NDTV LearnNXT कॉन्क्लेव में आज भारत के शिक्षा जगत के जाने-माने लोग और नीति-निर्माता एक साथ मिलकर शिक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा करेंगे. कॉन्क्लेव में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, ग्लोबल क्लासरूम, भविष्य के लिए जरूरी कौशल और 'विकसित भारत 2047' जैसे मुद्दों पर अपना विजन रखेंगे. इस कार्यक्रम की शुरुआत ग्लोबल टीचर प्राइज 2026 पाने वाली रूबल नागी से हुई. रूबल नागी ने बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया और अपने कई सारे अनुभव शेयर किए. जब रूबल नागी से पूछा गया कि उन्हें दीवारों के जरिए बच्चों को पढ़ाने का आइडिया कहां से आया? इस सवाल का जवाब देते हुए रूबल नागी ने कहा, मैं एक आर्टिस्ट हूं, आर्टिस्ट होने के नाते हम सोते नहीं हैं. मुझे बच्चे बहुत पसंद हैं. जब मैं उनके बीच होती हूं तो सबसे ज़्यादा खुश होती हूं.
NDTV Learn NXT Conclave 2026 LIVE🔴: विकसित भारत की शिक्षा पर महामंथन https://t.co/RXWZWODqUq
— NDTV India (@ndtvindia) May 25, 2026
झुग्गी-झोपड़ियों की दीवारों के जरिए बच्चों को पढ़ाई से जोड़ा
नागी ने अनोखा तरीका आजमाते हुए झुग्गी-झोपड़ियों की दीवारों पर गणित, इतिहास के पाठ लिखे. मोहल्लों को इंटरैक्टिव किताबों में बदल दिया. विजुअल लिटरेसी की ताकत से दस लाख बच्चे वापस मुख्यधारा में आ गए और पढ़ाई से जुड़े. NDTV LearnNXT कॉन्क्लेव में अपने अनुभव साझा करते हुए नागी ने कहा, लोग उनसे यह सवाल पूछते थे कि वो अपने बच्चों को स्कूल क्यों भेजे, इसकी जरूरत क्या है? कॉन्क्लेव के दौरान एक किस्से को याद करते हुए नागी ने बताया कि वो एक छह साल के बच्चे से मिली थी. जिसने कभी पेंसिल नहीं देखी थी. ये मेरे लिए एक 'वेक-अप कॉल' थी.
"आंगनवाड़ी को एजुकेशनल सेंटर बनाने पर जोर"
NDTV LearnNXT कॉन्क्लेव में शामिल हुए रॉकेट लर्निंग के को-फाउंडर सिद्धांत सचदेवा ने कहा कि आंगनवाड़ी का रोल काफी ज्यादा अहम है. हम लोग आंगनवाड़ी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. हम सरकार के साथ करीबी से काम कर रहे हैं कि आंगवाड़ी सेंटर्स को सिर्फ न्यूट्रिशियन सेंटर बनाने की बजाय एजुकेशनल सेंटर बनाया जाए. सरकारी ने पोषण भी पढ़ाई भी कैंपेन लॉन्च किया है, अगर वाकई 14 लाख आंगनवाड़ी में ये हो जाए तो हम काफी कुछ बदल सकते हैं.
पोषण और शैक्षिक सहायता किसी की भी जिंदगी बदल सकती है
कॉन्क्लेव में 'द अक्षय पात्र फाउंडेशन' के CEO श्रीधर वेंकट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पोषण और शिक्षा तक पहुंच, स्कूलों में पढ़ाई छोड़ने की दर को कम करने और लोगों की ज़िंदगी बदलने में खास तौर पर लड़कियों के लिए अहम भूमिका निभा सकती है. पोषण और पढ़ाई छोड़ने की समस्या से निपटने के तरीकों से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए, वेंकट ने अमेरिका की एक इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी कंपनी द्वारा आयोजित एक वर्कशॉप का एक किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि सेशन खत्म होने के बाद, कंपनी के CSR हेड ने उन्हें 'सुमा' नाम की एक युवती से मिलवाया. उसने मुझे बताया कि वह एक अनाथ थी और उसे लगभग 10 सालों तक अपने अनाथालय में 'अक्षय पात्र फाउंडेशन' से भोजन मिलता रहा. आज सुमा एक 'परचेज़ एनालिस्ट' के तौर पर काम करती है. उन्होंने सुमा के इस सफ़र को इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण बताया कि किस तरह पोषण और शैक्षिक सहायता किसी की भी ज़िंदगी बदल सकती है.
स्कूल गुणवत्ता पर ध्यान दें
आगा खान फाउंडेशन की CEO टिन्नी साहनी ने कहा कि हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा सफल हो. पिछले कुछ सालों में स्कूलों में दाखिले बढ़े हैं, इसलिए अब यह ज़रूरी है कि हम स्कूलों में गुणवत्ता, सीखने की प्रक्रिया और माता-पिता की भागीदारी पर ध्यान दें.
'किताब-मुक्त शिक्षा' पर दिया जोर
राजस्थान के झुंझुनू स्थित लंबी अहीर ग्राम पंचायत की सरपंच, नीरू यादव ने कहा कि शिक्षा ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो आपकी परिस्थितियों को बदल सकता है. उनका लक्ष्य अपने गांव के सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा उपलब्ध कराना है. उन्होंने बच्चों के लिए 'किताब-मुक्त शिक्षा' (book-free learning) के बारे में भी बात की.
बचपन के शुरुआती आठ साल बेहद जरूरी
EkStep फाउंडेशन की दीपिका मोगिलिशेट्टी ने कहा, "हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है. अगर हम बचपन के शुरुआती आठ सालों पर ध्यान नहीं देंगे, तो बाकी सभी चीज़ें बेकार हो जाएंगी". उन्होंने आगे कहा कि भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति हमसे यह अपेक्षा करती है कि हम शुरुआती आठ सालों को सीखने की एक निरंतर प्रक्रिया के तौर पर देखें. उन्होंने ज़ोर देकर कहा, "हमें बचपन के शुरुआती आठ सालों में इस तरह निवेश करना चाहिए, मानो हमारी ज़िंदगी ही इस पर निर्भर हो क्योंकि असल में ऐसा ही है."
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