AI के जमाने में पढ़ाई का तरीका और तकनीक दोनों बदल चुके हैं. बहुत से बच्चे पढ़ने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन, पावर स्कूल (Power School) से जुड़े डेटा ब्रीच की खबर के बाद पूरी दुनिया के माता-पिता को चिंता में डाल दिया है. 2025 की शुरुआत में सामने आए इस बड़े साइबर हमले में 6 करोड़ से ज्यादा छात्रों और 1 करोड़ शिक्षकों की निजी जानकारी लीक हो गई. आज जब पढ़ाई का बड़ा हिस्सा मोबाइल, टैबलेट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट हो चुका है, तब यह घटना हमें डिजिटल सुरक्षा की अहमियत का एहसास कराती है. पेरेंट्स कैसे अपने बच्चों को इस डेटा ब्रीच से बचा सकते हैं और क्या कदम उठाने चाहिए. आइए जानते हैं.
कैसे हुआ इतना बड़ा डेटा लीक?
डिजिटल एजुकेशन प्लेटफॉर्म और स्कूल द्वारा दिए गए डिवाइस बच्चों की पढ़ाई को आसान बनाते हैं. लेकिन इन्हीं डिवाइस और लर्निंग सिस्टम को हैकर्स ने निशाना बनाया. इस डेटा ब्रीच में छात्रों और शिक्षकों की कई संवेदनशील जानकारियां सामने आईं, जैसे:
- नाम और जन्मतिथि
- घर का पता
- क्लास और ग्रेड
- कुछ मामलों में सोशल सिक्योरिटी नंबर
- मेडिकल जानकारी
यह जानकारी साइबर अपराधियों के हाथ लगने से आइडेंटिटी थेफ्ट (पहचान की चोरी) और ब्लैकमेलिंग का खतरा बढ़ जाता है.

डिजिटल पढ़ाई, सुविधा या जोखिम?
कोरोना महामारी के बाद ऑनलाइन पढ़ाई आम हो गई. माता-पिता ने बच्चों को स्मार्टफोन और लैपटॉप दिए ताकि उनकी पढ़ाई न रुके. लेकिन, कई बार हम यह भूल जाते हैं कि:
- हर ऐप सुरक्षित नहीं होता.
- कमजोर पासवर्ड से डेटा चोरी हो सकता है.
- पब्लिक वाई-फाई पर पढ़ाई करना जोखिम भरा हो सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों का डेटा अपराधियों के लिए सॉफ्ट टारगेट होता है क्योंकि बच्चे खुद अपनी जानकारी की सुरक्षा को लेकर जागरूक नहीं होते.
पेरेंट्स को क्या करना चाहिए?
1. मजबूत पासवर्ड बनाएं: हर प्लेटफॉर्म के लिए अलग और मजबूत पासवर्ड रखें. पासवर्ड में अक्षर, नंबर और स्पेशल कैरेक्टर शामिल करें.
2. टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) चालू करें: जहां भी संभव हो, 2FA ऑन करें. इससे अकाउंट हैक होने की संभावना कम हो जाती है.
3. बच्चों को साइबर सुरक्षा सिखाएं: उन्हें समझाएं कि अनजान लिंक पर क्लिक न करें और किसी से भी ओटीपी या निजी जानकारी साझा न करें.
4. डिवाइस अपडेट रखें: मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप का सॉफ्टवेयर समय-समय पर अपडेट करते रहें.
5. स्कूल से जानकारी लें: अगर आपके बच्चे का स्कूल डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करता है, तो स्कूल प्रशासन से उनकी डेटा सुरक्षा पॉलिसी के बारे में पूछें.
6. संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखें: अगर बच्चे के अकाउंट में कोई अजीब गतिविधि दिखे, तो तुरंत पासवर्ड बदलें और संबंधित संस्था को सूचना दें.
US के लेखक जोनाथन हैड्ट, जिनकी किताब "द एंग्ज़ियस जेनरेशन" में कहा गया है कि स्मार्टफोन ने बच्चों के दिमाग को बदल दिया है, ने माता-पिता से स्मार्टफोन एक्सेस पर मिलकर काम करने को कहा है ताकि बच्चों के पास स्मार्टफोन न हो, यह एक आम बात हो जाए.
उन्होंने इस साल की शुरुआत में कहा था कि एक बच्चा यह कहकर "हमारा दिल तोड़ता है" कि वह अपने साथियों के ग्रुप से अलग है क्योंकि उसके पास फोन नहीं है. मिस्टर हैड्ट 14 साल की उम्र से पहले कोई स्मार्ट फोन या 16 साल की उम्र से पहले कोई सोशल मीडिया नहीं रखने की वकालत करते हैं.

क्यों है यह मामला गंभीर?
बच्चों की जानकारी लंबे समय तक इस्तेमाल की जा सकती है. कई बार पहचान की चोरी का पता सालों बाद चलता है. इसलिए यह सिर्फ एक टेक्निकल समस्या नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का सवाल है.
डिजिटल शिक्षा समय की जरूरत है, लेकिन सुरक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी है. बच्चों को फोन देना गलत नहीं है, लेकिन उसके साथ साइबर जागरूकता देना अनिवार्य है.
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