China Education System: भारत में इन दिनों परीक्षाओं में गड़बड़ी और नीट (NEET-UG) पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं का गुस्सा चरम पर है. देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्र सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में बवाल मचा हुआ है. इसी माहौल के बीच मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इंदौर में एक बड़ा बयान दिया है. जीतू पटवारी ने भारत के मौजूदा शिक्षा संकट की तुलना पड़ोसी देश चीन से करते हुए दावा किया कि करीब 20 साल पहले चीन के सामने भी वही चुनौतियां थीं, जो आज भारत झेल रहा है, लेकिन चीन ने समय रहते अपने सिस्टम को बदल डाला. आखिर जीतू पटवारी के इस बयान के मायने क्या हैं और दो दशक पहले चीन के एजुकेशन सिस्टम में ऐसा क्या बड़ा बदलाव हुआ था. आइए समझते हैं.
जीतू पटवारी ने क्या कहा
इंदौर में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में बोलते हुए और बाद में भंवरकुआं चौराहे पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन में शामिल होकर जीतू पटवारी ने कहा, 'चीन ने 20 साल पहले अपने एजुकेशन सिस्टम में बड़े और जरूरी सुधार किए थे. उसी का नतीजा है कि आज चीन दुनिया के सामने खड़ा है.' उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में शिक्षा, कोचिंग और रोजगार जैसे असली मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय समाज को बांटने की राजनीति की जा रही है. पटवारी का दावा है कि अकेले मध्यप्रदेश में करीब 1.90 करोड़ युवा आज बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं, लेकिन सरकार के पास इसका कोई ठोस हल नहीं है.
20 साल पहले चीन के एजुकेशन सिस्टम में क्या हुआ था
चीन ने 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में अपने पूरे एजुकेशन सिस्टम की ओवरहॉलिंग यानी कायाकल्प कर दिया था. उस समय चीन के सामने भी फर्जीवाड़े, खराब क्वालिटी और बेरोजगारी जैसी दिक्कतें थीं. तब चीन ने कई बड़े और कड़े कदम उठाए और वहां का एजुकेशन सिस्टम दुनिया के टॉप सिस्टम में शामिल हो गया है.
चीन ने एजुकेशन को बेहतर बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए
1. प्रोजेक्ट 211 और 985
चीन ने दो दशक पहले अपने दर्जनों विश्वविद्यालयों को वर्ल्ड-क्लास बनाने के लिए सरकारी खजाना खोल दिया. करोड़ों डॉलर का निवेश कर रिसर्च और साइंस को बढ़ावा दिया गया, ताकि चीनी यूनिवर्सिटीज दुनिया की टॉप रैंकिंग में शामिल हो सकें.
2. 1999 में कॉलेज सीटों में भारी बढ़ोतरी
चीन के शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education, PRC) की आधिकारिक रिपोर्ट 'China's education: 40 years of epic achievements' के अनुसार, 1999 में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया. देशभर के कॉलेजों में दाखिले की सीटें 47.4% बढ़ा दीं. उस साल कुल एडमिशन 10.8 लाख से बढ़कर 15,96,800 लाख हो गए. इसके बाद अगले एक दशक में यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया. 1997 में जहां सिर्फ 10 लाख बच्चे कॉलेज जा पाते थे, वहीं 2020 तक यह संख्या 96 लाख सालाना तक पहुंच गई. मकसद ज्यादा से ज्यादा युवाओं को हायर एजुकेशन तक पहुंचाना, ताकि 1997 के एशियाई आर्थिक संकट के बाद बेरोजगारी का दबाव कम हो और देश एक स्किल्ड, नॉलेज-बेस्ड इकॉनमी की तरफ बढ़ सके.
3. गाओकाओ परीक्षा में कड़ाई
चीन की नेशनल कॉलेज एंट्रेंस परीक्षा को गाओकाओ (Gaokao) कहा जाता है. इसमें किसी भी तरह की नकल या पेपर लीक को रोकने के लिए दुनिया के सबसे सख्त कानून बनाए गए. चीन में इस परीक्षा में धोखाधड़ी करने पर कई साल जेल तक की सजा का प्रावधान किया गया.
4. वोकेशनल ट्रेनिंग पर जोर
चीन ने सिर्फ डिग्री बांटने के बजाय स्किल-बेस्ड पढ़ाई पर जोर दिया. उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों को सीधे फैक्ट्रियों और टेक-इंडस्ट्री से जोड़ दिया, जिससे युवाओं को पढ़ाई खत्म होते ही सीधे रोजगार मिलने लगा.
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