आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अब भविष्य की कोई दूर की संभावना नहीं रह गया है. भारत के वर्किंग प्लेस पर एआई कस्टमर सर्विस, सप्लाई चेन, मार्केटिंग, इंजीनियरिंग से लेकर फैसले लेने के तरीकों को तेजी से बदल रहा है. भारत के सामने असली सवाल अब यह नहीं है कि एआई नौकरियां बदलेगा या नहीं. सवाल यह है कि क्या हमारी एजुकेशन सिस्टम युवाओं को उस बदलाव में आगे बढ़ने के लिए तैयार कर रही है.
जैसे-जैसे तकनीक बदल रही है, वैसे-वैसे कंपनियों की नई वर्कफोर्स से अपेक्षाएं भी बदल रही हैं. इसी बदलते परिदृश्य पर बात करते हुए मोहन बाबू यूनिवर्सिटी के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर और ट्रस्टी विनय माहेश्वरी कहते हैं कि आज एआई कोड लिखने, डेटा समझने और रोजमर्रा के दोहराव वाले कामों को तेजी से करने में सक्षम है. ऐसे में नए ग्रेजुएट्स की अहमियत केवल उनकी तकनीकी जानकारी से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से होगी कि वे सही सवाल पूछने, एआई के नतीजों को परखने, समस्याओं को सुलझाने और तकनीक का प्रभावी इस्तेमाल करने में कितने सक्षम हैं.
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छात्रों के लिए "जॉब-रेडी" होने का मतलब अब यह है कि वे आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, संचार, सहयोग और नैतिक निर्णय क्षमता के साथ-साथ एआई की बुनियादी बातें, डेटा साक्षरता और उभरती तकनीकों के साथ काम करने की क्षमता भी विकसित करें. यही मिली-जुली क्षमताएं आने वाले समय में भारत के वर्सफोर्स को परिभाषित करेंगी.
डिग्री से आगे, हुनर तकट्रेडिशनल हायर एजुकेशन डिग्री-केंद्रित रही है. लेकिन कंपनियां अब केवल यह नहीं जानना चाहतीं कि ग्रेजुएट्स ने क्या पढ़ा है, बल्कि यह भी देखना चाहती हैं कि वे वास्तव में क्या कर सकते हैं. इस बदलाव को समझाते हुए कहते हैं कि मोहन बाबू यूनिवर्सिटी का उदाहरण देते हैं, जहां पढ़ाई को इंडस्ट्री की जरूरतों से जोड़ने, तकनीकी साझेदारियों, प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स, वर्कशॉप, हैकथॉन और इंडस्ट्री विशेषज्ञों के साथ सीधे संवाद पर जोर दिया जाता है. उनके मुताबिक, मकसद छात्रों को सिर्फ उनकी पहली नौकरी के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि पूरे करियर में उनकी प्रासंगिकता और उपयोगिता बनाए रखने के लिए तैयार करना है.
इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए, विनय माहेश्वरी बताते हैं कि इसका एक बड़ा आधार लिंक्डइन लर्निंग के साथ मोहन बाबू यूनिवर्सिटी की साझेदारी है, जो पूरे विश्वविद्यालय में लागू है. इसके तहत छात्रों को एआई, डेटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, बिजनेस और प्रोफेशनल डेवलपमेंट जैसे सब्जेक्ट्स पर एक्सपर्ट्स द्वारा तैयार किए गए कोर्स अवलेवल होते हैं.
छात्र इन कोर्सों को अपनी नियमित पढ़ाई और करियर के लक्ष्यों के साथ जोड़ सकते हैं. इससे वे अपनी डिग्री की सीमाओं से आगे बढ़कर नई क्षमताएं विकसित कर पाते हैं. साथ ही, इन कोर्सों से मिलने वाले सर्टिफिकेट और प्रोफेशनल पोर्टफोलियो छात्रों की लगातार सीखने और अपने कौशल को बेहतर बनाने की क्षमता का एक परखा जा सकने वाला प्रमाण देते हैं.
एआई-रेडी कैंपस कैसे बनेएमबीयू में एआई को केवल परीक्षा का विषय नहीं माना जाता, बल्कि तकनीकी समझ को छात्रों के सीखने के तरीके का हिस्सा बनाने पर जोर दिया जाता है. छात्रों को उभरते टूल्स का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने, एआई से मिली जानकारी पर सवाल उठाने, उसकी सीमाओं को समझने और उसे वास्तविक समस्याओं में लागू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.
इस पूरी प्रोसेस को सीखना → अभ्यास → उपयोग → प्रमाणन → प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है. क्योंकि तकनीक लगातार बदल रही है, इसलिए छात्रों के लिए किसी एक टूल को सीखना ही पर्याप्त नहीं है; उन्हें नई तकनीकों के साथ लगातार सीखते रहने की क्षमता और आत्मविश्वास विकसित करना होगा.
भारत का डेमोग्राफी लाभ आर्थिक विकास में तभी बदलेगा, जब युवाओं के पास वही कौशल होंगे जिनकी अर्थव्यवस्था को जरूरत है. प्रोफेशनल्स की अगली पीढ़ी को एआई के साथ काम करना आना चाहिए, तकनीक को मानवीय निर्णय क्षमता के साथ जोड़ना आना चाहिए और अलग-अलग फिल्ड्स में आत्मविश्वास से आगे बढ़ना आना चाहिए.
इसलिए भविष्य के विश्वविद्यालय को अकादमिक ज्ञान, इंडस्ट्री का अनुभव, तकनीक, प्रयोग और निरंतर सीखने की प्रोसेस, सबको एक साथ लाना होगा. एमबीयू में हमारी कोशिश यही है कि छात्र कैंपस से केवल डिग्री लेकर न निकलें, बल्कि तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने के आत्मविश्वास और लगातार सीखते रहने की उत्सुकता के साथ बाहर निकलें.
क्योंकि एआई-रेडी होने का मतलब आज के टूल्स जानना नहीं है. मतलब है, कल के लिए तैयार रहना.
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