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पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट, अब प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में जीत; बिहार में क्या खेल रहे हैं प्रशांत किशोर?

दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज की जीत और बांकीपुर उपचुनाव में सफलता के बाद प्रशांत किशोर की रणनीति चर्चा में है. 

पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट, अब प्रदेश अध्यक्ष के गृह जिले में जीत; बिहार में क्या खेल रहे हैं प्रशांत किशोर?
बिहार MLC चुनाव में प्रशांत किशोर ने भी बाजी मारी है.

प्रशांत किशोर बिहार में दूसरी पार्टियों से नाराज नेताओं को साथ जोड़कर अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी रणनीति है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं को जन सुराज के साथ लाया जाए और उनके सहारे नए इलाकों में पार्टी का आधार बनाया जाए. बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव और दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मिली जीत को इसी कोशिश से जोड़कर देखा जा रहा है.

दरभंगा में जीत के बाद उठे नए सवाल

जन सुराज ने अब बिहार की राजनीति में एक और चुनावी सफलता हासिल की है. पार्टी के डॉ. सुरेश प्रसाद राय ने दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी मदन मोहन झा को 324 वोटों से हरा दिया. इससे पहले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भी पार्टी की जीत चर्चा में रही थी. इन दोनों नतीजों के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशांत किशोर अपनी इस रणनीति के सहारे बिहार में मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार कर पाएंगे?

बीजेपी के गढ़ में मिली कामयाबी

दरभंगा की जीत इसलिए भी खास है, क्योंकि यह बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी का गृह जिला है. इससे पहले बांकीपुर सीट पर जीत को भी जन सुराज के लिए अहम माना गया था. यह सीट नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी. अब दरभंगा में जीत ने पार्टी को फिर चर्चा में ला दिया है.

टिकट नहीं मिला तो जन सुराज का दामन थामा

सुरेश राय की जीत के पीछे बीजेपी की टिकट की राजनीति भी अहम मानी जा रही है. वह पहले बीजेपी से जुड़े थे और इस सीट से टिकट चाहते थे. टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने जन सुराज का साथ चुना. इससे पहले वह दो बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ चुके थे. इस बार जन सुराज के समर्थन से उन्हें जीत मिली.

नाराज नेताओं पर दांव

प्रशांत किशोर की रणनीति का एक अहम हिस्सा दूसरी पार्टियों से नाराज नेताओं को अपने साथ जोड़ना हो सकता है. ऐसे नेताओं की अपने इलाके में पहचान और पकड़ होती है. जन सुराज को उम्मीद हो सकती है कि इन नेताओं के सहारे वह उन इलाकों में भी अपनी जगह बना पाएगी, जहां उसका संगठन अभी मजबूत नहीं है.

अभी लंबा है विधानसभा चुनाव का सफर

लेकिन इन दो जीतों के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि जन सुराज पूरे बिहार में मजबूत हो गई है. दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का दायरा सीमित है. विधानसभा चुनाव में हर वर्ग के मतदाताओं का समर्थन हासिल करना अलग चुनौती है. सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज के उम्मीदवार आफाक अहमद की हार भी बताती है कि पार्टी को हर जगह सफलता नहीं मिली है.

विधानसभा चुनाव में होगी असली परीक्षा

सवाल यह है कि क्या प्रशांत किशोर स्थानीय स्तर पर मजबूत नेताओं को जोड़कर जन सुराज का संगठन खड़ा कर पाएंगे? क्या इन चुनावों में मिली सफलता विधानसभा चुनाव में भी काम आएगी? और क्या पार्टी पूरे बिहार में लोगों का भरोसा जीत सकेगी? फिलहाल, बांकीपुर और दरभंगा की जीत ने जन सुराज को चर्चा में जरूर ला दिया है. लेकिन प्रशांत किशोर की रणनीति कितनी सफल होगी, यह आने वाले चुनावों में ही साफ होगा.

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