- कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को कर्मचारियों के चयन में पूर्ण अधिकार प्राप्त है और इसमें कुछ गलत नहीं है
- न्यायालय ने चुनाव के दौरान दखल देने से इनकार किया और कहा कि पक्षपात के आरोपों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है
- मतगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए माइक्रो-ऑब्जर्वर, एजेंट और CCTV कैमरे का इंतजाम होता है
पश्चिम बंगाल में दूसरे और अंतिम चरण की वोटिंग के बाद अब सभी की निगाहें 4 मई को आने वाले नतीजों पर हैं. लेकिन नतीजों से पहले टीएमसी के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट से एक बुरी खबर आई है. दरअसल, हाईकोर्ट ने टीएमसी की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसके तहत उसने आयोग द्वारा केंद्र सरकार और पीएसयू कर्मचारियों को मतगणना के दिन सुपरवाइजर और सहायक के रूप में नियुक्त करने का विरोध किया था. कोर्ट ने कहा है कि ऐसी नियुक्तियां पूरी तरह से चुनाव आयोग के अपने अधिकार क्षेत्र में आती हैं और इनमें कोई भी गैर-कानूनी बात या अधिकार क्षेत्र की कमी नहीं है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव की कोर्ट ने लागू हैंडबुक के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है जो यह ज़रूरी करे कि चुनाव सिर्फ़ राज्य सरकार के कर्मचारियों में से ही किया जाए; अधिकारी केंद्रीय या राज्य सेवाओं, जिनमें PSU भी शामिल हैं, से कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं.
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TMC के वकील ने कोर्ट से क्या कहा
बेंच ने याचिकाकर्ता (TMC) की आशंकाओं को सिर्फ़ अंदाज़ा बताया और कहा कि उनके पास कोई सबूत नहीं है. कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि किसी भी साबित हुई अनियमितता को 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 100 के तहत चुनाव याचिका के ज़रिए चुनौती दी जा सकती है. याचिकाकर्ता की तरफ़ से पेश होते हुए, वरिष्ठ वकील और TMC सांसद कल्याण बंदोपाध्याय ने दलील दी कि विवादित निर्देश अधिकार क्षेत्र से बाहर था और चुनाव आयोग की अपनी ही हैंडबुक से अलग था, जिसमें ऐसी भूमिकाओं के लिए केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की नियुक्ति ज़रूरी नहीं बताई गई है. उन्होंने तर्क दिया कि जहां माइक्रो-ऑब्ज़र्वर केंद्रीय सरकार या PSU कर्मचारियों में से ही चुने जाने चाहिए, वहीं इस शर्त को गिनती सुपरवाइज़र और सहायकों तक बढ़ाना मनमाना था और यह सिर्फ़ पश्चिम बंगाल में ही होने वाला एक अनोखा तरीका था.
TMC ने पक्षपात को लेकर भी जताई चिंता
टीएमसी ने संभावित पक्षपात को लेकर भी चिंता जताई और आरोप लगाया कि चूँकि केंद्रीय सरकार पर भारतीय जनता पार्टी का नियंत्रण है, इसलिए केंद्रीय सरकार के कर्मचारी प्रभावित हो सकते हैं, जिससे सभी के लिए समान अवसर (level playing field) की स्थिति बिगड़ सकती है.याचिका का विरोध करते हुए, वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्रि नायडू और जिष्णु चौधरी, जो क्रमशः चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी की तरफ़ से पेश हुए थे, ने दलील दी कि यह याचिका पूरी तरह से आशंकाओं पर आधारित थी और इसमें पक्षपात का कोई ठोस सबूत नहीं था. उन्होंने कहा कि यह निर्देश गिनती की प्रक्रिया में पारदर्शिता और ईमानदारी को मज़बूत करने के लिए जारी किया गया था.
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