हैदराबाद एनकाउंटर पर जश्न मनाने वाले हाज़िर हों!

जिन चार लोगों का एनकाउंटर हुआ उनमें से तीन नाबालिग थे, क्या अब आप उनके मां-बाप का इंटरव्यू टीवी पर चलता देख रहे हैं, उनके इंसाफ़ के लिए भावनाओं का ज्वार खड़ा होते देख रहे हैं? वह भीड़ कहां चली गई जो इंसाफ़ के नाम पर एनकाउंटर को सही ठहरा रही थी?

क्या आपने कभी फर्ज़ी एनकाउंटर को सही ठहराया है? इसका जवाब ठीक से याद करने के बाद ही दीजिएगा. ऐसे लोगों की संख्या हज़ारों और लाखों में निकल आएगी, जिन्होंने हैदराबाद पुलिस के एनकाउंटर पर जश्न मनाया था और सही ठहराया था. उन सभी को पता है कि पुलिस के एनकाउंटर कई बार गलत निकल चुके हैं, और गलत होते हैं, तब भी लोगों ने हैदराबाद पुलिस पर फूल बरसाए थे.

6 दिसंबर 2019 को हैदराबाद पुलिस ने उसी जगह पर चार आरोपियों का एनकाउंटर किया, जहां प्रियंका रेड्डी की हत्या की गई थी. जिनके शरीर को बलात्कार के बाद जला दिया गया था. लोग पुलिस पर गुलाब बरसाने लगे और पुलिस कहानियां बनाने लगी कि कैसे ये आरोपी भाग रहे थे, पुलिस से हथियार छीनकर पुलिस पर गोली चला रहे थे. लोग पुलिस की हर बात पर यकीन कर रहे थे और तारीफों के पुल बांध रहे थे. केवल फूल बरसाने वालों को ही पुलिस पर भरोसा नहीं था, बल्कि देश के लाखों लोगों ने पुलिस की हर बात पर आंखें मूंदकर भरोसा किया और हैदराबाद पुलिस का जय जयकार किया. औरतों ने पुलिस को राखी बांधी थी. 

6 दिसंबर 2019 के दिन किया गया यह एनकाउंटर फर्ज़ी निकला है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 387 पन्नों के ऑर्डर में बताया है कि यह एनकाउंटर फर्ज़ी था. इस एनकाउंटर की जांच के लिए रिटायर्ड जस्टिस सिरपुरकर की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया गया था. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस की बनाई कहानियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता और न ही कोई सबूत हैं. यह कहानी झूठी है कि चारों आरोपियों ने पुलिस से हथियार छीन लिए, पुलिस पर हमला किया, और अपने बचाव में पुलिस ने उनका एनकाउंटर कर दिया.

कई अखबारों में हैदराबाद पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार हीरो की तरह छप गए. 'जानिए कौन हैं, सज्जनार' टाइप की हेडलाइन छपने लगी. बताया जाने लगा कि 2008 में भी इस तरह का एनकाउंटर कर चुके हैं. अमर उजाला की हेडलाइन तो और भी गजब की है. 'हैदराबाद कांड; साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर सज्जनार को क्यों कहा जाता है ‘एनकाउंटर मैन.'' टाइम्स आफ इंडिया में छपता है कि 'हैदराबाद एनकाउंटर में अहम भूमिका निभाने वाले आईपीएस अफसर वीसी सज्जनार से मिलिए.' 

सुप्रीम कोर्ट ने इस एनकाउंटर को फर्ज़ी पाया है और दस पुलिस वालों के खिलाफ़ हत्या, झूठी सूचनाएं देने और सबूतों के मिटाने के धाराओं में मुकदमा दर्ज करने के लिए कहा है. इंडियन एक्सप्रेस ने छह दिसंबर 2019 के दिन सज्जनार की प्रोफाइल छापी. वीसी सज्जनार, हैदराबाद एनकाउंटर के पीछे का एक नरम दिल अफसर. इस तरह से तमाम मीडिया वेबसाइट, अख़बारों और चैनलों पर सज्जनार रातों रात हीरो बन गए. उस दिन सज्जनार ने हिन्दी में भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी. 

पूरी कहानी फर्ज़ी निकली है. सुप्रीम कोर्ट के द्वारा गठित जस्टिस सिरपुरकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि झूठी कहानी बनाई है. फर्ज़ी तरीके से एनकाउंटर कर दिया गया. पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार को मीडिया हीरो बताने लगा. उनकी तारीफ और बड़ी हो सके इसलिए कई जगहों पर गर्व से बताया गया कि 2008 में वीसी सज्जनार ने एसपी रहते हुए वारंगल जिले में ऐसा ही एनकाउंटर हुआ था. सेम टू सेम कहानी, सच्ची. वारंगल के एनकाउंटर में भी आरोपी पुलिस से हथियार छीन कर भागे, पुलिस पर हमला किया और अपने बचाव में पुलिस ने उनका एनकाउंटर कर दिया. उस एनकाउंटर का तो पता नहीं, हैदराबाद एनकाउंटर की कहानी ही झूठी निकली है. वैसे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सिरपुरकर आयोग ने उस एनकाउंटर के बारे में भी सवाल किया था. आपने जॉली एलएलबी पार्ट- 2 फिल्म देखी है. देखी होगी तो आपको पता चलेगा कि एनकाउंटर के खेल के पीछे क्या होता है. 

सोचिए जिन्हें एनकाउंटर मैन कहा जा रहा था, हीरो बनाया जा रहा था वो जनाब कोर्ट के आयोग के सामने कहते हैं कि एनकाउंटर का मतलब ही पता नहीं है. एक और सॉलिड प्वाइंट है. सुप्रीम कोर्ट के बनाए पैनल ने दस पुलिस वालों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की सिफ़ारिश की है. इसमें पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार का नाम नहीं है, जिन्हें 6 दिसंबर 2019 के दिन हीरो बनाया जा रहा था. जिनके बारे में मीडिया लिख रहा था कि इस एनकाउंटर के पीछे उनका दिमाग है. उनकी मुख्य भूमिका है.

हमने तय किया है कि हम एक बार भी लोगों की समझदारी पर सवाल नहीं उठाएंगे क्योंकि उसकी ज़रूरत ही नहीं है. पुलिस की बनी बनाई कहानी पर आंखें मूंदकर यकीन करने वाले लोगों की जमात बहुत मुश्किल से धरती पर अवतरित होती है. जिन चार लोगों का एनकाउंटर हुआ उनमें से तीन नाबालिग थे. क्या अब आप उनके मां-बाप का इंटरव्यू टीवी पर चलता देख रहे हैं, उनके इंसाफ़ के लिए भावनाओं का ज्वार खड़ा होते देख रहे हैं. वह भीड़ कहां चली गई जो इंसाफ़ के नाम पर एनकाउंटर को सही ठहरा रही थी? क्या फर्जी एनकाउंटर से दिशा को इंसाफ मिल गया, जिसकी हत्या हुई थी, जिसके साथ बलात्कार हुआ था? क्या हम जानते भी हैं कि असली अपराधी कहां है? 

तमाम प्रभावशाली लोग गुस्से का फायदा उठाते हुए, माहौल के बीच में अपने लिए लाइक्स और री-ट्वीट बटोरने के लिए अनगिनत लोगों के मन में यह बात पहुंचा दी गई कि इस तरह से एनकाउंटर कर देना सही है. आम लोग भी बोलने लगे कि एनकाउंटर सही है. कालोनी के व्हाट्सऐप ग्रुप में जिन रिटायर्ड अंकिलों ने एनकाउंटर को सही ठहराया था, उनसे पूछिए. आपको ग्रुप से बाहर कर देंगे. माहौल बनाने के लिए तरह तरह के सवाल पैदा किए जाते हैं कि आपकी बेटी के साथ होगा तो क्या करेंगे. लेकिन जिन मांओं के चारों बच्चों का फर्ज़ी एनकाउंटर हुआ है, उन्हें क्या जवाब देंगे? अब तो पता ही नहीं चलेगा कि वे बलात्कार के दोषी थे या नहीं. 

ऑन स्पाट गोली मार देने के पीछे की राजनीति को समझिए. अलग-अलग समय में इस राजनीति के अलग-अलग पैटर्न होते हैं. जब आरोपी अल्पसंख्यक समुदाय का होता है तब तो भीड़ तैयार कर दी जाती है कि ऑन स्पाट ही फैसला हो, पुलिस के एनकाउंटर पर सवाल कर दीजिए तो आपको ही अपराधी बता दिया जाता है और अब तो भीड़ की भी ज़रूरत नहीं, बुलडोज़र आ जाता है. विपक्षी दलों की सरकार के राज्य में आरोपी किसी भी समुदाय का हो, बलात्कार की हर घटना पर तुरंत फांसी देने का दबाव बनाया जाता है और विपक्षी दलों की सरकारें भी वही भाषा बोलने लग जाती हैं.

लेकिन जब ऑन स्पॉट फांसी और एनकाउंटर की बात करने वालों की सरकार के राज्य में बलात्कार होता है तब यही बात कहने पर कहा जाता है कि राजनीति नहीं होनी चाहिए. विपक्ष को जाने से रोका जाता है और यही नहीं, पीड़िता के शव को आधी रात के बाद पुलिस की सुरक्षा में जला दिया जाता है. हैदराबाद एनकाउंटर में पुलिस की वाहवाही करने वाले लोग भूल जाते हैं क्योंकि आरोपी के समाज के लोग पंचायत करने लगते हैं और उनका भी एक वोट बैंक है. मीडिया उस पंचायत को कवर करने लग जाता है. यूपी के हाथरस कांड की रिपोर्टिंग भी कभी फ्लैशबैक में जाकर देखिएगा.
 
6 दिसंबर 2019 के दिन एनकाउंटर का पूरे देश में जश्न मनाया गया. एनकाउंटर की कहानी पर आंखें मूंदकर यकीन किया और इससे बने माहौल का फायदा उठाते हुए यूपी पुलिस भी ट्वीट कर बताने लगी कि उसने कितने एनकाउंटर किए हैं. यह ट्वीट 6 दिसंबर का है जिसमें लिखा है कि जंगल राज अब अतीत की बात हो चुकी है. दो साल में 103 अपराधी मारे गए हैं. 1859 घायल हुए हैं. 5178 पुलिस वाले भी घायल हुए हैं. 

असम में भी एनकाउंटर का ऐसा चलन बढ़ गया. कई एनकाउंटरों पर सवाल उठे हैं और हाई कोर्ट के सामने उन्हें चुनौती दी गई है. जस्टिस सिरपुरकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अभियुक्तों पर जान बूझकर इस तरह गोलियां चलाई हैं ताकि वो मर जाएं. इसके कोई सबूत नहीं हैं कि वे हथियार छीनकर भाग रहे थे और पुलिस पर हमला कर रहे  थे. आयोग की रिपोर्ट पढ़ने से पता चलता है कि हैदराबाद का एनकाउंटर केवल एनकाउंटर के मामले में ही फर्ज़ी नहीं है.

आपके स्क्रीन पर उन परिवारों के घर के वीडियो आते जाएंगे जिनके बच्चों को फर्ज़ी एनकाउंटर में मारा गया. इन साधारण घरों के बच्चों को पुलिस उठाकर ले जाती है, एनकाउंटर कर देती है, गोदी मीडिया और ट्विटर के ज़रिए समाज का बड़ा हिस्सा ख़ून का प्यासा हो जाता है और एनकाउंटर का जश्न मनाता है. क्या वह वहशी समाज, बदहवास नेता इनके घरों पर जाकर प्रायश्चित करेंगे? जस्टिस सिरपुरकर आयोग की रिपोर्ट में अभियुक्तों के परिवार वालों के बयान छपे हैं. इनमें कुछ का कहना है कि गिरफ्तारी के वक्त नहीं बताया गया कि क्यों गिरफ्तार किए जा रहे हैं. न ही कोई वारंट या मेमो दिखाया गया. कुछ के माता-पिता का कहना है कि उन्हें तो टीवी न्यूज़ देखकर पता चला कि क्या हुआ है. मोहम्मद आरिफ़, जोल्लू शिवा, जोल्लू नवीन, चिन्ताकुंता चेन्नाकेशवालु में से तीन लोग नाबालिग थे. फिर भी पुलिस ने वाहवाही लूटने के लिए बालिग बताकर इनकी तस्वीरें मीडिया को जारी की थीं. आयोग ने अपनी जांच में पाया है कि पुलिस ने जानबूझकर जानकारी छिपाई जबकि पुलिस को भी शक था कि इनमें से दो नाबालिग थे. आयोग ने काफी विस्तार से बताया है कि कैसे पुलिस ने उनके स्कूल जाकर डेट ऑफ बर्थ पता करने की कोशिश भी की, लेकिन तब भी नाबालिग वाली जानकारी को दबाया. 

आयोग की रिपोर्ट में एनकाउंटर के अलावा जांच और आरोपियों की पहचान को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. एनकाउंटर में मारे गए चारों लोगों की पहचान पी श्रीनिवास रेड्डी ने की थी जो उस लॉरी का मालिक है जिस पर ये काम करते थे. आयोग ने रिकॉर्ड किया है कि पुलिस ने कहा कि एक अभियुक्त नवीन कुमार, श्रीनिवास रेड्डी के साथ काम करता है लेकिन बाद में श्रीनिवास रेड्डी ने कहा कि नवीन को नहीं जानता कि कौन है. इससे तो नवीन की गिरफ्तारी पर ही गहरा संदेह पैदा हो जाता है. 

सीसीटीवी फुटेज को लेकर भी कई तरह के दावे मिलते हैं. लॉरी के मालिक श्रीनिवास रेड्डी ने सीसीटीवी फुटेज देखने का जो समय बताया है, उसमें और पुलिस के बताए समय में काफी अंतर है. यही नहीं एक आरोपी शिवा की पहचान श्रीनिवास रेड्डी ने सीसीटीवी फुटेज से की. आयोग ने लिखा है कि पुलिस ने उस सीसीटीवी फुटेज को कई घंटे बाद बरामद किया था. मतलब जब वह फुटेज पुलिस के पास ही नहीं था तब श्रीनिवास रेड्डी ने कैसे देखकर बता दिया कि वह शिवा है. यही नहीं पुलिस का कहना है कि तीन सीसीटीवी फुटेज दिखाए गए. श्रीनिवास रेड्डी का कहना है कि सात से आठ फुटेज दिखाए गए, इतना अंतर है. जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने श्रीनिवास रेड्डी कहता है कि उसे कोई सीसीटीवी फुटेज नहीं दिखाया गया.

तो इस तरह से चारों को गिरफ्तार किया गया. इससे तो इनके आरोपी होने में भी गंभीर संदेह है. आपने सुना कि किस तरह पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनार कह रहे थे कि इन सभी को वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तार किया गया था. आयोग ने यह भी लिखा है कि ऐसा लगता है कि लॉरी के मालिक पी श्रीनिवास रेड्डी को सिखाया पढ़ाया गया था. क्या यह भयानक नहीं है कि किसी बेकसूर को इस तरह से उठाकर एनकाउंटर में मार दिया जाए. फिर कहानी बनाकर मीडिया में एनकाउंटर मैन टाइप का हीरो बन जाएं और सांसद से लेकर अभिनेता जय-जय करने लगें. 6 दिसंबर 2019 के प्राइम टाइम में हमने इस एनकाउंटर पर सवाल उठाया था, आगाह किया था कि इस तरह पब्लिक ओपीनियन के नाम पर किसी को मार देना ठीक नहीं है. 

फास्ट ट्रैक कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपने कोर्ट रूम में ताला लगाकर शिमला चले जाना चाहिए और वहां बादाम छुहारा खाना चाहिए. क्योंकि उनका काम खत्म हो गया है. क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर संविधान की शपथ लेकर सांसद बने और टीवी पर आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तेलंगाना पुलिस की एक असामाजिक करतूत को सही ठहरा दिया है. पुरुषों के अलावा बहुत सी महिलाएं भी उस पब्लिक ओपीनियन को बनाने में लगी हैं और अपने बनाए ओपीनियन की आड़ में इस एनकाउंटर को सही ठहरा रही हैं. 

यह वही पब्लिक ओपिनियन है जो अखलाक और इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को सरेआम मारते समय एक तरह से सोचता है, भीड़ के साथ खड़ा हो जाता है और यह वही पब्लिक ओपिनियन है जो तेलंगाना पुलिस की एनकाउंटर को लेकर भीड़ बन जाता है. क्या पब्लिक ओपीनियन अब अदालत में है? तो फिर अदालतों को फैसले से पहले ट्विटर पर जाकर देखना चाहिए कि आज का ट्रेंड क्या है. सभी को पता है कि इस घटना को लेकर गुस्सा है. महिलाओं में गुस्सा है तो उस गुस्से में जगह बनाने के लिए महिला सांसद भी एनकाउंटर को सही बता रही हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में झारखंड में शशिभूषण मेहता के लिए वोट मांगा था जिन पर एक महिला टीचर की हत्या का आरोप है और इस मामले में शशिभूषण मेहता ज़मानत पर हैं. क्या स्मृति ईरानी का गुस्सा वैसा ही होगा जैसा तेलंगाना मामले में था? क्या वे संसद से यह जानकर इस्तीफा दे देंगी? यह जानकर उनके सहयोगी सांसद साक्षी महाराज बलात्कार और हत्या के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जन्मदिन पर शुभकामनाएं दे रहे हैं. बांगरमऊ से विधायक कुलदीप को बधाई देने के लिए मंत्रोच्चारण कर रहे हैं. तो तब और अब स्मृति ईरानी क्या कर लेंगी?

जिस तेलंगाना पुलिस को लेकर सवाल उठ रहा था कि जब पीड़िता के परिवार वाले पुलिस के पास गए तो दो घंटे तक कुछ नहीं किया. कहा कि किसी दोस्त से मिलने भाग गई होगी. इस मामले में तीन पुलिस वाले सस्पेंड भी हुए थे. जिस पुलिस ने उसके पहले एक और घटना होने पर इलाके में सुरक्षा तेज़ नहीं की, यह भी हो सकता है कि उसके पास जांच और सुरक्षा के पर्याप्त संसाधन ही न हों, अब इन सारे सवालों को धकेलते हुए इस मामले को एनकाउंटर के जश्न पर खत्म किया जा रहा है. पुलिस महान बना दी गई है.

तेलंगाना पुलिस पर जो फूल बरसाए जा रहे हैं. उसकी तस्वीर बता रही है कि आम जनता में न्याय व्यवस्था को लेकर समझ और भरोसा कितना कमज़ोर हो गया है. कानून का सिस्टम लंबा वक्त लेता है या काम नहीं करता है, इसके नाम पर एनकाउंटर की थ्योरी को बिना जांचे परखे स्वागत के कांड में बदल दिया गया है. 

क्या वाकई इस कहानी पर कोई विश्वास कर रहा है कि जब पुलिस इन अपराधियों को लेकर सबूत इकट्ठे करने लगी तब इन लोगों ने पुलिस पर पत्थरों से हमला कर दिया. हथियार छीन लिए और सरेंडर नहीं किया तो गोली मार दी. क्या वाकई लोगों ने सोचना बंद कर दिया है कि फर्जी से लगने वाली इस कहानी पर फूल बरसा रहे हैं? जब सबूतों के आधार पर पुलिस ने उन्हें पकड़ा था तो उन पर आरोप साबित करने का प्रयास क्यों नहीं किया गया. क्या इसलिए एनकाउंटर किया गया कि पब्लिक ओपीनियन स्वागत करेगी. सांसद लोग भी स्वागत करेंगे.

मुमकिन है 6 दिसंबर 2019 के प्राइम टाइम को देखकर कालोनी के व्हाट्सऐप ग्रुप वालों को बहुत गुस्सा आया होगा कि पुलिस पर सवाल उठा रहा हूं. उस वक्त जब गोदी मीडिया से भीड़ का माहौल बन रहा था, हम लोग एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे थे. आज सही साबित हुए हैं. कहां गए वो लोग जो हैदराबाद एनकाउंटर की जय जयकार कर रहे थे, जो एक तरह से इस समाज में निर्दोष की हत्या का वातावरण बना रहे थे. न जाने कितने बेकसूर लोग अपराधी बताकर जेल में डाले जा रहे हैं, उनका एनकाउंटर हो रहा है और उन्हें फांसी की सज़ा हो रही है. यह सिलसिला अभी भी जारी है. राजस्थान के झालावाड़ का एक मामला सामने आया है. मामला 2018 का है. सात साल की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी. 

राजस्थान हाई कोर्ट के जस्टिस पंकज भंडारी और अनूप कुमार ढंढ की बेंच ने अगर डीएनए रिपोर्ट के आधार पर संदेह न किया होता तो इस मामले का आरोपी कोमल लोधा फांसी पर चढ़ गया होता. बल्कि ट्रायल कोर्ट ने उसे फांसी की सज़ा ही सुना दी थी. हाईकोर्ट ने कोमल को फांसी की सज़ा बदल दी है मगर वह आजीवन कारावास में है. उसे अब सुप्रीम कोर्ट तक जाना होगा. जो बच्चा एक वकील तक नहीं कर सका, वह सुप्रीम कोर्ट तक कैसे मुकदमा लड़ पाएगा. कोमल लोधा तो गवाह था, उसने दो आरोपियों के नाम बताए थे मगर उसे ही आरोपी बना दिया गया. कोमल को निचली अदालत से फांसी की सज़ा भी हो गई. हाई कोर्ट ने कहा है कि पुलिस ने दोषियों को बचाने व निर्दोष को फंसाने की कोशिश की है. इस मामले में फिर से जांच के आदेश दिए गए हैं. अदालत ने उन अधिकारियों की भूमिकी की जांच के भी आदेश दिए हैं जिन्होंने कोमल लोधा को झूठा फंसाया, गिरफ्तार किया. गिरफ्तारी के वक्त लोधा नाबालिग था. दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि पुलिस ने विधानसभा चुनाव से साढ़े चार महीने पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री के गृह जिले में हुई इस वारदात की गुत्थी को जल्द सुलझाने के नाम पर निर्दोष को बलि का बकरा बना दिया.

हाईकोर्ट की टिप्पणी से पता चलता है कि ट्रायल कोर्ट ने भी अनदेखा किया है. कोर्ट ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने कोमल के स्कूल के प्रिंसिपल की गवाही पर विचार नहीं किया कि कोमल नाबालिग है. ट्रायल कोर्ट ने एक डॉक्टर की X-Ray जांच पर भरोसा किया कि उसकी उम्र 19-21 साल के बीच की है. हाई कोर्ट ने पाया है कि वह डाक्टर रेडियोलॉजिस्ट भी नहीं था. इस रिपोर्ट के डिटेल भी भयानक हैं. जिस देश में जांच की ये हालत हो, उस देश में कैसे कोई पुलिस एनकाउंटर को इंसाफ़ समझ सकता है? कोमल के परिवार वाले तबाह हो गए. लेकिन बाकी लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ा. 11 साल पहले की बात है. छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में पुलिस ने 16 साल की एक लड़की मीना खलको को नक्सली बताकर मार दिया. न्यायिक जांच में नक्सलियों से मुठभेड़ का दावा भी फर्ज़ी पाया गया था. मीना खलको को किसने मारा आज तक पता नहीं चला. जो पुलिस वाले गिरफ्तार हुए थे वे बरी हो गए.

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जब राजनीति करनी होती है तब नारी का इंसाफ़ कितना बड़ा मसला हो जाता है और जब राजनीति की चोरी पकड़ी जाती है तब मसला बनाने वाले लोग भाग जाते हैं. उनका मकसद इतना ही होता है कि समाज को भीड़ में बदला जाए, ऐसी भीड़ जो झूठे किस्सों और फर्ज़ी नायकों को महान के लिए तैयार हो जाए. हैदराबाद एनकाउंटर उसी भीड़ की कहानी है.