भारत के पहले प्राइवेट तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' के पीछे कई सारे इंजीनियरों की दिन रात की मेहनत जुड़ी हुई है. इनमें से एक का नाम पृथ्वी संघानी है. पृथ्वी संघानी स्काईरूट एयरोस्पेस की टीम का हिस्सा थी और उन्होंने विक्रम-1 के ऑटोपायलट और गाइडेंस सिस्टम पर काम किया है. गुजरात के एक किसान परिवार से आनेवाली पृथ्वी संघानी की कहानी उन लाखों छात्रों के लिए प्ररेणादायक है, जो बेशक छोटे से गांव से नाता रखते हों, लेकिन जीवन में कुछ बड़ा बनने का सपना देखते हैं.
पृथ्वी संघानी ने साल 2012 से 2016 के बीच आत्मीय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंसेस से बैचलर्स इन इंजीनियरिंग में पढ़ाई की थी. इसके बाद उन्होंने डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड टेक्नोलॉजी में दाखिला लिया और यहां से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में एमटेक की. काफी कम लोगों को पता होगा कि DIAT DRDO से जुड़ा हुआ ही इंस्टीट्यूट है.
DRDO के साथ किया काम
DIAT से पढ़ाई पूरी करने के बाद पृथ्वी संघानी डीआरडीओ से जुड़ी. यहां पर उन्होंने डिफेंस रिसर्च एंड डेलवेपमेंट लैब में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर अपनी सेवाएं दी. कुछ समय तक डीआरडीओ के साथ काम करने के बाद पृथ्वी संघानी स्काईरूट एयरोस्पेस से जुड़ गई और कंपनी के सबसे खास प्रोजेक्ट्स विक्रम-1 के लिए काम किया. पृथ्वी को विक्रम-1 के ऑटोपायलट और गाइडेंस सिस्टम की जिम्मेदारी दी गई थी, जो कि उन्होंने अच्छे से पूरी की.
बता दें कि स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी हैदराबाद में है, जो कि स्पेस-टेक कंपनी विक्रम सीरीज के रॉकेट बनाने का काम कर रही है. हाल ही में इस कंपनी ने भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल लॉन्च किया है.
क्या है विक्रम-1
स्काईरूट एयरोस्पेस ने हाल ही में 'मिशन आगमन' के तहत विक्रम-1 को लॉन्च किया है. जिसके साथ ही भारत, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन गया, जहां निजी कंपनी ने सफलतापूर्वक रॉकेट को ऑर्बिट में पहुंचाया हो.
विक्रम-1 का नाम भारत के स्पेस प्रोग्राम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर रखा हया है. चार चरणों वाला विक्रम-1 लॉन्च व्हीकल छोटे सैटेलाइट्स के लिए तेज और लॉन्च सर्विस उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है.
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