MIT Report on AI in Education: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आने के बाद से शिक्षा की दुनिया तेजी से बदल रही है. स्टूडेंट्स के सीखने-समझने के तरीके में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. हाल ही में दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में से एक मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के प्रोफेसरों और स्टूडेंट्स की एक कमिटी ने पांच महीने तक यह रिसर्च किया कि AI ने कैंपस में सीखने के तौर तरीके को किस तरह प्रभावित किया है. जिसमें खुलासा हुआ है कि कि AI केवल पढ़ाई का तरीका नहीं बदल रहा, बल्कि छात्रों के लर्निंग बिहेवियर और कॉन्फिडेंस को भी प्रभावित कर रहा है. इस बदलाव को लेकर (MIT) ने गहरी चिंता जताई है.
गायब हो रहे हैं स्टडी ग्रुप और ग्रुप डिस्कसनरिपोर्ट के अनुसार, AI चैटबॉट्स के बढ़ते इस्तेमाल के कारण छात्रों के बीच होने वाली ग्रुप डिस्ककशन और स्टडी ग्रुप्स का कल्चर अब कमजोर पड़ता जा रहा है. पहले जहां स्टूडेंट्स किसी टॉपिक पर साथ बैठकर डिस्कस करते थे, वहीं अब ज्यादातर सीधे AI से जवाब लेने लगे हैं.
अब असाइनमेंट से नहीं पता चलती असली तैयारीMIT published a brutally honest report on what AI is doing to students.
— Alex Veremeyenko (@alex_verem) September 12, 2026
A committee of professors and students spent five months studying how AI changed learning on campus, and the findings read like a warning to every university on the planet.
Study groups are disappearing.… pic.twitter.com/kSxKk4h06o
MIT कमिटी का मानना है कि आज AI लगभग हर तरह के असाइनमेंट का अच्छा जवाब तैयार कर सकता है. ऐसे में केवल होमवर्क या प्रोजेक्ट देखकर यह समझना मुश्किल हो गया है कि स्टूडेंट ने खुद किया है या फिर एआई से करवाया है.
90 फीसदी छात्रों को है एक चिंतारिपोर्ट के अनुसार MIT के 46 फीसदी स्टूडेंट्स रोज AI टूल्स का इस्तेमाल करते हैं. जबकि 90 फीसदी छात्रों ने माना कि उन्हें डर है कि वे AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं. जबकि कई छात्रों का यह मानना है कि AI उनकी मदद करने के बजाय भविष्य में उन्हें पीछे भी छोड़ सकता है.
मुश्किल सवाल आते ही AI की मदद लेने लगे स्टूडेंटरिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण शब्द "कॉग्निटिव सरेंडर" का इस्तेमाल किया गया है. जिसका मतलब कि स्टूडेंट किसी कठिन सवाल या चैलेंज का सामना करने के बजाय तुरंत AI की मदद लेने लगते हैं. इससे उनकी खुद से समस्या सुलझाने और स्वतंत्र रूप से सोचने समझने की क्षमता पर प्रभावित हो सकती है.
MIT ने क्या समाधान सुझाया?दिलचस्प बात यह है कि MIT AI के इस्तेमाल पर सख्ती बढ़ाने के पक्ष में नहीं है. बल्कि रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टूडेंट्स की लगातार निगरानी करने या AI पकड़ने वाले टूल्स का इस्तेमाल करने से भरोसे का माहौल खराब हो सकता है.
इसके बजाय पढ़ाई में ऐसे तरीके अपनाए जाएं जिनमें छात्रों को खुद बोलना, सोचना और काम करना पड़े. इसके लिए ओरल एग्जाम, लंबे समय तक चलने वाले प्रोजेक्ट और क्लास में ज्यादा पार्टिसिपेशन जैसे ऑप्शन सुझाए गए हैं.
शिक्षा का मकसद सिर्फ आउटपुट नहीं
रिपोर्ट का में कहा गया है कि शिक्षा का मकसद केवल अच्छे नंबर या ज्यादा काम करवाना नहीं है. बल्कि छात्रों की सोचने, समझने और फैसला लेने की क्षमता विकसित करना है. MIT का मानना है कि AI का इस्तेमाल जरूर होना चाहिए, लेकिन वह सीखने की जगह नहीं ले सकता.
यह भी पढ़ें- MP के मेधावी छात्रों को 16 सितंबर का इंतजार, 7,500 से ज्यादा स्टूडेंट्स को मिलेगी स्कूटी, जानें कौन हैं योग्य
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं