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राजस्थानी प्रसिद्ध लोकगीत, 20 साल पहले दिखा था पत्नी का पति से विरह, आज राजस्थान में वेलकम करने के लिए पॉपुलर

राजस्थान में स्वागत के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला गाना पति पत्नी के विरह के दर्द को बयां करता है, जिसे 20 साल पहले फिल्म के गाने में दिखाया गया था.  

राजस्थानी प्रसिद्ध लोकगीत, 20 साल पहले दिखा था पत्नी का पति से विरह, आज राजस्थान में वेलकम करने के लिए पॉपुलर
राजस्थान का लोकगीत, जो 20 साल पहले फिल्म में किया गया इस्तेमाल
नई दिल्ली:

राजस्थान की संस्कृति को कई टीवी सीरियल और फिल्मों में दिखाया गया है, जिसके लिए अक्सर ये गाना, जिसके बोल हैं केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं राजस्थान का स्वागत करने वाला ये मशहूर गाना एक फिल्म में 20 साल पहले इस्तेमाल किया गया था, जिसमें एक पत्नी का पति से विरह गीत को दर्शाया गया था. वहीं आज भी यह गीत करसन संगाठिया की आवाज में सुनाई देता है, जिसे पहली बार पद्मश्री से सम्मानित अल्लाह जिलाई बाई ने गाया था. आइए आपको बताते हैं इस गाने के पीछे छिपी कहानी. 

डोर फिल्म की कहानी

केसरिया बालम आवो पधारो म्हारे देस गाने को 2006 में आई डोर फिल्म में इस्तेमाल किया गया था, जिसमें राजस्थान के एक आम परिवार की मीरा (आयशा टाकिया) की शादी शंकर से होती है, जो पैसा कमाने के लिए विदेश जाता है. वहीं हिमाचल प्रदेश की मुस्लिम महिला जीनत (गुल पनाग) अपने प्रेमी आमिर से शादी करती है, जो भी काम के लिए सऊदी अरब जाता है. आमिर और शंकर एक जगह काम करते हैं. लेकिन एक हादसे में आमिर पर शंकर की हत्या का आरोप लगता है, जिसके बाद सऊदी कानून के अनुसार आमिर को फांसी हो सकती है. इसके चलते शंकर की पत्नी (मीरा) के माफीनामा (क्षमा पत्र) पर हस्ताक्षर करवाने के लिए और अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए वह राजस्थान जाती है और मीरा से उसकी दोस्ती हो जाती है. वहीं मीरा को उसके ससुराल वालों से बचाती है, जो उसे बेचने की प्लानिंग करते हैं. 

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केसरिया बालम है राजस्थान का प्रसिद्ध लोकगीत 

केसरिया बालम आवो पधारो म्हारे देस गाना राजस्थान का सबसे प्रसिद्ध लोकगीत माना जाता है, जिसका इस्तेमाल राजस्थान में आए मेहमानों का वेलकम करने के लिए किया जाता है. लेकिन बेहद कम लोग जानते हैं कि इस लोकगीत को रिकॉर्डेड संस्करण अल्लाह जिलाई बाई (पद्मश्री) ने गाया था. कहा जाता है कि लगभग 1912-1915 के आसपास उन्होंने 10-13 साल की उम्र में इस गीत को बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह के दरबार में इसे प्रस्तुत किया था. वहीं 1982 में ऑल इंडिया रेडियो पर आधिकारिक रूप से इस गीत की रिकॉर्डिंग हुई थी. 

केसरिया बालम गाने का मतलब 

 “केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस” का शाब्दिक अर्थ है यानी “हे केसरिया प्रियतम, आओ ना, मेरे देश में पधारो.”  हालांकि मूल रूप से यह विरह गीत है, जो पत्नी अपने पति (जो युद्ध या व्यापार के लिए दूर गया होता था) को याद करते हुए उसे वापस बुलाने की तड़प को व्यक्त करती है. आजकल इसे स्वागत गीत के रूप में ज्यादा गाया जाता है.

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