बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों पर शुक्रवार को वोटिंग होगी. चार स्नातक और चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में होने वाले इस चुनाव के लिए बुधवार को प्रचार थम गया. अब सभी उम्मीदवार वोटरों से संपर्क करने और अपने पक्ष में ज्यादा से ज्यादा वोट डलवाने की कोशिश में जुटे हैं. नतीजे 27 अक्टूबर को आएंगे.
इस चुनाव में बीजेपी और जेडीयू के लिए अपनी ताकत दिखाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस और आरजेडी के बीच तालमेल की कमी ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी सभी आठ सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ऐसे में इस चुनाव के नतीजे बिहार की आगे की राजनीति के लिए कई संकेत दे सकते हैं.
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बीजेपी-जेडीयू 4-4 सीटों पर
एनडीए में बीजेपी और जेडीयू चार-चार सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं. बीजेपी ने पटना शिक्षक सीट से नवल किशोर यादव, कोसी स्नातक से डॉ. एनके यादव, दरभंगा स्नातक से सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक सीट से नरेंद्र प्रसाद सिंह को उम्मीदवार बनाया है. नवल किशोर यादव, एनके यादव और सर्वेश कुमार पहले से इन सीटों पर विधान परिषद के सदस्य हैं. पार्टी ने तीन पुराने चेहरों पर फिर भरोसा जताया है.
जेडीयू ने पटना स्नातक सीट से नीरज कुमार, तिरहुत स्नातक से अभिषेक झा, सारण शिक्षक से आनंद पुष्कर और दरभंगा शिक्षक से घनश्याम राय को मैदान में उतारा है. जेडीयू के लिए यह चुनाव इसलिए भी अहम है क्योंकि उसे अपने पुराने राजनीतिक आधार को बनाए रखने के साथ नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में एनडीए की ताकत भी दिखानी है.

पटना स्नातक सीट पर जेडीयू के नीरज कुमार के सामने अपनी ही पार्टी के विधायक अनंत सिंह की चुनौती चर्चा में रही है. अनंत सिंह ने नीरज कुमार के बजाय जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया है. दोनों नेताओं के बीच पुराना विवाद है. अनंत सिंह ने नीरज कुमार पर कई आरोप लगाए हैं, जिन्हें नीरज कुमार ने खारिज किया है.
यह मामला सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है. नतीजे बताएंगे कि जेडीयू का संगठन अपने उम्मीदवार के पीछे कितना मजबूती से खड़ा रहा और अनंत सिंह के विरोध का कितना असर पड़ा. अगर नीरज कुमार जीतते हैं तो पार्टी इसे अपने संगठन की ताकत के रूप में पेश कर सकती है. अगर उन्हें नुकसान होता है तो पार्टी के अंदर तालमेल और अनुशासन को लेकर सवाल उठ सकते हैं.
विपक्ष में दिलचस्प स्थिति
इस चुनाव में सबसे दिलचस्प स्थिति विपक्षी खेमे की है. विधानसभा चुनाव में साथ रहने वाले कांग्रेस और आरजेडी कई सीटों पर अलग-अलग उम्मीदवारों के साथ मैदान में हैं. दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर सहमति नहीं बन पाई और इसका असर चुनाव पर दिख रहा है.
आरजेडी ने पटना शिक्षक सीट से संजीव कुमार सिंह, पटना स्नातक से दिलीप कुमार, कोसी स्नातक से नितेश कुमार, दरभंगा स्नातक से अनिल कुमार झा, सारण शिक्षक से प्रो. जयराम यादव, तिरहुत स्नातक से डॉ. रश्मि विनायक गौतम और दरभंगा शिक्षक सीट से डॉ. कुंवर राय को उम्मीदवार बनाया है.
कांग्रेस ने दरभंगा शिक्षक सीट से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा, पटना शिक्षक से डॉ. संजय यादव, पटना स्नातक से डॉ. असदुल्लाह खान, दरभंगा स्नातक से रजनीकांत पाठक और कोसी स्नातक से मनोज कुमार जायसवाल को मैदान में उतारा है. पटना स्नातक, दरभंगा स्नातक और कोसी स्नातक सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवार आमने-सामने हैं.
इससे फायदा किसे होगा?
इसका सीधा फायदा किसे होगा, यह अभी कहना मुश्किल है. अगर कांग्रेस और आरजेडी के वोट बंटते हैं तो एनडीए या किसी दूसरे उम्मीदवार को इसका फायदा मिल सकता है. लेकिन अगर किसी उम्मीदवार की अपनी मजबूत पकड़ है तो वह अलग-अलग दलों के वोटरों का समर्थन भी हासिल कर सकता है.
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. पार्टी ने पटना स्नातक से अनुज सिंह, दरभंगा स्नातक से डॉ. मोहम्मद इम्तियाज नूरानी, तिरहुत स्नातक से डॉ. विमोहन कुमार और कोसी स्नातक से रजनीश रंजन को मैदान में उतारा है.

शिक्षक सीटों पर जन सुराज की ओर से पटना में दिव्या ज्योति, दरभंगा में एसपी राय, तिरहुत में भूषण झा और सारण में अफाक अहमद चुनाव लड़ रहे हैं. अफाक अहमद पहले भी इस सीट से विधान परिषद के सदस्य रहे हैं.
जन सुराज के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक पकड़ दिखाने का मौका है. खासकर पटना स्नातक सीट पर अनुज सिंह को अनंत सिंह का समर्थन मिलने से मुकाबले पर नजरें टिकी हैं. हालांकि, इस समर्थन का वोटों में कितना असर होगा, यह नतीजों के बाद ही साफ होगा.
8 सीटों पर 150 उम्मीदवार
इन चुनावों में कुल 150 उम्मीदवार मैदान में हैं. आठ सीटों के लिए करीब 5.32 लाख मतदाता हैं. हालांकि, स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग है. यहां वोट देने वाले मतदाता सीमित और अलग श्रेणी के हैं. इसलिए इन नतीजों को पूरे बिहार की जनता की राय मानना सही नहीं होगा.
फिर भी नतीजों का राजनीतिक महत्व रहेगा. अगर बीजेपी और जेडीयू अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो एनडीए इसे अपने संगठन और सरकार के पक्ष में समर्थन के तौर पर पेश कर सकता है. वहीं, विपक्ष की जीत से कांग्रेस और आरजेडी को अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने का मौका मिलेगा. लेकिन दोनों दलों के बीच मुकाबले वाली सीटों पर हार-जीत से भविष्य में उनके चुनावी तालमेल पर सवाल उठ सकते हैं.
जन सुराज अगर कुछ सीटों पर मजबूत प्रदर्शन करती है तो प्रशांत किशोर को बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाने का एक नया आधार मिल सकता है. अगर पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहता है तो उसके संगठन और वोटरों के बीच पकड़ पर सवाल उठेंगे.
27 को आएंगे नतीजे
अब सबकी नजर 23 अक्टूबर की वोटिंग और 27 अक्टूबर की मतगणना पर है. यह चुनाव सरकार बनाने या गिराने वाला नहीं है, लेकिन इसके नतीजे बताएंगे कि बिहार में एनडीए की पकड़ कितनी मजबूत है, विपक्षी दलों के बीच बिखराव का कितना असर है और जन सुराज कितनी चुनौती पेश कर पा रही है.
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