- तुषार कुमार ने ब्रिटेन आकर भाषा और सांस्कृतिक अंतर के कारण शुरुआत में कठिनाइयों का सामना किया था
- तुषार ने कहा कि प्रवासी अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ ब्रिटिश समाज में पूरी तरह घुल-मिल सकते हैं
- मेयर तुषार ने यूरोप में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के पीछे आवास संकट, आर्थिक असुरक्षा को मुख्य कारण बताया
रोहतक से 10 साल की उम्र में ब्रिटेन गए तुषार कुमार 23 साल की उम्र में मेयर बन हैं. उनकी मां प्रवीन रानी भी एक काउंसिल की मेयर हैं. एनडीटीवी वर्ल्ड समिट में दोनों पहुंचे तो अपनी सक्सेस स्टोरी से लेकर मौजूदा समय पर खुलकर बात की. तुषार ने बताया कि सबसे बड़ी दिक्कत किसी दूसरे देश जाने में वहां की भाषा को अपनाने में होती है. साथ ही उन्होंने आजकल के माहौल पर भी बात की.
10 साल पहले कैसा था माहौल?
तुषार ने याद करते हुए बताया, 'जब मैं ब्रिटेन पहुंचा तो मुझे अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी. इसलिए दोस्त बनाना और लोग आपस में क्या बात कर रहे हैं, यह समझना मेरे लिए काफी मुश्किल था. शुरुआत में मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा और मुझे अपने घर की बहुत याद आती थी. मैं अपनी मां से रो-रोकर कहता था कि मुझे वापस जाना है, यह तो बिल्कुल अलग देश है. मुझे यहां का मौसम भी पसंद नहीं आ रहा था. मुझे गर्म मौसम पसंद है, इसलिए मुझे लग रहा था कि शायद मैं यहां कभी घुल-मिल नहीं पाऊंगा. लेकिन ब्रिटेन के लोगों ने बहुत गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया.'
क्या अब वैसा माहौल नहीं?
तुषार ने कहा, 'देखिए, मुझे लगता है कि इमिग्रेशन को लेकर लोगों की सोच पहले के मुकाबले सोच जरूर बदल गई है. जब हम 2013 में यहां आए थे, तब हालात आज से बहुत अलग थे. मुझे लगता है कि यह कहना गलत होगा कि कोई इमिग्रेशन समस्या नहीं है; इमिग्रेशन की समस्या निश्चित रूप से है. लेकिन हमें इमिग्रेशन नीति पर चर्चा या बहस करने और किसी के प्रति नफरत रखने के बीच फर्क करना होगा. यह दूसरी वाली बात (नफरत रखना) बहुत ही गलत है. और मुझे लगता है कि अगर लोग किसी देश में कानूनी तरीके से आते हैं, तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि सरकार ही तो उन्हें अंदर आने देती है, है ना?'
फिर खुद ही उन्होंने जवाब दिया, 'प्रवासी एक बेहतर भविष्य और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए मौकों की उम्मीद लेकर दूसरे देश आते हैं, और सरकार ही उन्हें देश में आने की अनुमति देती है. इसलिए, अगर ये लोग समाज में घुल-मिल जाते हैं, तो सरकार को भी खुले दिल से उनका स्वागत करना चाहिए. मुझे लगता है कि 'समाज में घुल-मिल जाने' और 'पूरी तरह से उसी संस्कृति में ढल जाने' के बीच बहुत बड़ा फर्क है. मेरा मानना है कि ज्यादा 'ब्रिटिश' बनने के लिए आपको अपनी भारतीय विरासत को छोड़ने की जरूरत नहीं है. आप ब्रिटिश भी हो सकते हैं और साथ ही अपनी भारतीय विरासत पर गर्व भी कर सकते हैं. हालांकि लोगों की सोच जरूर बदल रही है, लेकिन मुझे लगता है कि वे अभी भी प्रवासियों का स्वागत करने के लिए तैयार हैं. हमें बस कड़ी मेहनत करनी है और हमेशा की तरह समाज में अपना योगदान देना है.'
यूरोप में क्यों हो रहे प्रदर्शन?
मेयर तुषार ने कहा, 'मुझे लगता है कि इसके पीछे कई अलग-अलग कारण हैं. यह सिर्फ़ इमिग्रेशन का मामला नहीं है. मुझे लगता है कि हाउसिंग संकट, आर्थिक असुरक्षा और सार्वजनिक संस्थाओं पर से लोगों का भरोसा उठ जाना जैसे कई कारण हैं जिनकी वजह से पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. मुझे लगता है कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह समाज में आपसी तालमेल बनाए रखे. लोग एक-दूसरे की अलग-अलग पृष्ठभूमि, विरासत और वे कहां से आए हैं, इसे समझें. क्योंकि हर कोई अपने और अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य चाहता है. कोई भी एक-दूसरे से लड़ना नहीं चाहता. आखिरकार, हर कोई इंसान है. चाहे उसकी पृष्ठभूमि या विरासत कुछ भी हो. इसलिए, यह बहुत जरूरी है कि हम एक-दूसरे के साथ सम्मान और गरिमा के साथ पेश आएं. अभी का समय थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन मुझे यकीन है कि हम फिर से उस दौर में लौटेंगे जब हम और अधिक प्रवासियों का स्वागत कर सकेंगे. फिलहाल, मुझे लगता है कि बॉर्डर पर ज्यादा नियंत्रण की जरूरत है और यह सरकार की जिम्मेदारी है.'
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