बात जो वॉट्सएप से आगे न बढ़नी थी, न बढ़ी...

अगर आप वॉट्सएप पर किसी ग्रुप से जुड़े होंगे तो शायद समझ भी गए हों कि यहां बहस समय काटने, खुन्नस निकालने या फिर दिलबहलाव के लिए होता है. उस दिन भी बात बनते-बनते रह गयी या यूं कहिए हमेशा की तरह बातों का सिर्फ बतंगड़ ही बना.

बात जो वॉट्सएप से आगे न बढ़नी थी, न बढ़ी...

प्रतीकात्‍मक फोटो

वॉट्सएप के योद्धाओं ने एक बार फिर तलवारें म्यान से निकाल ली हैं. लगता है इस बार दुश्मन बच नहीं पाएगा.

“चौदह साल से नासूर बना हुआ है. हमारी सुरक्षा में बहुत बड़ा ख़तरा है.”

“अवैध अतिक्रमण कर रखा है, अब भी इसका कुछ नहीं करेंगे तो क़ब्ज़ा बढ़ाता जाएगा.”

“ऐसे ही तो झाेपड़पट्टी और स्लम फैलते हैं.”

“यही सही वक़्त है. कोरोना के बहाने ठिकाने लगा दिया जाए.”

“वैसे भी इसकी ‘जमात' ने ही भारत में कोरोना वायरस फैलाया है. क्या पता ये भी मरकस जाता हो!”

“पुलिस और प्रशासन से गुहार लगानी चाहिए.”

लगा कि आज सहमति बन जाएगी. आज दुश्मन की ख़ैर नहीं. उसका साम्राज्य नेस्तनाबूत हो जाएगा. लॉकडाउन के बाद लौटेगा तो उसकी सल्तनत लुट चुकी होगी. लेकिन वॉट्सअप ग्रुप में भी भला कभी सहमति बनती है!

“चौदह साल से हम भी देख रहे हैं. उसने कहां अपना दायरा फैलाया है? वैसे भी अपने हाउसिंग सोसाइटी के बाहर की ज़मीन पर हमारा अधिकार नहीं है. यहां बैठता है तो सोसाइटी के लोगों के ही काम आता है.” “ग़रीब आदमी है. अभी तो उसकी मदद करनी चाहिए. उससे पूछना चाहिए कि उसे किसी चीज की जरुरत तो नहीं.”“सहूलियत को देखकर हम अतिक्रमण या स्लम को सही-ग़लत ठहराते हैं. इन्हीं जगहों पर हमारे डोमेस्टिक हेल्प, गार्ड, ड्राइवर, धोबी, माली रहते हैं. हमें ये लोग तो चाहिए लेकिन इनके रहने की जगह उजाड़ दी जानी चाहिए. अजीब बात है!”

जैसे ही किसी ने ख़िलाफ़ लिखा, वॉट्सअप वीरों ने तलवार का रुख़ दुश्मन से हटा उनकी ओर मोड़ दिया.“हमारी सोसाइटी में ही कुछ लोग हैं जो उससे सहानुभूति रखते हैं, वरना कब का भगा दिए होते.” “कुछ का वश चले तो उसको सोसाइटी के अंदर जगह दे देंगे.” “क्या कोई इसकी गारंटी लेगा? किसी ने इसका बैकग्राउंड चेक किया है? पुलिस वेरिफ़िकेशन हुआ है इसका? कल ही दो मेड को बिठाकर प्रवचन दे रहा था कि कैसे उपर वाले पर भरोसा रखने से सब ठीक हो जाएगा.”“किस बात की पुलिस वेरिफ़िकेशन? वो क्या हमारा कोई इंप्लाई है? सोसाइटी के अंदर कहाँ आता है? चौदह साल से हम सब देख ही रहे हैं उसको!”“इस लॉकडाउन में कुछ लोग सड़क पर परेशान कुत्तों और गाय को खिला रहे हैं और आप लोग एक इंसान की रोजी-रोटी छीनना चाहते हैं!” “वही तो, वो कुत्तों तक से नफ़रत करता है. उन्हें हराम मानता है. उसके पास जो भी जाता है, कुत्तों की कहानी सुनाता है.”

ये गर्मागर्म बहस चल रही है हमारी सोसाइटी के बाहर बैठने वाले एक दर्ज़ी को लेकर. 65 पार ही होगा. ढीठ तो है ही कमबख़्त नकचढ़ा और थोड़ा शातिर भी है. हमारे और बगल की सोसाइटी के ठीक बीच “नो-मैंस लैंड” पर अपनी सिलाई मशीन लेकर बैठता है. इधर वाले बोलते हैं तो कह देता है, उधर की तरफ़ बैठता हूँ और उधर वालों को भी यही टका सा जवाब देता है-आपसे मतलब, मैं तो उनकी बाउंड्री के बाहर बैठता हूँ. ज़्यादातर मरम्मत का काम मिलता है. एक बड़ा सा बक़्सा रखा हुआ है जो वहीं ज़ंजीर से बाध जाता है. उसी बक्से को उठा फेंकने की बात की जा रही है.

वैसे अब तक आप समझ चुके होंगे कि दर्ज़ी उस जमात से ताल्लुक़ रखता है जिन्हें उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है. बिना बात के ऐंठ में रहता है. एक बार बच्चे के स्कूल ड्रेस में बटन लगवाने गया था तो इनकार कर दिया. कहा पहले धोकर लाओ. ग़ुस्सा को बहुत आया लेकिन बुजुर्गियत का लिहाज़ कर चुप रह गया. या फिर उसकी तुनकमिजाजी के डर से ज़ुबान नहीं खुली. तब भी वो किसी को कुत्तों की कहानी सुना रहा था.

“कुत्ते नहीं पालना चाहिए. ऐसा करना हराम है.जिस घर में कुत्ता होता है वहां रहमत के फरिश्ते नहीं जाते.” वग़ैरह-वग़ैरह. पूरी कहानी याद नहीं है. कुत्तों से उसकी नफरत की वजह धार्मिक के साथ-साथ शायद रोज़ी-रोटी की भी है. दरअसल वो जहां बैठता है सोसाइटी के लोग अपने पालतू कुत्ते टहलाते हैं. ज़ाहिर है कुत्ते मल-मूत्र भी त्यागते हैं. इस बात से वो ज़्यादा चिढ़ा हुआ होता है. जहां तक दुकान फैलाने की बात है, इसमें भी थोड़ी सच्चाई है. रोड के दूसरी ओर उसने अपने बेटे को बिठाना शुरू कर दिया है. वो भी यही काम करता है. हालांकि इस बात की तस्‍दीक़ मैने खुद नहीं की है कि वो उसका ही बेटा है.


आप सोच रहे होंगे कि वॉट्सएप की बहस का नतीजा क्या निकला. अगर आप वॉट्सएप पर किसी ग्रुप से जुड़े होंगे तो शायद समझ भी गए हों कि यहां बहस समय काटने, खुन्नस निकालने या फिर दिलबहलाव के लिए होता है. उस दिन भी बात बनते-बनते रह गयी या यूं कहिए हमेशा की तरह बातों का सिर्फ बतंगड़ ही बना. सोशल मीडिया पर वर्चुअल योद्धा सिर्फ नारा बुलंद करते हैं-“वीर तुम बढ़े चलो, हम तुम्हारे साथ हैं.” मगर आगे कोई नहीं आता. शायद इसलिए भी क्योंकि आगे बढ़कर कोई परचम थाम भी ले तो उसके पीछे कोई नहीं जाएगा. खासकर जब मामला संवेदनशील हो. पुलिस और प्रशासन से जुड़ा हुआ हो. कौन कोर्ट, कचहरी और पुलिस के पचड़ों में पड़ना चाहता है. किसके पास फ़ुर्सत है. जो सचमुच उस दर्ज़ी को अवैध क़ब्ज़े से बेदख़ल करना चाहते, वे खुद आगे बढ़कर शिकायत दर्ज करा सकते थे. अपने रसूख़ का इस्तेमाल कर उसको हटवा सकते थे. लेकिन बात वॉट्सएप से आगे न बढ़नी थी, न बढ़ी.

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संजय किशोर एनडीटीवी के खेल विभाग में डिप्टी एडिटर हैं...
 
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