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यूरोप में माता-पिता बच्चों को ऐसे बनाते हैं मजबूत और समझदार, Parenting Coach ने कहा हर पैरेंट को करने चाहिए ये 7 काम

पेरेंटिंग कोच रिद्धि देवराह के मुताबिक, यूरोप में बच्चों की परवरिश का तरीका थोड़ा अलग होता है. वहां बच्चों को बचपन से ही छोटे-छोटे काम खुद करना सिखाया जाता है. इससे वे धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनते हैं और जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना भी सीख जाते हैं.

यूरोप में माता-पिता बच्चों को ऐसे बनाते हैं मजबूत और समझदार, Parenting Coach ने कहा हर पैरेंट को करने चाहिए ये 7 काम
यूरोप के माता-पिता की ये 7 आदतें बच्चों को जल्दी बनाती हैं आत्मनिर्भर और समझदार
(Photo Credit: Freepik)

हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर समझदार, जिम्मेदार और अपने काम खुद करने वाला बने. लेकिन कई बार लाड-प्यार और चिंता में हम बच्चों की हर छोटी-बड़ी समस्या खुद ही हल कर देते हैं. इससे बच्चे धीरे-धीरे हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर होने लगते हैं. इसी कड़ी में मशहूर पेरेंटिंग कोच रिद्धि देवराह ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर एक पोस्ट शेयर की है. इस पोस्ट में उन्होंने यूरोप के कई परिवारों की कुछ ऐसी आदतों के बारे में बताया है, जो बच्चों को छोटी उम्र से ही आत्मनिर्भर बनाना सिखाती हैं. इन आदतों को अपनाकर कम उम्र से ही बच्चों में आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और सही फैसले लेने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है या बच्चों को कम उम्र में समझदार बनाया जा सकता है. आइए जानते हैं इनके बारे में-

यूरोपियन पैरेंटिंग से सीखें ये 7 जरूरी बातें

नंबर 1- बच्चों के हिसाब से नहीं चलती पूरी दुनिया

पेरेंटिंग कोच कहती हैं, यूरोप में माता-पिता अपना पूरा रूटीन बच्चों के हिसाब से नहीं बदलते, बल्कि बच्चा अपने पेरेंट्स की आदतों को अपनाता है. आसान भाषा में कहें, तो वहां माता-पिता चाय या कॉफी पी रहे हैं या किसी जरूरी बात पर चर्चा कर रहे हैं, तो उसे बीच में नहीं छोड़ते. बच्चा जिद करे, तो भी माता-पिता अपना काम पूरा करते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि वे बच्चों की परवाह नहीं करते, बल्कि वे उन्हें यह समझाते हैं कि हर समय हर चीज उनके मन की नहीं हो सकती. इससे धीरे-धीरे बच्चे इंतजार करना सीखते हैं, धैर्य रखते हैं और दूसरों की जरूरतों का भी सम्मान करना समझते हैं.

नंबर 2- हर परेशानी में तुरंत मदद नहीं की जाती

वहां कोई परेशानी होने पर पेरेंट्स तुरंत बच्चे की मदद नहीं करते हैं, बल्कि बच्चे की गलती से ही उसे चीजें सीखने का मौका देते हैं. जैसे- अगर बच्चा स्कूल का होमवर्क करना भूल गया, अपना खिलौना कहीं रखकर भूल गया या ठंड में जैकेट पहनना भूल गया, तो माता-पिता तुरंत उसकी परेशानी दूर नहीं करते. वे बच्चे को उसकी छोटी-सी गलती का नतीजा महसूस करने देते हैं. जैसे होमवर्क करने पर अगर बच्चे को परेशानी झेलनी पड़ी, तो अगली बार वह शायद समय पर वो काम करेगा, अगर खिलौना खो जाए, तो अगली बार बच्चा अपनी चीजों की कदर करता हुआ उसे हमेशा संभालकर रखेगा. यानी बच्चा खुद ही अपनी गलतियों से सीखता है और चीजों का ध्यान रखने लगता है. साथ ही उसे यह भरोसा होने लगता है कि वह अपनी मुश्किलों का हल खुद भी निकाल सकता है. यही आदत आगे चलकर उसे मजबूत बनाती है.

नंबर 3- छोटी उम्र से ही छोटे-छोटे काम दिए जाते हैं

पेरेंटिंग कोच कहती हैं, यूरोप के कई परिवारों में बच्चे अपने छोटे-छोटे काम खुद करते हैं. जैसे अगर उन्हें प्यास लगे तो वे खुद पानी का गिलास भरते हैं, रेस्तरां में अपना खाना खुद ऑर्डर करते हैं, छोटे-छोटे कामों में मदद करते हैं, जैसे खाने की टेबल लगाने में मदद करना, हल्का सामान उठाना या पास की दुकान से छोटी-छोटी चीजें ले आना. ये काम भले ही छोटे लगें, लेकिन इन्हीं से बच्चे सीखते हैं कि वे भी बहुत कुछ कर सकते हैं. जब बच्चे खुद काम करते हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे जिम्मेदारी लेना भी सीखते हैं.

नंबर 4- बोर होना भी बच्चों के लिए अच्छा होता है

आजकल बच्चे जैसे ही बोर होते हैं, उन्हें मोबाइल या टीवी दे दिया जाता है. लेकिन यूरोप में पेरेंट्स ऐसा नहीं करते. वे बच्चों से कहते हैं कि खुद सोचो, क्या करना है. शुरुआत में बच्चे थोड़ा परेशान होते हैं, लेकिन फिर वे खुद कोई खेल ढूंढ़ लेते हैं, ड्रॉइंग बनाते हैं, किताब पढ़ते हैं या कुछ नया करने की कोशिश करते है. इससे उनकी सोचने की क्षमता बढ़ती है और वे हर समय किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहते.

नंबर 5- परिवार की जरूरी बातें बच्चों से छिपाई नहीं जातीं

घर का खर्च कैसे चलता है, छुट्टियों का प्लान कैसे बनता है या कोई बड़ा फैसला कैसे लिया जाता है, ऐसी बातें बच्चों के सामने भी होती हैं.  इससे उन्हें समझ आता है कि घर कैसे चलता है और हर फैसले के पीछे किस तरह की सोच होती है. इससे बच्चों में कम उम्र से ही समझदारी आने लगती है और वे खुद को परिवार का जिम्मेदार हिस्सा मानने लगते हैं.

नंबर 6- बाहर खेलने और छोटे-छोटे काम करने की आजादी मिलती है

यूरोप में बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से थोड़ी-थोड़ी आजादी दी जाती है. जैसे पास की दुकान तक चले जाना, बाहर दोस्तों के साथ खेलना या छोटे-छोटे काम खुद करना. माता-पिता उन पर भरोसा दिखाते हैं. इससे बच्चे अपने फैसले लेना सीखते हैं, सही और गलत का फर्क समझते हैं और मुश्किल हालात का सामना करने का हौसला भी उनके अंदर आता है.

नंबर 7- खुशी से ज्यादा जरूरी है बच्चों का काबिल बनना

इन सब से अलग पेरेंटिंग कोच कहती हैं, यूरोप के कई माता-पिता का मानना है कि बच्चे को हर समय खुश रखना सबसे जरूरी नहीं है. ज्यादा जरूरी यह है कि वह जीवन की मुश्किलों का सामना करना सीखे. जब बच्चा अपने दम पर कोई काम पूरा करता है, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, तो उसे खुद पर भरोसा होने लगता है. यही भरोसा आगे चलकर उसे आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और मजबूत इंसान बनाता है.

रिद्धि देवराह कहती हैं, हर देश और हर परिवार का बच्चों को पालने का तरीका अलग होता है. कोई भी तरीका पूरी तरह सही या गलत नहीं कहा जा सकता. लेकिन एक बात जरूर सीखने लायक है कि बच्चों की हर समस्या का हल तुरंत देने के बजाय उन्हें खुद कोशिश करने का मौका देना चाहिए. जब बच्चे खुद काम करना सीखते हैं, तभी वे जिम्मेदार, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बनते हैं. यही आदतें आगे चलकर उन्हें जिंदगी की बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करती हैं.

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