Mukherjee Nagar Ground Report : UPSC हब कहे जाने वाले मुखर्जी नगर की गलियों में कभी मिट्टी सोना बन जाता है तो कभी सोना मिट्टी. IAS बनने की कई कहानियां यहीं से निकलीं हैं, तो कई कहानियां बनते बनते बिखर भी गईं. NDTV कुछ ऐसी ही कहानियां ढूंढने इन गलियों की खाक छानने निकला. वहां हमें मिले, आगरा के रहने वाले राहुल जादौन. राहुल इतिहास में गोल्ड मेडलिस्ट हैं. दो बार NET क्वालिफाई, पढ़ाई में रिकॉर्ड ऐसा जिसकी किसी भी छोटे शहर में मिसाल दी जा सकती है. लेकिन उपलब्धियों में जब तक IAS बनने की स्वर्णिम उपलब्धि नहीं जुड़ती तब तक सब यहां मिट्टी के बराबर है.
राहुल की कहानी अकेली नहीं है. देश के अलग-अलग राज्यों, शहरों और गांवों से हर साल हजारों युवा बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली के मुखर्जी नगर पहुंचते हैं. कोई UPSC अधिकारी बनना चाहता है, कोई SSC के जरिए सरकारी नौकरी हासिल करना चाहता है, तो कोई राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर अपने परिवार की जिंदगी बदलने का सपना देखता है. यहां कोचिंग संस्थान हैं, लाइब्रेरियां हैं, किताबों की दुकानें हैं, चाय की टपरियां हैं और हर गली में किताबों के साथ भविष्य तलाशते युवा दिखाई देते हैं.

लेकिन सपनों के इस शहर की एक दूसरी तस्वीर भी है. एक ऐसी तस्वीर, जो कोचिंग संस्थानों के चमकदार विज्ञापनों और सफल एस्पिरेंट की कहानियों के पीछे कहीं दब जाती है. NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट में छात्रों ने मुखर्जी नगर की उसी दुनिया की कहानी सुनाई, जहां सपने बड़े हैं, लेकिन उन्हें जिंदा रखने की कीमत भी कम नहीं.
घर से दूर रहने वाले छात्रों की सबसे बड़ी चिंता: खाना
किसी भी छात्र के लिए जो अपने घर से सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर रहता हो, सबसे जरूरी चीज सिर्फ पढ़ाई नहीं बल्कि रहने और खाने की व्यवस्था भी होती है. लेकिन मुखर्जी नगर में छात्रों से बातचीत के दौरान सबसे अधिक शिकायत PG और सड़क पर मिलने वाले खाने को लेकर सुनने को मिली.
कई छात्रों ने बताया कि भोजन में संतुलन और पौष्टिकता की कमी है. हरी सब्जियां नियमित रूप से नहीं मिलतीं और कई जगह लगभग हर दूसरे दिन आलू की सब्जी परोस दी जाती है. कुछ छात्रों ने पनीर की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए. जबकि कुछ ने दावा किया कि कई बार खाने में इस्तेमाल होने वाली प्याज तक खराब या फंगस लगी हुई दिखाई देती है.
सपनों की तैयारी और रोज का बढ़ता खर्च
सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी केवल मानसिक संघर्ष नहीं बल्कि आर्थिक संघर्ष भी होती है. अलीगढ़ के रहने वाले विवेक पचौरी, जो पिछले कुछ सालों से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, बताते हैं कि अगर किराया और अन्य खर्चों को अलग भी कर दिया जाए, तो केवल नाश्ते और दो वक्त के भोजन पर ही लगभग 300 रुपये प्रतिदिन खर्च हो जाते हैं.

जब उनसे पूछा गया कि आसपास मौजूद कैफे और कॉफी शॉप्स में कभी बैठना होता है या नहीं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "जब रोज के खाने का हिसाब जोड़ना पड़ता है, तब कॉफी जैसी चीजें विलासिता लगने लगती हैं."
पानी भी मुफ्त नहीं, खरीदना पड़ता है
देश में स्वच्छ पेयजल पहुंचाने को लेकर लगातार योजनाएं और दावे किए जाते हैं. लेकिन मुखर्जी नगर में रहने वाले कई छात्रों का कहना है कि उन्हें साफ पानी के लिए भी अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं. छात्रों के अनुसार 20 लीटर की एक पानी की बोतल के लिए 50 से 90 रुपये तक देने पड़ते हैं.

अलीगढ़ के रहने वाले सौरभ शर्मा बताते हैं कि कई इलाकों में ग्राउंडवॉटर की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है. उनके अनुसार कुछ स्थानों पर पानी का रंग तक बदल जाता है और कई छात्रों ने त्वचा संबंधी समस्याओं की शिकायत भी की है.
बीमार पड़ना मतलब जेब पर अतिरिक्त बोझ
छात्रों का कहना है कि मुखर्जी नगर में बीमार पड़ना केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि आर्थिक संकट का भी विषय बन जाता है. सौरभ शर्मा के अनुसार किसी सामान्य चिकित्सक को दिखाने में ही 1000 से 1500 रुपये तक खर्च हो सकते हैं. ऐसे में कई छात्र डॉक्टर के पास जाने के बजाय मेडिकल स्टोर से दवाइयां खरीदकर स्वयं इलाज करने की कोशिश करते हैं.
कमरे कम, कमाई की मशीन ज्यादा?
बढ़ती आबादी और सीमित स्थान के कारण महानगरों में आवास की समस्या नई नहीं है. लेकिन छात्रों का आरोप है कि मुखर्जी नगर में कई स्थानों पर रहने की बुनियादी जरूरतों से अधिक कमाई पर ध्यान दिया जाता है. वाराणसी के रहने वाले धर्मेंद्र, जो LLB कर चुके हैं, बताते हैं कि इलाके में कमरों की भारी मांग का फायदा उठाया जा रहा है.

उनका दावा है कि कई जगह स्टोर रूम को रहने योग्य कमरा बनाकर किराए पर दिया जा रहा है. कुछ इमारतों की छतों पर छोटे-छोटे कमरे बनाकर 5 से 6 हजार रुपये तक किराया लिया जाता है. धर्मेंद्र कहते हैं कि ऐसे कई कमरों में पर्याप्त रोशनी और वेंटिलेशन तक नहीं है। साथ ही छात्रों का आरोप है कि कुछ जगह में तो फायर एग्जिट जैसी बुनियादी सुरक्षा व्यवस्थाएं भी पर्याप्त नहीं दिखाई देतीं.
एक ही कमरा, लेकिन किराए की अलग-अलग कहानी
मुखर्जी नगर में PG संस्कृति अपने आप में एक बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है. हरियाणा के झज्जर की रहने वाली इनू बोरा बताती हैं कि कई बार एक ही कमरे में रहने वाली छात्राओं से अलग-अलग किराया लिया जाता है. किसी छात्रा से 8 हजार रुपये, दूसरी से 7 हजार और तीसरी से 7500 रुपये लिए जाते हैं, जबकि सुविधाएं लगभग समान होती हैं. इनू सवाल उठाती हैं कि जब कमरा और सुविधाएं एक जैसी हैं, तो किराया तय करने का पैमाना अलग-अलग कैसे हो सकता है?

सिक्योरिटी मनी: छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत
मुखर्जी नगर में छात्रों की सबसे आम शिकायतों में से एक सिक्योरिटी मनी को लेकर है. लंबे समय से यहां रह रही पलक बताती हैं कि कमरा लेते समय एक महीने या उससे अधिक किराए के बराबर सिक्योरिटी जमा करानी पड़ती है. लेकिन समस्या तब आती है जब छात्र कमरा छोड़ते हैं. पलक कहती हैं कि कई बार मकान मालिक सफाई, मरम्मत या अन्य कारण बताकर सिक्योरिटी से पैसा काट लेते हैं. "घर से सीमित पैसे लेकर पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए 6 या 7 हजार रुपये भी बहुत बड़ी रकम होती है."
मुखर्जी नगर की अपनी ‘दलाल स्ट्रीट'
मुंबई में एक सड़क है, जिसका नाम है दलाल स्ट्रीट. वहां हर सेकंड करोड़ों रुपये का खेल चलता है. कोई बुल बनता है, कोई बेयर. कोई एक दिन में मालामाल होता है, कोई कंगाल. लेकिन मुखर्जी नगर की अपनी एक अलग "दलाल स्ट्रीट" है. यहां शेयर नहीं बिकते, यहां कमरे बिकते हैं.
UPSC एस्पिरेंट आनंद रतन सिंह बताते हैं कि इलाके में ब्रोकरेज का एक पूरा नेटवर्क काम करता है. उनका कहना है कि कई बार छात्र खुद कमरा खोजकर मकान मालिक तक पहुंच जाए, तब भी किसी न किसी रूप में ब्रोकरेज देने की बात सामने आ जाती है. आनंद के अनुसार सबसे सस्ता कमरा लेने वाले छात्र को भी पहले महीने में किराया, सिक्योरिटी, एडवांस और ब्रोकरेज मिलाकर 20 से 25 हजार रुपये तक का इंतजाम करना पड़ सकता है.
इनू बोरा बताती हैं कि कुछ मामलों में आधे महीने के नहीं बल्कि कमरे के किराये के 50 प्रतिशत तक ब्रोकरेज लेने की शिकायतें भी सामने आती हैं.

बिजली का अलग हिसाब
दिल्ली में मुफ्त या सस्ती बिजली अक्सर राजनीतिक चर्चा का विषय बनती है. लेकिन छात्रों का कहना है कि PG में बिजली का गणित अलग है.
कई जगह 9 रुपये प्रति यूनिट, कहीं 10 रुपये और कहीं 12 रुपये प्रति यूनिट तक बिजली शुल्क लिया जाता है. छात्रों का कहना है कि कुल खर्च का हिसाब लगाने पर यह अतिरिक्त बोझ भी उनकी जेब पर असर डालता है.
लाइब्रेरी: पढ़ाई का केंद्र, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
मुखर्जी नगर की पहचान लाइब्रेरियों से भी है. हजारों छात्र रोजाना घंटों लाइब्रेरी में पढ़ाई करते हैं. लेकिन इनू बोरा बताती हैं कि SSC की तैयारी के दौरान उन्हें अब तक तीन से चार लाइब्रेरियां बदलनी पड़ीं. उनका कहना है कि कई जगह शौचालयों की साफ-सफाई संतोषजनक नहीं रहती.
वहीं लाइब्रेरी की फीस भी 2100 से 3000 रुपये प्रति माह तक पहुंच जाती है.

देर रात लौटने वाले छात्रों की चिंता
मुजफ्फरनगर के रहने वाले अर्जुन शिव मूर्ति पार्क के पास रहते हैं. उनका कहना है कि कई छात्रों की पढ़ाई देर रात तक चलती है. लेकिन कुछ PG में निश्चित समय के बाद गेट बंद कर दिए जाते हैं. ऐसे में देर रात लाइब्रेरी से लौटने वाले अभ्यर्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है. हालांकि अधिकांश छात्रों का कहना है कि कुल मिलाकर इलाके में कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक है और वे सामान्यतः सुरक्षित महसूस करते हैं. फिर भी रात के समय आने-जाने वाले छात्रों के लिए बेहतर व्यवस्था की जरूरत महसूस की जाती है.
सबसे बड़ा दबाव किताबों से नहीं, उम्मीदों से आता है
मुखर्जी नगर में रहने वाले छात्रों का संघर्ष केवल आर्थिक नहीं है. मानसिक दबाव भी उतना ही बड़ा है. आगरा के रहने वाले राहुल जादौन, जो 2023 बैच में इतिहास विषय के गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं और दो बार NET भी क्वालिफाई कर चुके हैं, आज भी नौकरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं. राहुल कहते हैं कि कई बार परीक्षा का तनाव उतना भारी नहीं होता, जितना समाज और रिश्तेदारों के सवालों का दबाव. यह दबाव हर उस छात्र की कहानी है जो वर्षों से एक परीक्षा की तैयारी कर रहा है और जिसके परिवार की उम्मीदें उसी से जुड़ी हुई हैं.
जब पेपर लीक की खबरें हौसला तोड़ देती हैं
PG का किराया, पानी और भोजन अपनी जगह हैं, लेकिन कई छात्रों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी चिंता परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता है.
UPSC को लेकर छात्रों ने कोई विशेष शिकायत नहीं की, लेकिन SSC और कुछ राज्य स्तरीय परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों ने कहा कि पेपर लीक की खबरें उनका मनोबल तोड़ देती हैं. एक छात्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "कभी-कभी लगता है कि सब छोड़कर घर चला जाऊं. लेकिन फिर मां-बाप का चेहरा याद आता है. उनकी उम्मीदें याद आती हैं. और फिर अगले दिन वापस पढ़ने बैठ जाता हूं."

कानून-व्यवस्था और वेरिफिकेशन पर क्या बोले छात्र?
PG में वेरिफिकेशन और सुरक्षा को लेकर अधिकांश छात्रों का अनुभव सकारात्मक रहा. कई छात्रों ने कहा कि वे देर रात भी बाहर आ-जा सकते हैं और इलाके में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. हालांकि पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को लेकर छात्रों के बीच भ्रम जरूर देखने को मिला. उनका कहना था कि PG संचालक पहचान संबंधी दस्तावेज तो लेते हैं, लेकिन आगे सत्यापन की प्रक्रिया कैसे होती है, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती.
इस संबंध में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सीपी देवेश चंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि PG संचालक और मकान मालिक किरायेदारों के दस्तावेज अपने रिकॉर्ड में रखते हैं, जिसके आधार पर जरूरी वैरिफिकेशन प्रोसेस पूरी की जाती है. उन्होंने कहा कि यदि किसी PG, मकान मालिक या किरायेदार से जुड़ा कोई मामला सामने आता है तो पुलिस तत्काल कार्रवाई करती है और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो.
सांसद मनोज तिवारी ने क्या कहा?
मुखर्जी नगर के छात्रों द्वारा उठाई गई समस्याओं पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि उन्हें ऐसे मुद्दों की जानकारी लगातार मिलती रहती है और संबंधित विभागों के माध्यम से समाधान का प्रयास किया जाता है. उन्होंने कहा कि हर सोमवार वह अपने आवास पर लोगों से मिलते हैं और पहले भी C-SAT विवाद तथा कोचिंग संस्थानों से जुड़े मामलों में छात्रों की शिकायतें सुनकर उनके समाधान की दिशा में काम किया गया है.
तिवारी ने कहा कि पार्षद, विधायक और सांसद अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं तथा सांसद स्तर के मामलों पर वह लगातार निगरानी रख रहे हैं.

PG संचालकों का पक्ष
जब NDTV ने छात्रों के आरोपों और शिकायतों पर PG संचालकों तथा मकान मालिकों से उनका पक्ष जानने की कोशिश की, तो अधिकांश लोगों ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. हालांकि सोनीपत के रहने वाले एक PG संचालक ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बातचीत की. उनका कहना था कि कई बार संपत्ति मालिक उनसे लीज के तौर पर काफी अधिक रकम वसूलते हैं, जिससे संचालन लागत बढ़ जाती है.
देश बनाने का सपना, बस बुनियादी सुविधाओं की मांग
मुखर्जी नगर के छात्र किसी विशेष सुविधा या रियायत की मांग नहीं कर रहे. वे मुफ्त कमरा, मुफ्त भोजन या किसी तरह की सब्सिडी की बात नहीं कर रहे. उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि उन्हें साफ पानी मिले, पौष्टिक भोजन मिले, सुरक्षित और हवादार कमरे मिलें, किराया व्यवस्था पारदर्शी हो, ृ सिक्योरिटी मनी की वापसी के स्पष्ट नियम हों और स्वास्थ्य सेवाएं उनकी पहुंच में हों. हर सुबह यहां हजारों युवा नई उम्मीद के साथ किताब खोलते हैं. किसी के पिता किसान हैं, किसी की मां गृहिणी हैं. कोई परिवार की जमीन बेचकर यहां पहुंचा है, तो कोई कर्ज लेकर.

कमरे छोटे हैं, संघर्ष बड़े हैं और मंजिल अब भी दूर है. लेकिन शायद इस पूरी कहानी का सबसे सटीक निष्कर्ष एक छात्र के शब्दों में छिपा है:
"भले ही हम दिल्ली के वोटर नहीं हैं, लेकिन इस देश के नागरिक तो हैं. हम देश की व्यवस्था में शामिल होने के लिए पढ़ रहे हैं. बदले में बस इतना चाहते हैं कि हमारे हिस्से की बुनियादी सुविधाएं हमें मिल जाएं."
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