बिहार चुनाव अब छवियों का घमासान बनता जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से गले मिलते दिखाई दिए। दिल्ली में दोनों नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जम कर निशाना साधा और फिर खबर आई कि अरविंद केजरीवाल 27 तारीख को बिहार जाकर साझा कार्यक्रम करेंगे।
शायद सवा लाख करोड़ के पैकेज से सन्नाएं नीतीश कुमार की रणनीति अब बदल रही है। लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से हाथ मिलाना, नीतीश के लिए ज़रूरी था और एक गेमचेंजर भी माना जा रहा था, लेकिन जंगल राज की तोहमत इस कदर इतनी बार लगाई जा रही है कि अब वे छवि को सुधारने में लग गए हैं।
दिल्ली में नरेंद्र मोदी का रथ रोकने वाले अरविंद केजरीवाल अप्रत्याशित बहुमत के साथ उन्हें उपयोगी लग रहे हैं। केजरीवाल को पूर्वांचली लोगों का भी वोट जम कर मिला। दिल्ली में बिहार सम्मान कार्यक्रम में बिहार से उनके मंत्रियों को सम्मानित भी किया गया। नीतीश कुमार को लालू यादव की तुलना में ऐसे साथ की ज़रूरत है जो दागदार न हो, भ्रष्ट न हो, जो नरेंद्र मोदी की राजनीति के लिए चुनौती का चिह्न हो। शायद इसलिए अब तक नीतीश और लालू के पोस्टर एक साथ नज़र नहीं आ रहे।
केजरीवाल ने तो कह ही दिया है पीएम मोदी दिल्ली के चुनाव से पहले की गलतियां दौहरा रहे हैं। दिल्ली में तब गोत्र और अब बिहार में डीएनए की लड़ाई जोरों पर है। वैसे केजरीवाल भी दिल्ली से बाहर अपने पैर पसारने चाहते हैं।
उधर बीजेपी राज्य में अपने अनेक चेहरों को लोकसभा में प्रभावशाली जीत दिलाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पीछे ढक कर रखना चाहती है। बिहार के लिए सवा लाख करोड़ रुपये के पैकेज से राज्य के अभूतपूर्व विकास करने का वादा कर रही है। अपने मंत्रियों-संत्रियों को करीब 38 जिलों में भेज कर इस पैकेज द्वारा आने वाली योजनाओं को जनमानस तक पंहुचाने की नीति में जुटना चाहती है। लोकसभा में जाति से ऊपर उठ कर मिली जीत का असर शायद अब धुंधला रहा है, तो पार्टी अब जातिगत बैठकें भी कर रही है।
बिहार का चुनाव बीजेपी के लिए महज़ पार्टी की जीत भर नहीं है। यह जीत प्रधानमंत्री के लिए भी एक बड़ी ज़रूरत है। आरा में उनका धूआंधार भाषण, इतने बड़े पैकेज का ऐलान करना, लोगो को उसके ऐलान के तरीके में उसके वज़न को जताना... यह सब बिहार के लोगों में सीधे राह बनाने की कोशिश है।
एक तरफ बिहार के स्वाभिमान, तो दूसरी तरफ नितिश कुमार के अंहकार की चोट नरेंद्र मोदी कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे हैं। वह बिहार की जीत के मायने जानते हैं। राज्यसभा में उसके असर को और सबसे अहम केंद्र में असर को, क्योंकि एक साल के शासनकाल में उनकी सरकार के कामकाज पर सवाल उठने लगे हैं। अब यह पूछा जाने लगा है कि सरकार ने अब तक क्या हासिल किया है। भले ही विदेशों में सराहना मिल रही है, लेकिन देश और पार्टी के अंदर बिहार चुनाव के नतीजे पर लोग आंख जमाए बैठे हैं।
This Article is From Aug 20, 2015
निधि का नोट : बिहार के चुनावी समर में छवियों का घमासान
Nidhi Kulpati
- चुनावी ब्लॉग,
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Updated:सितंबर 21, 2015 17:58 pm IST
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Published On अगस्त 20, 2015 21:43 pm IST
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Last Updated On सितंबर 21, 2015 17:58 pm IST
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