रामायणम् फिल्म का ट्रेलर देखा. ओपनिंग शॉट यही था-रावण की लंका. इसमें वो वैभव नहीं दिखा. राम की कहानी में कुछ नया नहीं है. इस कहानी के न जाने कितने वर्जन हैं. कुछ ऐसी फिल्में हैं जिन्हें घोषित रूप से इस कहानी के आधार पर बनाया गया और न जाने कितनी ऐसी हैं जिनकी कहानियां इस मूल कहानी से प्रेरित हैं. और फिर हमारे गली मोहल्लों में, पूजा त्योहारों में ये कहानी है. तो इस नई फिल्म से एक उम्मीद ये है कि रामायण के दृश्य इस तरह से दिखाए जाएंगे जो इस महागाथा के अनुरूप हों.
भारत में कई पीढ़ियों से राम कथा पर फिल्में बन रही हैं. लेकिन इस बार उम्मीद कुछ ज्यादा थी क्योंकि इतनी बड़ी बजट के साथ पहली बार इस कथा पर फिल्म बनी है. वैसे तो ये कहानी है ही इतनी विराट कि, इसमें अवतार, लाइफ ऑफ पाई, जुरासिक पार्क, द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स और हैरी पॉटर एक साथ समा जाएं. तो इस फिल्म के लिए कोई भी बजट कम ही पड़ेगा लेकिन फिर भी सबसे ज्यादा पैसे खर्च करके जो रामायण बनी है उसमें और पहले के वर्जन्स में इतना फर्क नहीं है कि छाप छोड़ जाए. ऐसा कुछ बाहुबली किया था.
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इस फिल्म के लिए वीएफएक्स का काम देखने वाले डैन ग्लास 'मेटरिक्स रिसरेक्शन' जैसी बड़ी फिल्में कर चुके हैं इसलिए शायद बात स्किल सेट की नहीं है. तो क्या बात अहसास की है क्योंकि इस कहानी को कहने से पहले इसे समझना होगा. ऐरावत एक ही मुक्के में गिर जाता है, जटायू पर वार, रावण का उड़-उड़कर मारना, सब अच्छा है कि लेकिन पता नहीं क्यों वो अहसास नहीं आ रहा. राम का किरदार निभा रहे रणवीर में भी सब ठीक है लेकिन कुछ मिसिंग है. शायद वही अहसास की कमी. इस कहानी, इसकी पृष्ठभूमि, इसको लेकर भावनाओं को समझना होगा.

जिन हॉलीवुड फिल्मों की ऊपर चर्चा की गई, उनमें और रामायण में फर्क ये है कि ये उस मास्टर लेखक ने लिखी है जो इस लेखन के कारण अमर हो गया. उसके जैसा कोई नहीं. ये क्या कोई मामूली बात है कि किसी का लिखा करोड़ों लोगों के लिए धर्म बन जाए, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए. इसमें सिर्फ एक कहानी नहीं, पूरा स्टोरीबोर्ड है. बाकी फिल्मों से उलट यहां सीन दर सीन डिटेल में लिखे हुए हैं, बस ऐसे सूरमा चाहिए जो उसे परदे पर उतार दें, विराट बना दें.
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जरा सोचिए राम के एक बाण से समुद्र पीछे हट रहा है. कितनी बड़ी लहरें हो सकती हैं? क्षमता के मुताबिक. और जब समुद्र पीछे हटता है तो क्या-क्या दिख सकता है? बिना पानी के समुद्र के प्राणी कैसे दिखेंगे, कितने बड़े होंगे? कितने छोटे होंगे? कैसा हाहाकार मचेगा?

वानर विराट समुद्र पर एक पुल बना रहे हैं. तैरते पत्थरों पर पूरी एक सेना जा रही है!
हनुमान को एक पूरा पहाड़ उखाड़ कर लाना है. कैसे एक पहाड़ को उखाड़ेंगे? जब उखाड़ेंगे तो उस पर्वत पर रहने वाले जानवरों का क्या हो होगा? किस तरह का कोहराम मचेगा? क्या सब भागने लगेंगे या फिर शांत रहेंगे? कैसे उसे लेकर उड़ेंगे? जब पहाड़ लेकर उड़ रहे होंगे तो पर्वत से क्या कुछ गिरेगा? या नहीं गिरेगा?
कुंभकरण कितना विशाल होगा? शायद जितना बजट हो? लिखा गया है कि उसकी एक आंख बैलगाड़ी के पहिए के बराबर थी. वो खाता बहुत था. उसके लिए खाना लाएंगे तो कितना खाना होगा, परातों में आएगा या खानों का पहाड़ होगा?
माता सीता के लिए धरती फट रही है. धरती फटेगी तो क्या दिखेगा? सीता उसमें कैसे प्रवेश करेंगी? किस तरह का स्पेशल इफेक्ट हो सकता है?
वो नागपाश कैसा होगा जिससे मेघनाद भगवान को ही बांध लेता है. कितना बड़ा होगा, कितने सिर होंगे? एक या सौ?
एक-एक सीन में कितनी गुंजाइश है, अनंत. एक बार फिर. कोई ट्रीटमेंट संतुष्ट नहीं कर सकता लेकिन यहां प्यास कुछ ज्यादा ही अधूरी रह गई.अगले साल आने वाली वाराणसी से उम्मीद है. इंतजार करते हैं.
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