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Om Ka Hari Review: पिता-बेटे के रिश्ते की अनकही कहानी है रघुबीर यादव और अंशुमान झा की फिल्म, दिल छू जाती है कहानी

Om Ka Hari Review: रघुबीर यादव और अंशुमान झा की फिल्म ‘ओम का हरि’ पिता-बेटे के उस रिश्ते की कहानी है, जिसमें प्यार तो है लेकिन उसे जताने की कमी है. फिल्म की कहानी, अभिनय और कमजोर कड़ियों पर पढ़ें पूरा रिव्यू.

Om Ka Hari Review: पिता-बेटे के रिश्ते की अनकही कहानी है रघुबीर यादव और अंशुमान झा की फिल्म, दिल छू जाती है कहानी
Om Ka Hari Review: हंसी, इमोशन और रिश्तों का खूबसूरत मेल है ये फिल्म
नई दिल्ली:

अगर आपको गुल्लक, किराना स्टोर जैसी जिंदगी की सच्ची घटनाओं से जुड़ी हुई सीरीज देखना पसंद है तो हरि का ओम फिल्म आपकी इस लिस्ट में शामिल हो सकती है. भारत एक ऐसा देश जहां पर हमेशा बाप और बेटे के रिश्ते में प्यार तो होता है लेकिन बीच में एक ऐसी दूरी होती है जो दिखती तो नहीं लेकिन महसूस जरूर होती है. पिता से मन की बात न कर पाना और बाप का हमेशा बेटे को कमतर समझना बॉलीवुड फिल्मों में इस तरह के रिश्तों पर कई फिल्में बनी. जिनमें से एक है ओम का हरि. भोपाल में रहने वाले एक ऐसे मिडिल क्लास परिवार की कहानी, जिसकी साख ( पिता) सरकारी नौकरी कर के रिटायर होने के बाद अपने घर को चला रहा है. 2 बेटियों और 1 बेटे का पिता रघुवीर यादव ने फिल्म में हरी का किरदार निभाया. जो अपने बेटे को नकारा समझता है, क्योंकि उसने सरकारी नौकरी नहीं की. हर रोज खुद जल्दी उठने पर बेटे को देर तक सोने का ताना देना. और बताना कि उसकी उम्र में वो क्या-क्या करते थे. ये शायद हर उस घर की कहानी है, जिसके मोहल्ले में अगल-बगल घरों के लड़के किसी बड़ी नौकरी में हो. लेकिन उस घर का बेटा अभी भी अपने करियर को आगे कैसे बढ़ाना है उस उधेड़ बुन में फंसा हुआ हो. 

फिल्म की कहानी 

भारतीय पिता से अक्सर उम्मीद की जाती है कि उन्हें हर चीज का पता हो, लेकिन पिता बनना कैसे है, यह शायद ही कोई सिखाता है. उन्हें कमाना, परिवार चलाना, बच्चों की रक्षा करना और उन्हें जिंदगी में 'सही रास्ते' पर ले जाना सिखाया जाता है. लेकिन बच्चों की बात सुनना, प्यार जताना या उनसे यह कहना कि 'मुझे तुम पर गर्व है', यह सिखाने वाला कोई नहीं होता. फिल्म 'ओम का हरि' इसी कमी को अपनी सबसे भावुक कहानी बनाती है. फिल्म दिखाती है कि पिता होना और अपने फर्ज को निभाना और बच्चों को भावनाओं को समझ पाना दो अलग बातें हो सकती हैं. 

हरीश व्यास के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अंशुमान झा, रघुबीर यादव और सोनी राजदान अहम भूमिकाओं में हैं. कहानी पिता-पुत्र के उस तनावपूर्ण रिश्ते को सामने लाती है, जो कई भारतीय परिवारों में होता हैं. इस फिल्म में इसी रिश्ते को बखूबी दिखाया गया है.

रघुबीर यादव ने रिटायर्ड ज्योतिषी हरि प्रसाद शर्मा का किरदार निभाया है. एक दिन उन्हें लगता है कि हार्ट अटैक आया है, जबकि असल में वह गैस की समस्या होती है. इसके बाद हरि को यकीन हो जाता है कि उनके पास जीने के लिए सिर्फ छह दिन बचे हैं. वो अपनी जिंदगी के आखिरी दिन काशी में बिताना चाहते हैं. उनका बेटा ओम, जिसका अपने पिता के साथ रिश्ता लंबे समय से उलझनों से भरा चल रहा होता है, वो फिर भी अपने बेटे का फर्ज निभाते हुए उन्हें काशी ले जाने का फैसला करता है. आने वाली मौत को आंकने की वजह से शुरू हुई काशी की ये राश्ता पिता और बेटे के रिश्ते के उस सच को सामने लाती है, जिसे समझने में दोनों को ही काफी साल लगे होते हैं.  

बेटे की हर पसंद में कमी निकालते हैं हरि

फिल्म के पहले भाग में दिखाया गया कि एक पिता अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए उसकी नौकरी लगवाने की जद्दोजहद करता है. गु्प्ता जी की चापलूसी करता है. लेकिन वहीं बेटा (ओम) सरकारी नौकरी करने के बजाय अपने गर्लफ्रेंड के साथ मिलकर सैलून चलाने का फैसला करता है. काम भले ही सैलून का हो लेकिन ये उस पिता को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं जिसने बेटे को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया हो. उस पिता के लिए ये काम एक नाई का है, जिसमें कोई इज्जत नहीं मिलेगी. उनके लिए सरकारी नौकरी का मतलब सुरक्षा, सम्मान और ऐसी सफलता है जिसे समाज के सामने आसानी से बताया जा सके.

हरि को अपने बेटे के फैसलों पर कभी भी भरोसा नहीं रहा. वो ओम की जिंदगी के फैसले खुद लेने की कोशिश करते हैं और उसे बार-बार बताते हैं कि वह क्या बन सकता था. हालांकि यहां हरि भी गलत नहीं थे, क्योंकि वो अपने बेटे के भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे होते हैं. लेकिन उनकी ये कमी ओम को हमेशा कमतर फील करता है. वो किसी की नौकरी नहीं बल्कि अपना खुद का काम करना चाहता है. इसी बात का मनमुटाव हमेशा पिता और बेटे के रिश्ते के बीच में रहता है. हरि की परवरिश में बेटे को कमतर महसूस कराना जैसे प्यार जताने का एक तरीका बन गया है. 

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नाराज है ओम, लेकिन पिता को छोड़ नहीं पाता

अंशुमान झा ने ओम के किरदार को बखूबी निभाया है, हर वक्त पिता के तानें सुनने के बाद भी उसने इज्जत की मर्यादा नहीं लांघी. वो अपने पिता से नाखुश है, लेकिन इसके बावजूद भी दिल के कोने में पिता के लिए प्रेम बरकरार रहता है. 

हरि जो रिटायर होने के बाद भजन गाते हैं. एक दिन अचानक भजन गाते समय दिल का दौरा ( गैस का अटैक) आने के बाद उनको एहसास होता है कि अब वो ज्यादा दिन के मेहमान नहीं है. इसलिए वो काशी जाने की जिद करते हैं. बेटा ओम बीमार पिता के लिए वो सब करता है, लेकिन उसके मन में अभी भी गुस्सा मौजूद होता है, वो उसे कोई आदर्श बेटा नहीं बना देती है. लेकिन फिर भी अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए वो उनको काशी लेकर जाता है. यही इस फिल्म की खासियत है कि इसमें कही भी बनावट नहीं दिखी. पिता की परवाह ओम के चेहरे से साफ झलकी है. 

यह सफर धीरे-धीरे सिर्फ एक शहर तक पहुंचने का सफर नहीं रह जाता, बल्कि दोनों के बीच सालों से बनी नाराजगी को समझने का रास्ता बन जाता है. कुछ छोटी बातचीत, खामोशियां और साथ बिताए पल उनके रिश्ते की पुरानी गांठों को धीरे-धीरे खोलने लगते हैं.

रघुबीर यादव ने किरदार में डाल दी जान

रघुबीर यादव इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक हैं. उन्होंने हरि को सिर्फ एक कठोर और परेशान करने वाले पिता के रूप में नहीं निभाया है. उनमें अहंकार भी है, जिद भी है, लेकिन पिता का वो प्यार भी है जो सामने से दिखता नही है.  हरि एक पल बेहद परेशान करने वाले लगते हैं और अगले ही पल उनके भीतर की मासूमियत नजर आने लगती है.

यही वजह है कि अंशुमान झा और रघुबीर यादव की केमिस्ट्री फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी बन जाती है. दोनों के बीच का रिश्ता पर्दे पर बनावटी नहीं लगता. नाराजगी के बावजूद उनके बीच का प्यार पूरी तरह खत्म नहीं होता. ओम के पास अपने पिता से दूर जाने की कई वजहें हैं, लेकिन कुछ ऐसा है जो उसे बार-बार वापस उनके पास ले आता है.

फिल्म के दूसरे किरदारों का भी अहम योगदान

सोनी राजदान भी परिवार की कहानी में जरूरी गर्माहट जोड़ती हैं. वह हर उस महिला का किरदार निभा रही हैं, जो अपने बेटे और पति के बीच एक ऐसा पुल बनी रहती है, जो कभी टूट नहीं पाता. बेटे-पिता के रिश्ते में सालों से चले आ रहे मनमुटाव को साथ में रखते हुए उन्होंने एक ऐसा तालमेल बिठाया है जिसने घर को जोड़े रखा. 

फिल्म यह भी दिखाती है कि ऐसे परिवारों में महिलाओं को अक्सर पुरुषों की जिद और फैसलों का असर चुपचाप सहना पड़ता है. हरि की पत्नी प्रिया अपने सपनों को पीछे छोड़ कर घर को संभालने में अपना जीवन निकाल देती है. उनकी बेटी की शादी भी उसकी पसंद से ज्यादा एक 'अच्छे रिश्ते' की सामाजिक सोच के आधार पर तय होती है. ये पहलू फिल्म को सिर्फ पिता-पुत्र के झगड़े की कहानी नहीं रहने देते. हालांकि, कहानी इन हिस्सों को उतनी गहराई से नहीं तलाश पाती, जितनी गुंजाइश थी.

जगत रावत का अत्माराम वाला किरदार भी हरि और ओम दोनों के लिए एक अलग आईना बनता है. आत्माराम का किरदार फिल्म में हरि को ये समझाने में सफल होता है कि, जो पिता की सोच और व्यवहार अलग-अलग हो सकता है, लेकिन उनकी चाहत अपने बच्चों के लिए एक बेहतर और खुशहाल जिंदगी की होती है, लेकिन उसे जताने का उनका तरीका बिल्कुल अलग हो सकता है. आत्मराम हरि और ओम दोनों को ही एक अलग इंसान बनाता है, जो काशी से वापस जाकर पूरी तरह से तो नहीं बदलते, लेकिन एक-दूसरे को समझकर आगे बढ़ते हैं.

कहानी में ओम अपने पिता को ये बताता है कि वो जो कुछ भला सोचकर करते हैं, लेकिन क्या कभी अपने बच्चों से पूछा कि उनको क्या चाहिए. बड़ी बेटी की शादी पैसे वाले घर में करना ही एक पिता की जिम्मेदारी पूरी करना नहीं होता, बल्कि वो उनके इस फैसले से कितनी खुश है...ये जानना भी होता है. बेटे की इन बातों ने हरी को एहसास कराया कि सिर्फ जिम्मेदारियां पूरा करना ही एक पिता का फर्ज नहीं होता है. बल्कि अपने बच्चों के मन की बात जानना भी एक पिता के लिए जरूरी होता है. 

कहानी की कुछ कमजोर कड़ियां भी

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बनी इसकी स्पीड, कहीं-कहीं पर फिल्म थोड़ी स्लो और बोरियत भरी लगी. क्योंकि जो इसमें दिखाया गया है, आगे क्या होगा इसका अनुमान फिल्म के दूसरे हिस्से में कुछ हद तक समझ आ गया. पहले हिस्से में हरि और ओम के बीच की नाराजगी तो सही लगी, लेकिन इसकी वजह की जड़ को नहीं दिखाया गया. असल में नाराजगी क्या है नहीं समझ आई. 

अत्माराम की कहानी और ओम की छोटी बेटी की प्रेम कहानी भी फिल्म के साथ कुछ फिट बैठते नहीं दिखे. इसके साथ ही फिल्म के साउंडट्रैक की बात करें तो राजीव सारंग, परेश पाहुजा और अचल यादव का संगीत कहानी को आगे बढ़ाता है. दिवंगत आशा भोसले की आवाज में एक गीत भी है. लेकिन कहानी की तुलना में संगीत थोड़ा कमजोर नजर आया. कुल मिलाकर फिल्म का संगीत ऐसा नहीं है जो लंबे समय तक याद रहे. ऐसा नजर आया कि संगीत को जबरदस्ती कहानी में फिट किया गया है. फिल्म कई बार बिना गानों के भी बेहतरीन काम कर सकती हैं. जो इस फिल्म की कहानी और किरदारों ने की. 

राकेश रावत की सिनेमैटोग्राफी और आइजफ पठान की एडिटिंग भी कहानी पर हावी नहीं होती. दोनों का काम एक बेहतरीन बैलेंस बनकर सामने आया है. जो कहानी, इसका संदेश और कलाकारों को कहानी के केंद्र में रखने में सटीक बैठता है.

समीक्षा

कुल मिलाकर ओम का हरि कोई नई कहानी नहीं बताती है. लेकिन पिता-बेटे के रिश्ते की सच्चाई को दिखाती है जो दिल को छू लेती है. जिसे कई परिवार महसूस कर सकते हैं. फिल्म को ताकत देता है इसके कलाकारों का अभिनय. अंशुमान झा और रघुबीर यादव ने इस रिश्ते को ईमानदारी से निभाया है, जबकि सोनी राजदान और बाकी कलाकार परिवार की कहानी को संजोकर रखते हैं. 

फिल्म का 'छह दिन बाकी हैं' वाला हिस्सा और पिता-बेटे के रिश्ते को और गहराई को दिखाने के लिए और मजबूत हो सकता था. इसके बावजूद फिल्म एक अहम बात कह जाती है. "प्यार करना शायद उतना मुश्किल नहीं है, जितना सामने वाले को यह महसूस कराना कि आप उससे प्यार करते हैं. और कई पिताओं को यही सीखने में पूरी जिंदगी लग जाती है."

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