हिंदी फिल्मों में कई बार ऐसे गाने आते हैं जो सुनने में बिल्कुल फिल्मी लगते हैं, लेकिन उनकी जड़ें हमारी लोक परंपराओं में बहुत गहरी होती हैं. 2008 में आई दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘ओए लकी! लकी ओए!' का गाना ‘तू राजा की राजदुलारी' भी ऐसा ही गीत है. हरियाणवी अंदाज और देसी शब्दों से सजे इस गाने को सुनते ही एक अलग ही रंग महसूस होता है. खास बात यह है कि यह कोई सामान्य फिल्मी गीत नहीं था, बल्कि हरियाणवी रागिनी परंपरा से जुड़ा हुआ था. उपलब्ध स्रोतों के मुताबिक इसे पंडित मांगे राम की रागिनी से जोड़ा जाता है और इसका कथानक भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद पर आधारित है.
शिव-पार्वती की कहानी को देसी अंदाज में कहा
गाने की शुरुआत ही बेहद दिलचस्प है. इसमें पार्वती को ‘राजा की राजदुलारी' कहा गया है, जबकि शिव खुद को साधारण, फक्कड़ और सांसारिक सुख-सुविधाओं से दूर रहने वाला बताते हैं. गीत में शिव के तपस्वी जीवन और उनकी सादगी का जिक्र आता है. दूसरी तरफ पार्वती का शिव को पाने का संकल्प इस पूरे संवाद को आगे बढ़ाता है. यही वजह है कि गाना सुनने में मजेदार होने के साथ-साथ शिव-पार्वती की पौराणिक कथा की झलक भी देता है.
11 साल के बच्चे की आवाज ने बनाया खास
‘तू राजा की राजदुलारी' को फिल्म के लिए स्नेहा खानवलकर ने संगीतबद्ध किया था और इसे मास्टर राजबीर ने गाया था. खास बात यह थी कि उस समय राजबीर की उम्र महज 11 साल बताई गई थी. रेडियोवाणी के मुताबिक स्नेहा खानवलकर ने खुद इसे हरियाणवी लोक-संगीत की रागिनी बताया था. हरियाणा में रागिनी की परंपरा काफी लोकप्रिय रही है, जहां कलाकार लोककथाओं और सामाजिक-पौराणिक प्रसंगों को अपनी खास गायकी में पेश करते हैं.
फिल्म में यह गाना अभय देओल और नीतू चंद्रा पर फिल्माया गया था. इसकी देसी भाषा और अनोखी धुन फिल्म के बाकी संगीत से अलग अपनी पहचान बनाती है. 2008 में रिलीज हुई ‘ओए लकी! लकी ओए!' में अभय देओल के साथ परेश रावल, नीतू चंद्रा और अरुणा ईरानी समेत कई कलाकार नजर आए थे. फिल्म का निर्देशन दिबाकर बनर्जी ने किया था.
बॉक्स ऑफिस पर नहीं चला, लेकिन गाना याद रह गया
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता नहीं मिली. बॉक्स ऑफिस इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक फिल्म का भारत में नेट कलेक्शन करीब 6.72 करोड़ रुपये रहा, जबकि वर्ल्डवाइड ग्रॉस करीब 10.06 करोड़ रुपये दर्ज किया गया.
फिर भी ‘तू राजा की राजदुलारी' ने अपनी अलग पहचान बनाई. वजह थी इसका बिल्कुल देसी अंदाज, हरियाणवी रागिनी की मिट्टी की खुशबू और शिव-पार्वती की सदियों पुरानी कहानी. दिबाकर बनर्जी और स्नेहा खानवलकर ने लोक संगीत को जस का तस रखने के बजाय उसे फिल्म की दुनिया में इस तरह पिरोया कि एक पारंपरिक रागिनी नई पीढ़ी तक भी पहुंच गई. यही इस गाने की सबसे खास बात है.
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