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85+ साल की हार्वर्ड स्टडी का खुलासा, इस तरह की नौकरी करने वाले लोग सबसे ज्यादा नाखुश होते हैं 

अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक मशहूर स्टडी यही बताती है कि नौकरी में असली खुशी पैसे या पद से नहीं, बल्कि लोगों से जुड़ाव से आती है. खास बात ये है कि ये नतीजा चंद महीनों या सालों के रिसर्च से नहीं, बल्कि 85 सालों की लंबी स्टडी के बाद सामने आया है.

85+ साल की हार्वर्ड स्टडी का खुलासा, इस तरह की नौकरी करने वाले लोग सबसे ज्यादा नाखुश होते हैं 
ये नौकरी करने वाले हैं सबसे ज्यादा नाखुश.

अच्छी सैलरी, बढ़िया सुविधाएं और बड़ा पद … पहली नजर में यही चीजें किसी भी नौकरी को परफेक्ट बनाती हैं. लेकिन अगर रोज काम पर जाकर मन ही न लगे, बात करने वाला कोई न हो और दिन खत्म होते-होते थकान के साथ अकेलापन भी चिपक जाए, तो तस्वीर बदल जाती है. अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक मशहूर स्टडी यही बताती है कि नौकरी में असली खुशी पैसे या पद से नहीं, बल्कि लोगों से जुड़ाव से आती है. खास बात ये है कि ये नतीजा चंद महीनों या सालों के रिसर्च से नहीं, बल्कि 85 सालों की लंबी स्टडी के बाद सामने आया है.

चुपचाप काम, सबसे ज्यादा नुकसान

स्टडी में सामने आया कि जिन जॉब्स में इंसानों से बातचीत कम होती है, वहां काम करने वाले लोग सबसे ज्यादा असंतोष महसूस करते हैं. जैसे ट्रक ड्राइविंग, नाइट शिफ्ट में सिक्योरिटी या बड़े वेयरहाउस में अकेले काम करना. टेक और डिलीवरी से जुड़ी नौकरियों में भी यही पैटर्न दिखा, जहां लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं, लेकिन टीम जैसा माहौल नहीं बन पाता. ऑनलाइन रिटेल या बड़े गोदामों में काम करने वालों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. एक ही शिफ्ट में काम करने के बावजूद लोग एक-दूसरे को ठीक से जान नहीं पाते, क्योंकि काम की रफ्तार इतनी तेज होती है कि बातचीत का मौका ही नहीं मिलता.

बातचीत के बीच भी अकेलापन

यह समस्या सिर्फ सोलो जॉब्स तक सीमित नहीं है. जिन नौकरियों में लोगों से लगातार बात करनी पड़ती है, वहां भी अकेलापन महसूस हो सकता है. खासकर कॉल सेंटर जैसी जगहों पर, जहां दिनभर नाराज या परेशान लोगों से बातचीत करनी पड़ती है. ऐसे काम में इमोशनल सपोर्ट की कमी रहती है. लगातार दबाव और बिना सपोर्ट के काम करने से इंसान खुद को अलग-थलग महसूस करने लगता है.

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अकेलापन सिर्फ दिमाग नहीं, शरीर पर भी असर डालता है

रिसर्च यह भी बताती है कि लंबे समय तक बना रहने वाला अकेलापन मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक तौर पर भी असर डालता है. उम्र बढ़ने के साथ यह खतरा और बढ़ जाता है. यह असर धूम्रपान, मोटापा या एक्सरसाइज की कमी जितना गंभीर हो सकता है. यानी काम के दौरान लोगों से कटे रहना सिर्फ एक दिन की परेशानी नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे पूरी सेहत को प्रभावित कर सकता है.

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बहुत मुश्किल नहीं है इसका समाधान

इस स्टडी में एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि इसका हल बहुत बड़ा नहीं है. छोटे-छोटे कनेक्शन ही फर्क डालते हैं. जैसे ऑफिस में किसी सहकर्मी से पांच मिनट बात करना, साथ में कॉफी पीना या किसी ग्रुप एक्टिविटी में शामिल होना. ऐसे छोटे पल लोगों को अपनापन महसूस कराते हैं, जो उन्हें सिर्फ काम से नहीं मिलता.

कंपनी का स्ट्रक्चर भी काफी मायने रखता है. अगर कर्मचारियों को टीम में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो रिश्ते बनाना आसान हो जाता है. लेकिन अगर माहौल ऐसा हो जहां हर कोई सिर्फ अपने काम में सिर झुकाकर लगा रहे, तो अनुभव बिल्कुल अलग होता है.

दोस्ती से बढ़ती है प्रोडक्टिविटी

स्टडी से जुड़े शोधकर्ताओं ने अपनी किताब में इस सोच का भी विरोध किया है कि ऑफिस में बातचीत समय की बर्बादी है. एक 2022 की रिपोर्ट में पाया गया कि जिन लोगों का ऑफिस में कोई करीबी दोस्त होता है, वे ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं और काम में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं. नौकरी चुनते वक्त लोग अक्सर सैलरी, बेनिफिट्स या आने-जाने का समय देखते हैं. लेकिन यह स्टडी बताती है कि असली फर्क वहां पड़ता है जहां आपको लोगों से जुड़ने का मौका मिलता है. मजबूत रिश्ते सिर्फ जिंदगी ही नहीं, बल्कि काम को भी बेहतर और संतुलित बनाते हैं.

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