देशभर में E20 का विरोध... लेकिन पंजाब के किसान सरकार की इस नीति से क्यों हैं खुश?

एथेनॉल प्लांट बड़ी मात्रा में मक्का खरीद रहे हैं, इस वजह से मक्के के दाम बढ़े हैं। इस बढ़े हुए दाम से ही छोटे किसानों को सीधा फायदा पहुंच रहा है.

देशभर में E20 का विरोध... लेकिन पंजाब के किसान सरकार की इस नीति से क्यों हैं खुश?
E20 और पंजाब के किसान

देश में E20 फ्यूल को लेकर विवाद जारी है. केंद्र सरकार के आश्वासन के बाद भी सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हैं जहां गाड़ी में कम होते माइलेज से लेकर बाइक में आती खराबी जैसे दावे किए जा रहे हैं. विपक्ष ने भी इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ भुनाना शुरू कर दिया है। आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने तो नेशनल टाउनहॉल कार्यक्रम भी आयोजित कर लिया है. लेकिन इस विवाद के बीच E20 फ्यूल को एक राज्य से खुलकर समर्थन भी मिल रहा है।

पंजाब के किसान E20 से क्यों खुश?

यह राज्य है पंजाब जहां इस समय आम आदमी पार्टी की सरकार है. इसी पंजाब में इस समय किसान वर्ग E20 फ्यूल के समर्थन में आ चुका है. असल में एथेनॉल गन्ना और मक्का से बनता है और देश में पिछले कुछ सालों में कई एथेनॉल प्लांट बन चुके हैं. ऐसे में पंजाब के किसानों ने गन्ने और मक्के की खेती बढ़ाई है और उन्हें इससे फायदा भी होने लगा है.

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किसानों का तर्क है कि जब हर कोई चाहता है कि देश के अन्नदाता की आमदनी बढ़े तो फिर एक ऐसी नीति का विरोध क्यों किया जा रहा है जिसकी वजह से सही मायनों में किसानों की आय में इजाफा हो रहा हो. कुछ किसानों का यहां तक कहना है कि अगर इस ई20 पॉलिसी का विरोध किया जाएगा तो सबसे ज्यादा नुकसान उनको होगा जिन्होंने बेहतर कमाई की आस में मक्के की खेती शुरू की थी.

केजरीवाल विरोध में, पंजाब सरकार दे रही बढ़ावा?

यहां समझने वाली बात यह है कि एथेनॉल प्लांट बड़ी मात्रा में मक्का खरीद रहे हैं, इस वजह से मक्के के दाम बढ़े हैं। इस बढ़े हुए दाम से ही छोटे किसानों को सीधा फायदा पहुंच रहा है. बड़ी बात यह है कि अरविंद केजरीवाल जरूर कह रहे हैं कि ई20 फ्यूल का विरोध करना है, लेकिन पंजाब सरकार खुद मक्के की खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. पंजाब सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर जानकारी दी गई है कि किसानों से मक्का एमएसपी पर खरीदा जाएगा.

इसके अलावा जो किसान मक्का उगाएंगे, उन्हें 17500 रुपये की नकद सहायता भी दी जाएगी. पंजाब सरकार तो सामने से किसानों से कह रही है कि वो उन्हें एथेनॉल बनाने वाली दूसरी फैक्ट्रियों के साथ जोड़ने का काम करेगी, ऐसा होने से मक्के की खरीद आसान हो जाएगी. वैसे पंजाब सरकार के ही आंकड़े बता रहे हैं कि राज्य में पिछले पांच सालों में मक्के की खेती का क्षेत्र जरूर कम हुआ है, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ चुका है. 

पंजाब में मक्के की खेती का हाल

उदाहरण के लिए 2020-21 में मक्के की खेती का क्षेत्र 108.1 लाख हेक्टेयर था, उस साल प्रति हेक्टेयर उत्पादन 3667 किलोग्राम रहा. इसी तरह 2021-22 में मक्के की खेती का क्षेत्र घटकर 105.3 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादन 3931 किलोग्राम दर्ज किया गया. 2022-23 में मक्के का रकबा 93.3 लाख हेक्टेयर रहा, वहीं उत्पादन 4393 किलोग्राम पहुंच गया. 2023-24 में क्षेत्र 94.5 लाख हेक्टेयर रहा, लेकिन उत्पादन 3827 किलोग्राम रहा. वहीं बात अगर 2024-25 की करें तो 85.7 लाख हेक्टेयर में मक्के की खेती हुई, लेकिन उत्पादन 3956 किलोग्राम रहा.

क्या धान की खेती से शिफ्ट होंगे पंजाब के किसान?

पंजाब में अभी भी 84 फीसदी कृषि भूमि पर धान और गेहूं की खेती होती है. पंजाब क्योंकि देश की खाद्य सुरक्षा का एक बड़ा आधार बना हुआ है, ऐसे में किसानों के लिए इन दो फसलों से आगे बढ़ना मुश्किल रहता है. लेकिन जैसे-जैसे साल बीते हैं, धान की खेती ने पंजाब की आर्थिक सेहत को नुकसान पहुंचना शुरू कर दिया है. असल में राज्य में 97 फीसदी भूजल का इस्तेमाल सिर्फ सिंचाई में ही हो रहा है, यहां भी इसका सबसे बड़ा स्त्रोत धान की खेती ही है. 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी कि एनजीटी तो चेतावनी दे चुकी है कि अगर पंजाब के किसान ऐसे ही धान की खेती पर ज्यादा निर्भर रहे तो उस स्थिति में 17 साल के अंदर पंजाब में भूजल का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा. वर्तमान में सरकार एमएसपी पर ही पूरा धान खरीद लेती है, ऐसे में किसान भी इसका मोह नहीं त्याग पा रहे हैं. लेकिन अब धीरे-धीरे मक्के की खेती की तरफ रुझान बढ़ा है, इससे सिर्फ ई20 फ्यूल नहीं बन रही बल्कि पंजाब के किसानों को आमदनी बढ़ाने के और बेहतर विकल्प भी मिल रहे हैं.

पंजाब की राजनीति पर क्या असर?

पंजाब के किसानों ने 2020-21 में एक बड़ा आंदोलन छेड़ दिया था, निशाने पर केंद्र सरकार थी और मांग तीन कृषि कानूनों की वापसी. उस समय विपक्ष ने इस मुद्दे को भुनाने की पूरी कोशिश की थी, सरकार को किसान विरोधी बताने के भी प्रयास किए गए. आज फिर पंजाब के किसान चर्चा में हैं, लेकिन फर्क यह है कि इस बार एमएसपी को लेकर लड़ाई नहीं है बल्कि इस बार तो केंद्र की एक नीति का किसानों का ही बड़ा वर्ग समर्थन कर रहा है. पंजाब के कई किसान केंद्र की नई ई20 नीति का विरोध नहीं बल्कि समर्थन कर रहे हैं.

इसका मतलब मोदी सरकार को पंजाब की धरती पर उन किसानों से समर्थन मिल रहा है जिन्होंने कुछ साल पहले ही एक बड़े आंदोलन के जरिए उन्हें चुनौती देने का काम किया था. दूसरी तरफ ई20 नीति का विरोध कर क्या पंजाब की मान सरकार कोई जोखिम ले रही है? क्या पंजाब के किसान इससे असहज हो सकते हैं? जानकारी के लिए बता दें कि पंजाब में 117 विधानसभा सीटों में 40 पर अर्बन, 51 पर सेमी अर्बन और 26 पर रूरल आबादी रहती है, यहां भी अर्बन और रूरल में किसान ज्यादा निर्णायक माने जाते हैं, यानी कि 77 सीटों पर उनकी उपस्थिति बाजी पलट सकती है.