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UPSC में 15वीं रैंक लाने के बाद भी चुना IFS, ऐसे PM मोदी के ट्रांसलेटर बने सिद्धार्थ बाबू

Siddharth Babu IFS Success Story: कोच्चि से आने वाले सिद्धार्थ बाबू पहले एक मैकेनिकल इंजीनियर थे, जिन्होंने यूपीएससी दिया और फिर भारतीय विदेश सेवा में नौकरी शुरू की. ब्रिक्स समिट के दौरान उन्होंने वैश्विक नेताओं के साथ बातचीत में ट्रांसलेटर के तौर पर काम किया.

UPSC में 15वीं रैंक लाने के बाद भी चुना IFS, ऐसे PM मोदी के ट्रांसलेटर बने  सिद्धार्थ बाबू
IFS अधिकारी सिद्धार्थ बाबू की हो रही चर्चा

BRICS समिट के बाद भारतीय विदेश सेवा (IFS) के अधिकारी सिद्धार्थ बाबू एक बार फिर चर्चा में हैं. उन्होंने इस दौरान पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातों को ट्रांसलेट करने का काम किया. इसके अलावा पुतिन समेत दूसरे वैश्विक नेताओं और पीएम मोदी के बीच भी उन्होंने ब्रिज का काम किया. दुनिया के इन सबसे बड़े नेताओं के इतने करीब रहने के बाद सिद्धार्थ बाबू की खूब चर्चा हो रही है और वो सोशल मीडिया आइकन बन चुके हैं. इससे पहले गणतंत्र दिवस परेड के दौरान भी वो चर्चा में आए थे, इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी और  यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन के बीच बातचीत का अनुवाद किया था. ऐसे में आज हम आपको सिद्धार्थ बाबू की सक्सेस स्टोरी बताने जा रहे हैं. 

कौन हैं सिद्धार्थ बाबू?

सिद्धार्थ बाबू 2017 बैच के IFS अफसर हैं. उन्होंने यूपीएससी में 15वीं रैंक हासिल की, लेकिन IAS चुनने की बजाय विदेश सेवा में जाने का फैसला लिया. इससे पहले वो एक मैकेनिकल इंजीनियर थे और कुछ प्राइवेट कंपनियों में भी नौकरी कर चुके थे. हालांकि उनकी इंटरनेशनल अफेयर्स में काफी दिलचस्पी थी, जिसकी वजह से उन्होंने यूपीएससी दिया और फिर IFS अधिकारी बने. उनकी पहली पोस्टिंग चीन में हुई थी. 

कैसे बने पीएम के ट्रांसलेटर?

वैश्विक नेताओं के साथ रहकर उनका ट्रांसलेटर बनने का मौका हर किसी को नहीं मिलता है. हर IFS अधिकारी को ऐसे चांस मिलना काफी ज्यादा मुश्किल होता है. सुषमा स्वराज इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन सर्विस (SSIFS) में IFS अधिकारियों की ट्रेनिंग होती है, जिसके बाद उन्हें किसी न किसी देश के इंडियन मिशन मे तैनाती मिलती है. यहां अधकारियों को एक लैंग्वेज कोर्स करना होता है और इसका एग्जाम भी क्लियर करना पड़ता है. 

इंटनरेशनल प्लेटफॉर्म्स पर दो बड़े देश के लीडर्स के बीच की बातचीत को इंटरप्रेट करने के लिए इतना ही काफी नहीं होता है. इसके लिए कुछ अधिकारियों का चयन होता है और उन्हें इंटरप्रेट कोर्सेस कराए जात हैं, जिसका खर्च सरकार उठाती है. सिद्धार्थ बाबू ने भी अमेरिका से मास्टर्स ऑफ आर्ट्स इन इंटरप्रिटेशन फॉर डिप्लोमेट्स एंड एग्जीक्यूटिव का दो साल का कोर्स किया है. इसके बाद उन्हें इस तरह के काम दिए जाते हैं, जो सिद्धार्थ बाबू कर रहे हैं. 

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