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'चंद्रकांता' के कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह बने रावण, दिल्ली की रामलीला में घोड़े पर धांसू एंट्री से लाल किले पर मचाई धूम

दूरदर्शन के सुपरहिट शो 'चंद्रकांता' के कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह इस बार दिल्ली की रामलीला में रावण के किरदार में हैं. घोड़े पर उनकी दमदार एंट्री ने लाल किले पर दर्शकों को रोमांचित कर दिया.

'चंद्रकांता' के कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह बने रावण, दिल्ली की रामलीला में घोड़े पर धांसू एंट्री से लाल किले पर मचाई धूम
चंद्रकांता के एक्टर ने दिल्ली के लाल किले की रामलीला में रावण बनकर मचा डाली है धूम
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नई दिल्ली:

90s का दौर याद है? जब रविवार को दूरदर्शन पर 'चंद्रकांता' देखने के लिए लोग अपने काम जल्दी निपटा लिया करते थे. अय्यारी, तिलिस्म और राजकुमारों की उस दुनिया में कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह का अपना ही रुतबा था. अब यही चेहरा दिल्ली की रामलीला में रावण के किरदार में नजर आया तो पुराने टीवी दर्शकों की यादें ताजा हो गईं. दूरदर्शन के लोकप्रिय सीरियल 'चंद्रकांता' में कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह का किरदार निभाकर घर-घर में पहचान बनाने वाले एक्टर शहबाज खान की दिल्ली के लाल किले की रामलीला में रावण बनकर घोड़े पर एंट्री खूब सुर्खियां बटोर रही है.

घोड़े पर सवार होकर रावण की दमदार एंट्री

दिल्ली के लाल किले की रामलीला में रावण का किरदार निभाना अपने आप में खास है, लेकिन जब इस किरदार को निभाने वाला कलाकार घोड़े पर सवार होकर पूरे शाही अंदाज में एंट्री मारे तो नजारा और भी दिलचस्प हो जाता है. लाल किले के मैदान में शहबाज खान की इस एंट्री ने रामलीला के माहौल में चार चांद लगा दिए. रावण का भव्य रूप, शाही अंदाज और घोड़े पर सवार होकर मंच तक पहुंचने का अंदाज दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना. तभी तो सोशल मीडिया पर उनका ये वीडियो खूब देखा जा रहा है.

आज भी दर्शकों का फेवरेट है 'चंद्रकांता'

दूरदर्शन पर प्रसारित 'चंद्रकांता' हिंदी टेलीविजन के यादगार धारावाहिकों में गिना जाता है. देवकीनंदन खत्री के उपन्यास पर आधारित इस फैंटेसी सीरियल ने दर्शकों को तिलिस्मी दुनिया से रू-ब-रू कराया था. इसके किरदार और संवाद लंबे समय तक लोगों की जुबान पर रहे. सीरियल में कुंवर वीरेंद्र विक्रम सिंह के किरदार में शहबाज खान ने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई. उस दौर में सीमित चैनलों के बावजूद धारावाहिकों की लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि कलाकारों को घर-घर में पहचान मिल जाती थी. 

एक तरफ ‘चंद्रकांता' की पुरानी यादें हैं, तो दूसरी तरफ रामलीला की जीवंत परंपरा. दोनों का यह मेल मनोरंजन के साथ भारतीय टेलीविजन और रामलीला के पुराने दौर की याद भी दिलाता है.

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