हाल ही में रिलीज हुई'मिर्जापुर: द मूवी' के गाने चर्चा में आ गाए. हालांकि फिल्म के जिस गाने की चर्चा सबसे ज्यादा हुई, वह इस फ्रेंचाइजी के शुरू होने से कई दशक पहले का है. पाकिस्तानी उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की आवाज में अमर यह गाना "सांसों की माला पे" फिल्म के मिड-क्रेडिट सीक्वेंस में आता है. इसने सुनने वालों को एक ऐसे गाने की याद दिला दी है, जिसे कव्वाली की महफिलों, हिंदी सिनेमा, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर बार-बार सुना जाता है.
फिल्म के नौ गानों वाले एल्बम में जो वर्जन है, उसमें नुसरत की आवाज के साथ मधुर शर्मा और वैभव पानी का मॉडर्न म्यूजिक मिक्स किया गया है. 31 अगस्त को रिलीज हुआ यह गाना बीना त्रिपाठी और एक्स लवर से जुड़े एक सीन में बजता है. जब बीना कहती हैं, "प्यार ही तो है, जिंदगी भर थोड़ी ही रहता है." तो बैकग्राउंड में एक ऐसा गाना बजता है जो हमेशा रहने वाले प्रेम की याद में बनाया गया है.
फैंस ने इसे काफी पसंद किया. एक फैन ने लिखा है, मौके के हिसाब से "शानदार गाना चुनने का तरीका". दूसरे ने प्री-क्लाइमैक्स से लेकर "सांसों की माला" वाले सीक्वेंस तक के हिस्से को फिल्म के सबसे शानदार हिस्सों में से एक बताया, लेकिन दशकों पुरानी कव्वाली फिल्म में कैसे आई?
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नुसरत फतेह अली खान का कनेक्शन
"सांसों की माला पे" गाना नुसरत का 1979 से भारत से जुड़ाव से शुरू होता है. भारत के अपने पहले दौरे के दौरान राज कपूर ने नुसरत को ऋषि कपूर की शादी में परफॉर्म करने के लिए बुलाया था. यह गाना उनके मशहूर भारतीय परफॉर्मेंस में से एक से जुड़ा है. बाद में यह गाना नुसरत के कमर्शियल एल्बम में भी शामिल हुआ, जिसमें 1982 का 'सुप्रीम कलेक्शन, वॉल्यूम 12' भी शामिल है. नुसरत के अंदाज ने इस गाने को कव्वाली जैसा जोश भरा रूप दिया. 1983 में बर्मिंघम में हुई एक लाइव परफॉर्मेंस की रिकॉर्डिंग भी इस गाने की लंबे समय तक बनी रही लोकप्रियता से जुड़ी है. हालांकि, इस गाने के लेखक को लेकर एक दिलचस्प बात है.
'सांसों की माला' असल में किसने लिखी थी?
यह रचना अक्सर मीराबाई से जोड़ी जाती है, क्योंकि इसकी भाषा और कल्पना कृष्ण-भक्ति से प्रेरित है. हालांकि, सूफीनामा के अनुसार "सांसों की माला पर सिमरूं निस-दिन पी का नाम" कवि तुफैल होशियारपुरी की रचना है, जो 1914 से 1993 तक जीवित रहे. इस रचना में श्याम, मोहन, वृंदावन और गोकुल का साफ जिक्र मिलता है.
शुरुआत में नुसरत के गाए गाने के कमर्शियल रिलीज में इसके लेखक के तौर पर बस पारंपरिक लिखा गया था. बाद में यह कविता होशियारपुरी के संग्रह 'सोच माला' में उनके नाम से छपी और 2001 के एक कमर्शियल रिलीज में भी उन्हें इसका श्रेय दिया गया. वहीं, इसकी भक्ति-भाव वाली शब्दावली ने इसे मीराबाई से लंबे समय तक जोड़े रखी.
'सांसों की माला पे' का क्या मतलब है?
इसका मतलब है हर सांस माला का एक मनका बन जाती है और हर मनके पर प्रियतम का नाम होता है. "सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम" एक ऐसी गहरी याद को बयां करता है, जिसमें सांस लेना ही भक्ति का काम बन जाता है. "पिया" का अर्थ प्रियतम हो सकता है, लेकिन कविता बार-बार इंसानी प्यार और ईश्वर के प्रति समर्पण के बीच घूमती रहती है. गाने वाला प्यार में इतना डूब जाता है कि प्रेमी और प्रियतम के बीच का फर्क मिटने लगता है. यह कव्वाली की महफिल में भी अपनी सूफी गहराई बनाए रख सकता है और साथ ही श्याम, मोहन, वृंदावन और गोकुल के जिक्र की वजह से कृष्ण-भक्ति का गाना भी माना जाता है. इसमें रोमांटिक चाहत और आध्यात्मिक तड़प के बीच चुनाव नहीं करना पड़ता.
'कोयला' से राहत फतेह अली खान तक
इसे 1996 में 'जीत' और फिर 1997 में 'कोयला' फिल्म में दोबारा इस्तेमाल किया गया. बाद वाले वर्जन को राजेश रोशन ने कंपोज किया था और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था. इसे शाहरुख खान और माधुरी दीक्षित पर फिल्माया गया था. बाद में माइकल विंटरबॉटम ने अपनी 2011 की फिल्म 'तृष्णा' में नुसरत के ओरिजिनल वर्शन का इस्तेमाल किया. 2020 में राहत फतेह अली खान ने अपने चाचा और गुरु नुसरत फतेह अली खान और अपने पिता फरुख फतेह अली खान को श्रद्धांजलि के तौर पर एक और वर्जन रिकॉर्ड किया. इस वर्जन को एक फ्यूजन ट्रैक के तौर पर रिलीज किया गया और यह स्पॉटिफाई जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है.
'सांसों की माला' बार-बार क्यों सुना जाता है?
इसकी लोकप्रियता आधिकारिक रीक्रिएशन से कहीं आगे तक फैली हुई है. यूट्यूब और स्ट्रीमिंग सर्विस असल में "सांसों की माला" के लिए एक दूसरा आर्काइव बन गए हैं, जहां म्यूजिशियन ने बार-बार इस कंपोजिशन को इसके जाने-पहचाने कव्वाली वाले अंदाज से अलग किया है. इसका एक और वर्जन 2020 में राहत फतेह अली खान ने गाया. अपने चाचा और गुरु नुसरत फतेह अली खान की रिकॉर्डिंग को हूबहू दोहराने की कोशिश करने के बजाय, राहत ने "सांसों की माला" को सलमान अहमद के कॉन्सेप्ट पर आधारित एक फ्यूजन ट्रैक के तौर पर पेश किया. उन्होंने इसे नुसरत के साथ-साथ अपने पिता, उस्ताद फरुख फतेह अली खान को समर्पित किया. यह वर्जन स्पॉटिफाई जैसी स्ट्रीमिंग सर्विस पर नुसरत की रिकॉर्डिंग के साथ उपलब्ध है.
हिंदी सिनेमा ने भी इसका अपना एक यादगार वर्जन बनाया है. राजेश रोशन ने 1997 में शाहरुख खान और माधुरी दीक्षित की फिल्म 'कोयला' के लिए "सांसों की माला" गाने को फिर से तैयार किया, जिसे कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था. यह रिकॉर्डिंग स्पॉटिफाई पर नुसरत और राहत के वर्जन के साथ उपलब्ध है.
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