मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के छोटे से गांव केवड़ाखेड़ी के रहने वाले संजय परमार ने मध्य प्रदेश पुलिस उप निरीक्षक (SI) और सूबेदार परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया है. उनके पिता किसान हैं, जबकि मां गृहिणी हैं. संजय ने शुरुआती पढ़ाई सरस्वती शिशु मंदिर से की. इसके बाद गांव के सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की और फिर जिले के एक्सीलेंस विद्यालय से 12वीं की पढ़ाई पूरी की. किसान के बेटे के इस कारनामे ने पूरे इलाके का नाम रौशन कर दिया है.
पटवारी की नौकरी से पुलिस सेवा तक का सपना
संजय फिलहाल पटवारी के पद पर कार्यरत हैं. नौकरी के दौरान कानून-व्यवस्था से जुड़ी ड्यूटी में उन्हें पुलिस के साथ काम करने का अवसर मिला. इस दौरान उन्होंने SI की जिम्मेदारियों, अधिकारों और कार्यशैली को करीब से देखा. पुलिस सेवा का यह स्वरूप उनकी रुचि से मेल खाता था. उनके बड़े भाई सेना में हैं, इसलिए बचपन से ही उनके मन में रक्षा या पुलिस सेवा में जाने की इच्छा रही.
नौकरी के साथ तैयारी करना आसान नहीं था
पटवारी की नौकरी के साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था. संजय ने पहले अपनी नौकरी की जिम्मेदारियों को समझा और फिर उनमें से पढ़ाई के लिए समय निकालने की योजना बनाई. वीकेंड और ड्यूटी के बीच मिलने वाले खाली समय का इस्तेमाल उन्होंने पढ़ाई में किया. उन्होंने गपशप और घूमने-फिरने से दूरी बना ली. सोशल मीडिया से भी किनारा कर लिया.
रोजाना चार से पांच घंटे पढ़ाई
संजय अपने पटवारी के काम को पहले से ही योजनाबद्ध कर लेते थे और उसी के अनुसार पढ़ाई का समय तय करते थे. कई बार वह सुबह पढ़ाई करके ड्यूटी पर जाते थे, तो कई बार ड्यूटी से लौटने के बाद रात 11 बजे तक पढ़ाई करते थे. हिंदी, समसामयिक घटनाक्रम, कंप्यूटर और इतिहास उनके कमजोर क्षेत्र थे, इसलिए उन्होंने इन विषयों पर विशेष ध्यान दिया.
जेईई और एमपीपीएससी में मिली असफलता
संजय के सफर में असफलताएं भी आईं. वो जेईई एडवांस्ड की परीक्षा पास नहीं कर सके. इसके अलावा एमपीपीएससी में तीन बार इंटरव्यू तक पहुंचने के बावजूद उनका चयन नहीं हुआ. इन असफलताओं ने उन्हें झटका जरूर दिया, लेकिन उन्होंने तैयारी छोड़ने के बजाय खुद को अगली परीक्षा के लिए व्यस्त रखा. इस दौरान परिवार और दोस्तों ने भी उन्हें संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
कई बार लगा, पटवारी की नौकरी तक ही न रुक जाएं
NDTV से बातचीत में संजय ने बताया कि लगातार असफलताओं और नौकरी के चलते पढ़ाई प्रभावित हुई, जिससे कई बार उन्हें लगा कि वह पटवारी की नौकरी तक ही सीमित रह जाएंगे. परिवार और रिश्तेदार भी चाहते थे कि नौकरी मिलने के बाद वह पढ़ाई छोड़ दें. उनसे कहा जाता था कि अब नौकरी लग गई है, इसलिए आगे पढ़ने की जरूरत नहीं है. हालांकि, संजय के मन में आगे बढ़ने की इच्छा थी और उन्होंने तैयारी जारी रखी.
पिता को फोन पर मिली सफलता की सबसे भावुक प्रतिक्रिया
परिणाम आने के बाद संजय ने सबसे पहले अपने पिता को फोन किया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. इसके बाद उन्होंने अपने भाई को फोन किया. कुछ देर बाद दोबारा पिता को फोन किया और इस बार उनसे बात हुई. संजय के मुताबिक, फोन पर पिता की आवाज में भावुकता साफ महसूस हो रही थी. उन्होंने कहा कि उनके पिता ने सालों तक उनके लिए त्याग किया और लोगों के ताने भी सुने. ऐसे में परिणाम का वह पल उनके लिए हमेशा यादगार रहेगा.
संजय परमार की सफलता अचानक नहीं मिली, बल्कि यह कई सालों की तैयारी, असफलताओं और नौकरी के साथ किए गए संतुलन का नतीजा है. पटवारी से लेकर SI परीक्षा के टॉपर बनने तक का उनका सफर लगातार प्रयासों की कहानी है
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