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टॉक्सिक’ फिल्म रिव्यू: यश की शानदार अदाकारी, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट और निर्देशन करती है परेशान

यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक’ एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां देश की आजादी के बाद भी गोवा में पुर्तगालियों का राज कायम है. अपराध की इस दुनिया में राया यानी यश और उसकी बहन गंगा यानी नयनतारा एक गैंग का हिस्सा हैं.

टॉक्सिक’ फिल्म रिव्यू: यश की शानदार अदाकारी, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट और निर्देशन करती है परेशान
टॉक्सिक’ फिल्म रिव्यू: यश की शानदार अदाकारी
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यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक' एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां देश की आजादी के बाद भी गोवा में पुर्तगालियों का राज कायम है. अपराध की इस दुनिया में राया यानी यश और उसकी बहन गंगा यानी नयनतारा एक गैंग का हिस्सा हैं. इस गैंग के मुखिया की बेटी रेबेका यानी तारा सुतारिया को राया से प्यार है और वह उससे शादी करना चाहती है. लेकिन दोनों की प्रेम कहानी के बीच नादिया यानी कियारा आडवाणी की एंट्री होती है. राया और नादिया का रिश्ता आगे बढ़ता है और दोनों का एक बेटा होता है. यहीं से कहानी एक बड़ा मोड़ लेती है. इसके बाद यह कहानी किस दिशा में जाती है, यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी.

अब बात करते हैं फिल्म की खूबियों और खामियों की.

‘टॉक्सिक' की खामियां

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले है. कहानी में कई संभावनाएं हैं, लेकिन उन्हें जिस तरह से पर्दे पर उतारा गया है, वहां फिल्म मात खाती है. कई जगह कहानी का प्रवाह स्वाभाविक नहीं लगता और ऐसा महसूस होता है कि फिल्म पर 1970 के दशक की हॉलीवुड फिल्मों का प्रभाव जरूरत से ज्यादा है. उस दौर की शैली, ट्रीटमेंट और अपराध की दुनिया को जिस तरह पेश किया जाता था, उसकी झलक यहां दिखाई देती है, लेकिन वह आधुनिक दर्शकों के लिए हमेशा प्रभावी नहीं बन पाती.

फिल्म के निर्देशन की कमान गीतू मोहनदास के हाथ में है, लेकिन उनका निर्देशन इस फिल्म की कमजोर कड़ियों में शामिल है. इतने बड़े स्तर और महत्वाकांक्षा वाली कहानी को जिस कसावट और स्पष्टता की जरूरत थी, वह निर्देशन में नजर नहीं आती.

फिल्म की एक और समस्या इसका एक जैसा टोन है. लगभग पूरी फिल्म में संवाद बोलने का एक खास अंदाज अपनाया गया है और जब हर कलाकार एक ही तरह से संवाद बोलता दिखाई देता है तो असरदार संवाद भी अपना प्रभाव खोने लगते हैं.

फिल्म का पहला भाग भावनात्मक रूप से काफी कमजोर महसूस होता है. इसमें एक तरह से घटनाओं और दृश्यों का मोंटाज चलता रहता है, लेकिन कहानी से जुड़ाव महसूस नहीं होता. कई जगह यह भी स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन क्यों मारा जा रहा है और किस वजह से कहानी उस दिशा में जा रही है. यही वजह है कि फिल्म कई मौकों पर खिंचती हुई लगती है.

एक्शन की भरमार भी फिल्म के पक्ष में नहीं जाती. एक्शन के कई दृश्य होने के बावजूद वे हमेशा प्रभावित नहीं करते. फिल्म की लंबाई को कम किया जा सकता था और बेहतर संपादन इसकी गति को काफी सुधार सकता था. मौजूदा रूप में संपादन कुछ जगह बिखरा हुआ महसूस होता है.

यश की अदाकारी फिल्म की सबसे बड़ी खूबी

इन तमाम कमियों के बावजूद यश फिल्म में शानदार हैं. उन्होंने अपने किरदार के लिए जिस तरह मानसिक और शारीरिक स्तर पर खुद को बदला है, वह खास तौर पर प्रभावित करता है. फिल्म में उनका डबल रोल है और जिस तरह उन्होंने अपने बेटे के किरदार को निभाया है, उसे देखकर एक पल के लिए यकीन करना मुश्किल होता है कि दोनों किरदार एक ही अभिनेता ने निभाए हैं.

यश के अभिनय में दोनों किरदारों के बीच फर्क साफ नजर आता है. यही फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है और उनके अभिनय के लिए ‘टॉक्सिक' जरूर देखी जा सकती है.

फिल्म का दूसरा भाग पहले हिस्से के मुकाबले बेहतर है. यहां कहानी में भावनाएं दिखाई देने लगती हैं और दर्शक किरदारों के साथ थोड़ा जुड़ पाता है. खासकर फिल्म के क्लाइमेक्स की तरफ बढ़ते हुए कहानी में भावनात्मक पक्ष मजबूत होता है और एक समय ऐसा आता है जब आप फिल्म के सफर का हिस्सा महसूस करने लगते हैं.

कियारा आडवाणी भी अपनी भूमिका में प्रभाव छोड़ती हैं. उनका किरदार कहानी में अहम मोड़ लाता है और वह अपने हिस्से को अच्छे से निभाती हैं.

फिल्म की प्रोडक्शन क्वालिटी शानदार है. बड़े स्तर पर बनाई गई इस फिल्म में भव्यता साफ नजर आती है. इसका संगीत भी फिल्म की खूबियों में शामिल है. गाने खास तौर पर ध्यान खींचते हैं और कुछ गाने ऐसे हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रहते हैं.

‘टॉक्सिक' की एक और अच्छी बात यह है कि फिल्म मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दे को भी छूती है. हालांकि इसे जिस तरह कहानी में पिरोया गया है, वह हर जगह उतना प्रभावी नहीं बन पाता.

कुल मिलाकर, ‘टॉक्सिक' का दूसरा भाग निश्चित तौर पर पहले भाग से बेहतर है, लेकिन तब तक काफी समय बीत चुका होता है और फिल्म का बोझ दर्शक के दिमाग पर भारी पड़ने लगता है. क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते भावनाएं कहानी को संभालती हैं और फिल्म से जुड़ाव कुछ बढ़ता है.

मेरे लिए फिल्म की रेटिंग 2.5 स्टार पर रुकती है. लेकिन यश का काम मुझे इतना प्रभावित करता है कि उनके अभिनय के लिए मैं इसे 3 स्टार दिए बिना नहीं रह पा रहा हूं.

कलाकार: यश, कियारा आडवाणी, तारा सुतारिया, हुमा कुरैशी, नयनतारा, रुक्मिणी वसंत, अक्षय ओबेरॉय
निर्देशन: गीतू मोहनदास
संगीत: फहीम अब्दुल्ला, तनिशा बागची, विशाल मिश्रा, रवि बसरूर, अरसलान निजामी
रेटिंग: ★★★☆☆

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