- धर्मेंद्र कुमार, जो भारतीय सेना में नायब सूबेदार थे, अपने बेटे का नाम कैप्टन निखिल से प्रेरित होकर रखा था
- निखिल कुमार ने अपने दूसरे प्रयास में सैन्य अधिकारी बनने में सफलता हासिल कर पिता के सपने को पूरा किया है
- निखिल ने आर्मी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की, फुटबॉल में कर्नाटक की अंडर-16 टीम का प्रतिनिधित्व भी किया था
भारतीय सेना में कभी वे कैप्टन निखिल के अधीन कार्यरत थे, जिनकी नेतृत्व क्षमता और सैन्य व्यक्तित्व से वे बेहद प्रभावित हुए. उसी समय उन्होंने तय कर लिया था कि यदि बेटा हुआ, तो उसका नाम 'निखिल' रखेंगे. वर्ष 2002 में बेटा हुआ, तो पिता धर्मेंद्र कुमार ने अपना यह संकल्प पूरा किया. करीब 24 वर्ष बाद वही नाम उनके लिए अपार गर्व का कारण बन गया है.
यह सक्सेस स्टोरी बिहार के नवादा जिले स्थित सकरा गांव के निवासी धर्मेंद्र कुमार के बेटे की है. धर्मेंद्र भारतीय सेना में नायब सूबेदार के पद पर सेवा दे चुके हैं. अपनी सैन्य सेवा के दौरान वे कैप्टन निखिल की प्लाटून में तैनात थे, जो 23 राष्ट्रीय राइफल्स में कार्यरत थे. उनके उत्कृष्ट नेतृत्व और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर धर्मेंद्र ने अपने बेटे का नाम निखिल रखने का निर्णय लिया था.
अब उनके बेटे निखिल कुमार ने अपने दूसरे प्रयास में सैन्य अधिकारी बनने में सफलता प्राप्त कर ली है. बेटे की इस उपलब्धि ने पिता के उस सपने को साकार कर दिया, जिसे उन्होंने अपनी सैन्य सेवा के दौरान देखा था.
चेन्नई OTA की पासिंग आउट परेड में भावुक क्षण
निखिल कुमार की सफलता का सबसे भावुक क्षण 5 सितंबर 2026 को चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी की पासिंग आउट परेड के दौरान देखने को मिला. सैन्य अधिकारी की वर्दी में बेटे को देखकर पिता धर्मेंद्र कुमार की आंखों में गर्व स्पष्ट रूप से झलक रहा था. सैन्य परंपरा के अनुसार, पूर्व नायब सूबेदार पिता ने अपने नए बने अधिकारी बेटे को सैल्यूट किया.
पिता से सैल्यूट मिलने के बाद निखिल ने झुककर उनके चरण स्पर्श किए और आशीर्वाद लिया. इसके पश्चात भावुक पिता ने बेटे को अपने कंधे पर उठा लिया. वर्षों के कड़े परिश्रम, अनुशासन और एक पिता के सपने की पूर्णता का यह दृश्य वहां उपस्थित हर व्यक्ति के लिए अविस्मरणीय बन गया.
आर्मी स्कूल से पढ़ाई, अंडर-16 फुटबॉल खिलाड़ी भी रहे
निखिल कुमार की 12वीं तक की शिक्षा आर्मी स्कूल में संपन्न हुई. पढ़ाई के साथ-साथ वे फुटबॉल में भी सक्रिय रहे और कर्नाटक की अंडर-16 टीम का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु से बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री प्राप्त की. स्नातक पूरा करने के उपरांत निखिल ने सेना में अधिकारी बनने की तैयारी शुरू की. अपने दूसरे प्रयास में उन्हें सफलता मिली और अब वे भारतीय सेना में एक अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं देंगे.
पिता 2015 में हुए रिटायर, कमांडो दस्ते का भी रहे हिस्सा
धर्मेंद्र कुमार ने एनडीटीवी से बातचीत में बताया कि वे वर्ष 2015 में भारतीय सेना से नायब सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए. अपनी सैन्य सेवा के दौरान वे कमांडो दस्ते का हिस्सा भी रहे. सेवानिवृत्ति के पश्चात वे बेंगलुरु में रहते हैं तथा मिलिट्री एवं डिफेंस से जुड़े कार्यों में संलग्न हैं. इसके अलावा वे एक सिक्योरिटी कंपनी में पार्टनर भी हैं. निखिल की माता अर्चना रानी बेंगलुरु में एक निजी शिक्षिका हैं. निखिल परिवार के इकलौते पुत्र हैं.
पिता स्वयं बनना चाहते थे अधिकारी
धर्मेंद्र कुमार ने आगे कहा कि वे स्वयं सैन्य अधिकारी बनना चाहते थे, परंतु उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका था. इसके पश्चात उन्होंने बेटे को अधिकारी बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया. बेटे की पढ़ाई और तैयारी के दौरान उन्होंने उसे अनुशासन तथा लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण की सीख दी. आज निखिल की इस सफलता ने उनके अधूरे सपने को सच कर दिखाया है. विशेष बात यह है कि जिस अधिकारी कैप्टन निखिल से प्रेरित होकर धर्मेंद्र ने अपने बेटे का नाम रखा था, उसी नाम का बेटा आज स्वयं सेना में अधिकारी बन चुका है.
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