देशभक्ति की बात जब आती है तो भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का नाम जरुर आता है, जिन्होंने देश को आजादी दिलाने में एक अहम योगदान दिया. वहीं अब उन्हें देश की आजादी के मौके पर याद किया जाता है और उनके लिए गाना गाया जाता है. हम उन्हीं को समर्पित एक गाने के बारे में बताने वाले हैं, जिसके बोल जेल की दीवारों से निकले थे. वहीं राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और उनके कई साथियों ने इसे बनाया था. इसके बाद यह गाना फिल्म में भी लिया गया और मुकेश, महेंद्र कपूर, लता मंगेशकर और राजेंद्र मेहता जैसे दिग्गज सिंगरों ने आवाज दी.
जेल की दीवारों से निकला था ये देशभक्ति गीत
“मेरा रंग दे बसंती चोला” को आपने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर खूब सुना होगा. लेकिन इसके पीछे भी एक कहानी है. यह गीत गोरखपुर जेल की बैरक नंबर 11 में लिखा गया था. दरअसल, कहा जाता है कि साल 1927 काकोरी कांड के बाद राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और उनके कई साथी जेल में बंद थे और बसंत का मौसम था. इस बीच एक क्रांतिकारी साथी ने बिस्मिल से कहा—“बसंत पर कुछ लिख दो.” वहीं इसके बाद यह रचना निकले, जिसपर साथियों ने कुछ बदलाव भी किए और इस तरह जन्म हुआ उस गीत का, जो आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बुलंद तराना बन गया.
मूल रचना के बोल कुछ इस तरह थे
“मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में गांधी जी ने, नमक पर धावा बोला.
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में वीर शिवा ने, मां का बंधन खोला.
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में भगत दत्त ने छोड़ा बम का गोला.
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में पेशावर में, पठानों ने सीना खोला.
मेरा रंग दे बसंती चोला.
इसी रंग में बिस्मिल अशफाक ने सरकारी खजाना खोला.
मेरा रंग दे बसंती चोला.”
इस फिल्म में गाने के रुप में हुआ इस्तेमाल
1931 में ‘साप्ताहिक अभ्युदय' अखबार ने इसे “भगत सिंह का अंतिम गान” शीर्षक से प्रकाशित किया. जबकि इसके बाद 1965 में आई मनोज कुमार की फिल्म शहीद में इस गाने को इस्तेमाल किया. गाना था ओ मेरा रंग दे बसंती चोला. गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन थे. कहा जाता है कि भगत सिंह की मां से मुलाकात के बाद प्रेम धवन ने इस गीत का नया वर्जन लिखा. वहीं दिग्गज सिंगर मुकेश, महेंद्र कपूर और लता मंगेशकर की आवाज में इसे खूब मशहूर कर दिया गया.
गाने के बोल कुछ इस तरह लिखे गए-
“मेरा रंग दे बसंती चोला, माए रंग दे
मेरा रंग दे बसंती चोला
दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है
एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है…”
मनोज कुमार पर फिल्माया गीत उन गानों में शुमार हो गया, जो सिर्फ गाया नहीं बल्कि जिया गया. “रंग दे बसंती चोला” आज 15 अगस्त के दिवस पर स्कूलों और इवेंट में सुनने को मिल जाता है और गीत के जरिए बिस्मिल, अशफाक, भगत सिंह और उनके अनगिनत साथियों की कुर्बानी याद की जाती है.
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