इंसानों की एक बहुत बुनियादी प्रवृत्ति है. एक बार जब आप किसी खास समूह से जुड़े होते हैं, तो आप दूसरे समूह के लिए हमेशा खतरा होते हैं; आप दूसरों के दुश्मन बन जाते हैं. हो सकता है कि आप एक-दूसरे से बात करते हों, एक-दूसरे के साथ ठीक-ठाक रहते हों, लेकिन जैसे ही कुछ सीमाएं पार होती हैं, लड़ाई शुरू हो जाती है.
हमें एक ऐसी दुनिया बनाने की जरूरत है जिसमें व्यक्तियों में और समाज की संस्थाओं में ज्यादा समावेशिता हो और समावेशिता न केवल आध्यात्मिक प्रक्रियाओं की मूल प्रकृति है, बल्कि यह जीवन का आधार और लक्ष्य भी है.
समावेशी चेतना से "समावेशी अर्थव्यवस्था" भी बनेगी, क्योंकि आर्थिक अवसरों की कमी आतंकवाद को बढ़ावा देने की एक बड़ी वजह है. अगर दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकतें "समावेशी अर्थव्यवस्था" बनाने का प्रयास करती हैं, तो युवाओं के उग्रवाद और आतंकवादी गतिविधियों की ओर जाने की एक बड़ी वजह खत्म हो सकती है. शिक्षा में एक बुनियादी बात यह शामिल होनी चाहिए कि स्कूल जाने वाले हर बच्चे को धरती पर पांच प्रमुख धर्मों के मूल सिद्धांतों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए. हम बच्चों के मन में नस्ल, धर्म और राष्ट्रीयता जैसी सीमित पहचानें बैठा देते हैं, जो हिंसा को सही ठहराने का आधार बनती हैं. अब समय आ गया है कि हर बच्चे को "ग्लोबल एंथम" (वैश्विक राष्ट्रगान) सिखाया जाए और उनमें वैश्विक पहचान की भावना विकसित की जाए.
यह ऐसी चीज नहीं है जिसे एक बार ठीक करके उस बारे में भूल जाया जाए. नहीं, इसके लिए लगातार सुधार की जरूरत है. सिर्फ एक ईसा मसीह से काम नहीं चलेगा; सिर्फ एक बुद्ध से काम नहीं चलेगा. कई लोगों की जरूरत है. तभी दुनिया को कुछ हद तक समझदारी की स्थिति में रखने की संभावना है. वरना, लोग चरमपंथ की ओर जाते रहेंगे.
सद्गुरु एक योगी, रहस्यवादी, दूरदर्शी और एक प्रमुख आध्यात्मिक गुरु हैं. एक लेखक, कवि और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त वक्ता के रूप में, सद्गुरु की हाजिरजवाबी और उनका पैना तर्क, जीवन के हमारे बोध को उकसाता है और व्यापक बनाता है.
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