मुंबई जिसे सपनों की नगरी कहा जाता है, जहां हर दिन ना जाने कितने लोग अपने सपनों को पूरा करने की चाहत लेकर के आते हैं. किसी के सपनों को उड़ान तुरंत मिल जाती है, तो कई लोगों को समय लगता है. आज हम एक ऐसे ही एक्टर की बात करेंगे जिसने साल1954 में फिल्मों में हीरो बनने का सपना देखा, लेकिन एक स्क्रीन टेस्ट ने उनके इस सपने को तोड़ दिया. मेकर्स को उनका चेहरा लीड रोल के लिए पसंद नहीं आया. हालांकि इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और थिएटर की दुनिया में कदम रखा और अपनी पहचान बनाई. करीब 16 साल तक थिएटर में काम करने और एडवरटाइज के लिए अपनी दमदार आवाज में जिंगल्स भी दिए.
16 सालों के बाद साल 1970 में फिल्म 'प्रेम पुजारी' से उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की. हालांकि, उनको वो पहचान मिलने में वक्त लगा. लेकिन आगे चलकर वो अपनी दमदार आवाज, खतरनाक अंदाज और एक्टिंग के लिए जाने गए और हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार विलेन बने. उनका नाम था अमरीश पुरी.
थिएटर ने बदली किस्मत, श्याम बेनेगल ने पहचाना अभिनय का हुनर
अमरीश पुरी के सपनों को उड़ान देने में डायरेक्टर श्याम बेनेगल ने अहम भूमिका निभाई है. साल 1975 में आई फिल्म 'निशांत' में एक दबंग जमींदार के रोल में नजर आए. इस फिल्म में गिरीश कर्नाड, शबाना आजमी और स्मिता पाटिल जैसे कलाकार थे. साल 1976 में आई 'मंथन' में वो मिश्रा जी के किरदार में नजर आए. वहीं 1977 की फिल्म 'भूमिका' में उन्होंने स्मिता पाटिल के साथ काम किया. इन फिल्मों ने उनको एक अलग पहचान दिलाई. बता दें कि साल 1979 में उन्हें थिएटर में काम के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
'मिस्टर इंडिया' के मुगैंबो ने बनाया हिंदी सिनेमा का सबसे यादगार विलेन

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साल 1987 में आई फिल्म 'मिस्टर इंडिया' अमरीश पुरी के करियर में मील की पत्थर साबित हुई. शेखर कपूर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अनिल कपूर और श्रीदेवी ने लीड रोल निभाया था. वहीं फिल्म में अमरीश पुरी ने विलेन मुगैंबो का किरदार निभाया. फिल्म में उनका डायलॉग 'मुगैंबो खुश हुआ' आज भी लोगों की जुबान पर बना है. बता दें कि मुगैंबो वाले लुक के पीछे उनकी अपनी ही राय शामिल थी. उन्होंने खुद से अपनी मूंछें हटाने और भौंहों को एक अलग तरह से बनाया था. इसी के साथ सिंहासन पर बैठकर उंगलियां थपथपाने की उनकी हरकत भी अचानक शुरू हुई थी, जिसे निर्देशक ने पसंद कर लिया था.
विलेन ही नहीं, पिता और दूसरे किरदारों में भी जीता दर्शकों का दिल

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अमरीश पुरी ने अपने करियर में सिर्फ विलेन का किरदार ही नहीं निभाया है, बल्कि फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में काजोल के पिता चौधरी बलदेव सिंह का किरदार निभाया. फिल्म में 'जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी' वाला डायलॉग आज भी याद किया जाता है. इसके अलावा 'घायल', 'नगीना', 'करण अर्जुन', 'दामिनी' और 'ताल' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरा है. बॉलीवुड के अलावा वो हॉलीवुड फिल्म 'इंडियाना जोन्स एंड द टेंपल ऑफ डूम' में भी नजर आए थे.
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12 जनवरी 2005 को 72 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज, अभिनय और पर्दे पर खौफ पैदा करने का अंदाज आज भी उन्हें हिंदी सिनेमा का खास कलाकार बनाता है.
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