- डॉ. सिद्धार्थ बाजिया ने डॉक्टरी को छोड़कर भारतीय सेना में कमीशंड मेडिकल ऑफिसर बनने का निर्णय लिया
- सिद्धार्थ ने आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पूरी कर जम्मू-कश्मीर के उधमपुर कमांड अस्पताल में तैनाती पाई
- मां के असमय निधन के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से नहीं हटकर देशसेवा के लिए वर्दी पहनने का सपना पूरा किया
Succsess Story: जब किसी परिवार में चाचा सर्जन हों, दूसरे चाचा चाइल्ड स्पेशलिस्ट और बहन एमडी की पढ़ाई कर रही हो तब अमूमन करियर की राह पहले से तय मानी जाती है. लेकिन राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के एक छोटे से गांव बीजापुरा के बेटे डॉ. सिद्धार्थ बाजिया ने अपने हुनर और जज्बे से इस कहानी में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है.
सिद्धार्थ ने सिर्फ पारिवारिक डॉक्टर बनने के बजाय खाकी और वर्दी की आन-बान-शान को चुना. उन्होंने पुणे स्थित प्रतिष्ठित आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी कर भारतीय सेना में बतौर कमीशंड मेडिकल ऑफिसर अपनी सेवाएं शुरू की हैं. उनकी पहली तैनाती जम्मू-कश्मीर के उधमपुर स्थित कमांड हॉस्पिटल में हुई है.
मां का साया उठा, फिर भी नहीं डिगा लक्ष्य
डीडवाना में 29 नवंबर 2004 को जन्मे डॉ. सिद्धार्थ बचपन से ही मेधावी रहे. NEET में बेहतरीन रैंक हासिल कर AFMC पहुंचे सिद्धार्थ पढ़ाई के साथ-साथ स्पोर्ट्स में भी आगे रहे. वे AFMC बास्केटबॉल टीम के कप्तान रहे और कॉलेज को कई नेशनल व इंटरनेशनल ट्रॉफियां जिताईं.
हालांकि, यह सफर आसान नहीं था. MBBS की पढ़ाई के दौरान ही उनकी माता प्रेम देवी बाजिया का असमय निधन हो गया. यह सिद्धार्थ के जीवन का सबसे कठिन मोड़ था, लेकिन उन्होंने अपनी मां के सपने को ही अपनी ताकत बनाया और विपरीत परिस्थितियों में भी लक्ष्य से पीछे नहीं हटे.
AFMC में जब गूंजा सेना का संकल्प
हाल ही में AFMC पुणे में आयोजित 60वें बैच (H3) की पासिंग आउट परेड में डायरेक्टर जनरल आर्म्ड फोर्स मेडिकल सर्विसेज वाइस एडमिरल डॉ. आरती सरीन ने परेड की सलामी ली और नव-नियुक्त सैन्य चिकित्सकों को कमीशन सौंपा. इसी ऐतिहासिक पल में डॉ. सिद्धार्थ ने देशसेवा की शपथ ली. आर्मी की मेडिकल कोर ज्वाइन करने के बाद डॉ. सिद्धार्थ बाजिया ने कहा कि "वर्दी पहनकर देश की सेवा करना मेरा सबसे बड़ा सपना था. अगर आपका लक्ष्य स्पष्ट है और मेहनत में ईमानदारी है, तो कोई भी सपना नामुमकिन नहीं होता."
एक ऐसा परिवार, जहां रग-रग में बसा है इलाज और सेवा
बता दें कि सिद्धार्थ का परिवार राजस्थान के सम्मानित चिकित्सा परिवारों में गिना जाता है. उनके पिता डॉ. ईश्वर राम बाजिया, वरिष्ठ अस्थिरोग विशेषज्ञ और डीडवाना स्थित हॉस्पिटल एवं इंस्टीट्यूट के चेयरमैन हैं जबकि एक चाचा डॉ. प्रहलाद राम बाजिया जनरल सर्जन, राजकीय जिला अस्पताल, कुचामन और दूसरे चाचा डॉ. सोहनलाल बाजिया शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ, राजकीय अस्पताल, कुचामन पद पर सेवाएं दे रहे हैं जबकि बहन डॉ. प्रियंका बाजिया एमडी रेडियो डायग्नोसिस की छात्रा है.
पिता बोले-'यह एक बाप के लिए सबसे बड़ा गर्व'
बेटे सिद्धार्थ की इस सफलता पर उनके पिता डॉ. ईश्वर राम बाजिया ने खुशी जताते हुए कहा कि बेटे का सेना में अफसर बनना पूरे परिवार और क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक पल है. सिद्धार्थ ने अपने अनुशासन और संस्कारों से यह मुकाम हासिल किया है. एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय सेना के उधमपुर कमांड अस्पताल तक का सिद्धार्थ का यह सफर, आज देश भर के उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सुविधाओं के अभाव नहीं, बल्कि अपने इरादों के दम पर इतिहास रचते हैं.
यह भी पढ़ें- Success Story: साइबर कैफे चलाने वाले मोइन मंसूरी बने IAS, 3 लाख का लोन लेकर की UPSC की तैयारी
यह भी पढ़ें- Success Story: आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के बेटे ने रचा इतिहास, भारतीय सेना में भर्ती होकर लौटा तो पूरा गांव जमकर नाचा
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं