
नीतीश कुमार सेकुलरिज़्म के नाम पर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ खड़े हुए और फिर बीजेपी से अलग होने का फैसला किया। जिस पार्टी के साथ 17 साल तक रहे, गोधरा कांड के वक्त एनडीए सरकार में रेल मंत्री रहे, उस पार्टी में मोदी के उभार के बाद बीजेपी उन्हें कम्युनल नज़र आने लगी।
नीतीश को उम्मीद थी कि ऐसा कर वह बिहार के 18 फ़ीसदी मुसलमानों का दिल जीत लेंगे और उनके लिए चुनावी क़ामयाबी का रास्ता खुल जाएगा। लेकिन उनका गणित कहीं गड़बड़ा गया लगता है। लालू यादव न सिर्फ मुसलमानों की पहली पसंद बन कर उभरे हैं, बल्कि इस चुनाव में उनकी पार्टी आरजेडी, बीजेपी को सीधी टक्कर देने की स्थिति में नज़र आ रही है।
जेडीयू को बड़े नुकसान की आशंका है। उल्टा, जाने-अनजाने कई सीटों पर वह बीजेपी-एलजेपी गठबंधन की जीत की राह बनाती या उसे आसान करती नज़र आ रही है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जेडीयू ने ख़ासतौर पर जहां मुसलमान उम्मीदवार खड़े किए हैं, वहां मुसलमान वोटों का कुछ हिस्सा ही सही, लेकिन बंटने का ख़तरा पैदा हुआ है।
सबसे बड़ा उदाहरण किशनगंज का रहा, जहां से जेडीयू उम्मीदवार अख़्तारुल इमान ने अंतिम समय में अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली – यह कहते हुए कि उनकी उम्मीदवारी से सेकुलर वोट के बंटने का ख़तरा है, जिससे बीजेपी को फ़ायदा होगा। इमान ने कांग्रेस उम्मीदवार असरारुल हक़ के फेवर में अपनी उम्मीदवारी वापस ली। अब हक़ की जीत उम्मीद बढ़ गई है। ज़ाहिर है बीजेपी के दिलीप जायसवाल के लिए मामला कठिन हो गया है।
यह तो रही किशनगंज की बात, लेकिन तमाम सीटों पर ऐसा नहीं हुआ है कि जेडीयू उम्मीदवार अपनी कमज़ोर स्थिति और मुसलमान वोट बंटने का ख़तरा भांप बैठ गए हों। मधुबनी से आरजेडी के अब्दुल बारी सिद्दीक़ी के सामने जेडीयू के ग़ुलाम ग़ौस हैं। पसमांदा मुसलमानों की नुमाइंदगी करने वाले ग़ौस की स्थिति उनके विरोधी वोट कटुआ से अधिक नहीं मानते। वह जितना वोट भी हासिल करेंगे, आरजेडी को उतने ही वोट का नुकसान होगा। इससे बीजेपी के हुकुमदेव नारायण यादव एक बार फिर बाज़ी मार सकते हैं। ऐसा 2009 में हो चुका है, जब कांग्रेस के शकील अहमद और आरजेडी के अब्दुल बारी सिद्दीकी के बीच मुसलमान वोट बंट गया था और हुकुमदेव नौ हज़ार से कुछ अधिक मतों से जीत गए थे।
शिवहर से जेडीयू के उम्मीदवार शाहिद अली खान हैं और आरजेडी के अनवारुल हक़। मुक़ाबला बीजेपी की रामा देवी से है। अनवारूल हक़ रामा देवी को सीधी टक्कर देने की हालत में थे, लेकिन शाहिद अली खान भी मुसलमानों का वोट झटकेंगे, जिससे अंतत: बीजेपी को ही फायदा होगा।
इसी तरह, भागलपुर में जेडीयू के अबू कैसर मैदान में हैं। यहां आरजेडी के बुलो मंडल मुसलमान वोटों को एकजुट करने में पूरी ताक़त लगा रहे हैं, लेकिन अबू क़ैसर को भी मुसलमान वोट जाएगा। इससे बीजेपी के शाहनवाज़ हुसैन को फायदा हो सकता है।
सारण से लालू यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी मैदान में हैं। उनका मुक़ाबल बीजेपी के राजीव प्रताप रूडी से है, लेकिन जेडीयू के सलीम परवेज़ मामले में पेंच फंसा सकते हैं।
यह सच है कि चुनाव में सिर्फ मुसलमान वोट ही काउंट नहीं करता, लेकिन इस चुनाव में जिस तरह से वोटों के ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति देखी जा रही है, उससे मुसलमान वोटों का बंटना या एकजुट रहना चुनाव नतीजे पर बड़ा असर डाल सकते हैं। इस लिहाज़ से देखें तो बिहार की चार सीटों पर जेडीयू के मुस्लिम उम्मीदवार वोट काटते हैं, तो ज़ाहिर है फ़ायदा बीजेपी को होगा।
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