What happens when you fast for 30 days in Ramadan? रमज़ान के दौरान आप एक महीने तक हर दिन सुबह से शाम तक रोज़ा रखते हैं. कुछ भी खाना-पीना मना होता है. रोज़ाना फास्टिंग का शरीर के कई सिस्टम पर असर पड़ता है. लेकिन हम आम तौर पर इसके आध्यात्मिक पहलुओं की चर्चा करते हैं, जबकि शारीरिक बदलाव का ध्यान रखना और उनके बारे में जानना भी ज़रूरी है.
एनर्जी और फैट का टूटना
- रोज़े के दौरान हमारा शरीर एनर्जी के लिए सबसे पहले लिवर और मसल्स में जमा ग्लूकोज का इस्तेमाल करता है.
- आमतौर पर इससे 12 घंटे तक एनर्जी मिलती है. इसके खत्म होने पर शरीर फैट को कीटोन और फैटी एसिड में तोड़ना शुरू करता है. इस बदलाव से शरीर के लिए पहले से जमा एनर्जी का इस्तेमाल करना आसान हो जाता है.
- ऐसे में आपके शरीर को धीरे-धीरे बेहतर ढंग से फैट बर्न करने में मदद मिल सकती है, यदि आप सुहूर (सुबह होने से पहले) और इफ्तार (सूरज डूबने के बाद) संतुलित मात्रा में प्रोटीन, कॉम्प्लेक्स कार्ब्स और हेल्दी फैट लेते हैं.
- दिन में कैलोरी कम लेने की वजह से शरीर को कम इंसुलिन की ज़रूरत होती है. इससे सही ब्लड शुगर लेवल बना रहता है और इंसुलिन बेहतर ढंग से काम करता है. यह उनके लिए अच्छा है जिन्हें कुछ मेटाबोलिक समस्याएं हैं.

डाइजेस्टिव सिस्टम का अनुकूलन
- रमजान के दौरान डाइजेस्टिव सिस्टम को बार-बार थोड़ा-थोड़ा खाने के बजाय दो बार पूरा खाने की आदत पड़ जाती है. इससे डाइजेस्टिव सिस्टम को अधिक समय तक आराम मिलता है.
- वह न्यूट्रिएंट्स को बेहतर ढंग से एब्ज़ॉर्ब करता है. हालांकि रमजान के पहले कुछ दिनों में पेट फूलना और एसिडिटी महसूस हो सकती है, लेकिन धीरे-धीरे शरीर को इसकी आदत हो जाती है और आमतौर पर ये चीजें नहीं महसूस होती हैं.
- लेकिन शरीर को हाइड्रेटेड और डाइजेशन सही रखने के लिए इफ़्तार और सुहूर के बीच पर्याप्त पानी पीना ज़रूरी है.
हार्मोन्स पर असर
रोज़े के दौरान कुछ खास हार्मोन्स में भी बदलाव आता है जो भूख, पेट भरा होने और मेटाबॉलिज्म पर नियंत्रण रखते हैं. खाने से पहले भूख का संकेत देने वाला हॉर्माेन घ्रेलिन बढ़ जाता है लेकिन धीरे-धीरे यह स्टेबल हो जाता है. इससे भूख पर नियंत्रण रहता है और यह हमें ज्यादा खाने से रोकता है. लेप्टिन वह हार्मोन है जो आपको पेट भरा होने का संकेत देता है. इसमें भी बदलाव आता है जिससे खाने की मात्रा पर बेहतर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है.
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रमजान के दौरान नींद का पैटर्न भी बदलता है जिससे कोर्टिसोल लेवल बढ़ और घट सकता है. लेकिन अच्छी नींद और पर्याप्त पानी पीने से कोर्टिसोल का लेवल स्टेबल रहता है. रोज़े में आपके ग्रोथ हॉर्माेन लेवल भी बढ़ जाते हैं. इससे आपके शरीर को फैट बर्न करने और मसल मास बनाए रखने में मदद मिलती है.
कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ
थोड़ी फास्टिंग दिल की सेहत के लिए अच्छा है. इसी तरह तय समय पर खाना सेहत के लिए अच्छा है और स्नैक्स कम करने से ब्लड प्रेशर कम हो सकता है और कोलेस्ट्रॉल लेवेल भी सुधर सकता है. यह खास कर उन लोगों में देखा जाता है जिन्हें हाइपरटेंशन या कोलेस्ट्रॉल की कुछ समस्या हो. इसलिए यह जरूरी है कि सुहूर और इफ़्तार में संतुलित खाना खाएं. इससे बहुत फर्क पड़ता है.
मानसिक स्फूर्ति और मानसिक कार्य क्षमता में वृद्धि
रोज़ा रखने के दौरान दिमाग एनर्जी के लिए फैट से मिलने वाले कीटोन्स का इस्तेमाल करता है. बहुत से रोजेदार पहले सप्ताह के बाद मानसिक स्फूर्ति और मानसिक कार्य क्षमता में वृद्धि महसूस करते हैं. हालांकि कुछ लोगों को ब्लड शुगर लेवेल बदलने की वजह से शुरू में मूड स्विंग हो सकता है, लेकिन एक बार खाना संतुलित हो जाने पर आमतौर पर यह परेशानी नहीं रहती है. अच्छी तरह सोने और हाइड्रेटेड रहने से कॉन्संट्रेशन और मानसिक स्फूर्ति बनी रहती है.
इम्यून सिस्टम और सेलुलर रिपेयर
रोज़ा रखने का एक बड़ा फायदा शरीर के खराब सेल्स की जगह हेल्दी सेल्स बनना है. लंबे समय तक खाए-पिए बिना रहने से सिस्टम को ब्रेक मिलता है. इससे इम्यून फंक्शन मजबूत होता है. इस संबंध में शोध जारी हैं.
जोखिम और सुरक्षा के उपाय
मोटे तौर पर स्वस्थ वयस्कों का रोज़ा रखना सुरक्षित है. लेकिन डायबिटीज, किडनी या दिल की बीमारी जैसी समस्याएं हों तो सावधानी बरतने की ज़रूरत है. ऐसे लोग रोजा शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें. सुहूर स्किप करना, इफ्तार में ज्यादा खाना या पर्याप्त पानी नहीं पीना कई परेशानियांे की वजह बन सकती है जैसे अंदर से थकान, पाचन में परेशानी या ब्लड शुगर का स्पाइक होना आदि. इसलिए रोज़ा के दौरान विशेष सुरक्षा के लिए खाने की मात्रा पर कंट्रोल करना होगा. तली-भुनी चीजें और मीठा खाने से परहेज जरूरी है. इस बीच पर्याप्त पानी पीना अधिक जरूरी है.
लंबे समय का अनुभव अच्छा देखा गया है
- बहुत से लोगों ने यह अनुभव किया है कि रमज़ान समाप्त होने के नजदीक भूख पर उनका बेहतर कंट्रोल हो जाता है.
- एनर्जी लेवल भी अधिक स्टेबल होता है और खाना पचता भी अच्छा है. इस तरह वेट लॉस करना आसान हो सकता है.
- प्रोसेस्ड फ़ूड खाने की इच्छा भी कम हो जाती है.
- ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल लेवल ठीक होने से दिल की सेहत पर फर्क पड़ता है.
- इस दौरान खाने और सोने का सही से ध्यान रखें तो मूड और मेंटल फ़ोकस भी बेहतर हो सकता है.
- एक महीने से अधिक फास्टिंग के परिणामस्वरूप शरीर को खाने और सोने की एक अच्छी आदत हो जाती है.
- आप संतुलित खाना खाते हैं, पर्याप्त पानी पीते हैं और सही नींद लेते हैं.
- कुल मिला कर आपका मेटाबोलिक हेल्थ, पाचन की क्षमता, हार्माेनल बैलेंस और मेंटल फ़ोकस बढ़ता है.
- रोजे में फास्टिंग का शरीर पर प्रभाव अलग-अलग हो सकता है, लेकिन महीने भर रोजा रखने से यह साफ़ हो जाता है कि शरीर को सही खाना और आराम मिले तो वह बखूबी एडजस्ट कर सकता है और अधिक तंदुरुस्त हो सकता है.
(Authored by डॉ. आशीष गौतम, प्रिंसिपल डायरेक्टर, रोबोटिक एवं लेप्रोस्कोपिक सर्जरी, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज, नई दिल्ली)
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