हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार की पहचान एक ऐसे कलाकार की है, जिन्होंने अभिनय और गायन दोनों क्षेत्रों में बेमिसाल सफलता हासिल की. उन्होंने देव आनंद, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन समेत कई बड़े सितारों के लिए यादगार गीत गाए. इतना ही नहीं, जब वे खुद पर्दे पर अभिनय करते थे तो ज्यादातर फिल्मों में उनके लिए प्लेबैक सिंगिंग का काम भी वही करते थे. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ फिल्मों में पर्दे पर अभिनय तो किशोर कुमार कर रहे थे, जबकि उनकी आवाज बने थे मोहम्मद रफी.
इन गीतों में से कुछ शास्त्रीय संगीत पर आधारित थे, जबकि कुछ की धुन और ऊंचे सुरों को देखते हुए संगीतकारों को मोहम्मद रफी की आवाज ज्यादा सही लगी. वहीं कई बार उस दौर में संगीतकार अपनी रचनात्मक सोच और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार भी गायक को चुनते थे. यही वजह थी कि किशोर कुमार जैसे स्थापित गायक-अभिनेता के लिए भी कुछ चुनिंदा गीत मोहम्मद रफी ने गाए.
दिलचस्प बात यह है कि किशोर कुमार ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बतौर अभिनेता की थी. उनकी पहली फिल्म ‘शिकारी' (1946) थी, जिसमें उन्होंने अपने बड़े भाई अशोक कुमार के साथ काम किया. बतौर नायक उनकी पहली फिल्म ‘आंदोलन' (1951) थी. अभिनय के साथ-साथ उनकी रुचि गायन में भी थी. शुरुआती दिनों में उन्होंने कुछ गीतों में कोरस गाया और फिर 1948 में आई फिल्म ‘जिद्दी' में उन्हें बतौर प्लेबैक सिंगर पहला बड़ा मौका मिला. खेमचंद प्रकाश के संगीत निर्देशन में उन्होंने ‘मरने की दुआएं क्यों मांगूं' गीत गाया. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आगे चलकर हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय पार्श्वगायकों में शुमार हो गए.

मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार के लिए कुल सात प्रमुख गीत गाए, जो आज भी संगीत प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं
सबसे पहले बात ‘भागम भाग' (1956) की. इस फिल्म में रफी ने किशोर कुमार के लिए एक नहीं, बल्कि तीन गीत गाए. इनमें ‘चले हो कहां करके जी बेकरार', ‘हमें कोई गम है, तुम्हें कोई गम है' और ‘आंखों को मिला यार से' शामिल हैं. इन गीतों में पर्दे पर किशोर कुमार की चंचल अदाकारी और रफी की सुरीली आवाज का अनोखा संगम देखने को मिलता है.
इसके बाद ‘रागिनी' (1958) का अर्ध-शास्त्रीय गीत ‘मन मोरा बावरा' आता है. माना जाता है कि इस कठिन रचना के लिए संगीतकार ओ. पी. नैयर ने मोहम्मद रफी की आवाज को फिट समझा और किशोर कुमार पर यह गीत फिल्माया गया.
‘शरारत' (1959) में भी दो ऐसे गीत हैं, जिनमें पर्दे पर किशोर कुमार दिखाई देते हैं लेकिन आवाज मोहम्मद रफी की सुनाई देती है. पहला है ‘अजब है दास्तां तेरी ऐ जिंदगी', जबकि दूसरा है ‘तू मेरा कॉपीराइट, मैं तेरा कॉपीराइट'. दोनों ही गीत शंकर-जयकिशन के संगीत निर्देशन में तैयार हुए थे.
इस सूची का सातवां गीत है ‘तुमको दिल दे बैठे हैं', जो फिल्म ‘आबरू' (1956) का है. इस गीत में भी पर्दे पर किशोर कुमार नजर आते हैं, जबकि उनकी आवाज मोहम्मद रफी ने दी.
इन सात गीतों से यह साफ होता है कि उस दौर में संगीतकारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण गीत की जरूरत होती थी. अगर किसी धुन या भाव के लिए उन्हें लगता था कि मोहम्मद रफी की आवाज ज्यादा उपयुक्त रहेगी, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के वही फैसला लेते थे. यही वजह है कि पर्दे पर किशोर कुमार और आवाज में मोहम्मद रफी का यह दुर्लभ मेल हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास का एक दिलचस्प और यादगार अध्याय बन गया.
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