देशभर में शारदीय नवरात्र की धूम है. हर दुर्गा मंदिर में परंपरा के अनुसार पूजा हो रही है. भक्तों की कतारें लगी हैं. भजन, गीत और दुर्गा सप्तशती के मंत्रों से वातावरण भक्तिमय हो गया है. इसी कड़ी में आज हम आपको ले चल रहे हैं सहरसा जिले के बनगांव स्थित भगवती मंदिर. जहां की परंपरा पूरे देश से अलग है. जहां दिन-रात अखंड सप्तशती पाठ होता है. और उसमें आधी संख्या महिलाओं की होती है.
बनगांव सहरसा जिला मुख्यालय से महज आठ किलोमीटर दूर बसा है. यहां स्थित भगवती स्थान आज हर श्रद्धालु को अपनी ओर खींच रहा है. वैसे तो देश के सभी देवी मंदिरों में पूजा हो रही है. लेकिन बनगांव का यह मंदिर अपनी विशिष्ट परंपरा के लिए सबसे अलग है. यहां अहर्निश यानी दिन-रात दुर्गा सप्तशती का पाठ चलता रहता है.
नौ दिन चलता है अखंड पाठ
कलशस्थापन के साथ शुरू होने वाला यह पाठ नवमी तक बिना रुके अखंड रूप से चलता है. इस पाठ में प्रतिदिन गांव के लगभग 40 साधक भाग लेते हैं. इनमें आधी संख्या महिलाओं और लड़कियों की होती है. यह अपने आप में एक अद्भुत दृश्य है. जहां संस्कृत के श्लोकों की गूंज में महिलाओं की आवाज भी बराबरी से सुनाई देती है.
साधक सप्तशती में देवी दुर्गा के 108 नामों के साथ पाठ का आरंभ करते हैं. इसके बाद कवच, अर्गला, कीलक और फिर सभी तेरह अध्यायों का पाठ किया जाता है. पूरा पाठ शुद्ध संस्कृत में होता है. पाठ करने वाले साधक बारी-बारी से आते हैं. एक साधक पाठ करता है, दूसरा विश्राम करता है. इस तरह यह श्रृंखला नौ दिनों तक टूटती नहीं है.
मंदिर परिसर में दिन हो या रात, सप्तशती की ध्वनि गूंजती रहती है. भक्तों का कहना है कि इस ध्वनि को सुनकर ही मन को शांति मिल जाती है. कई श्रद्धालु दूर-दूर से सिर्फ इस अखंड पाठ को सुनने के लिए यहां आते हैं.

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मंदिर में वरदायिनी देवी की प्रतिमा
बनगांव के पंडित विवेकानंद मिश्रा बताते हैं कि मंदिर में स्थापित देवी वरदायिनी हैं. देवी के एक हाथ में अमृत पात्र है तो दूसरा हाथ देने की मुद्रा में है. इसका अर्थ है कि यहां आने वाला कोई भी श्रद्धालु खाली हाथ नहीं लौटता है. श्रद्धा से मांगने वालों की हर मुराद पूरी होती है.
इसीलिए इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था बहुत गहरी है. नवरात्र में तो यह आस्था और भी बढ़ जाती है. सुबह से लेकर देर रात तक मंदिर में भक्तों का आना-जाना लगा रहता है. कोई मन्नत मांगने आता है. कोई पाठ में शामिल होने आता है. कोई सिर्फ देवी के दर्शन के लिए आता है.
मंदिर की एक और खास बात है संध्या आरती. संध्याकाल में मंदिर परिसर में भव्य आरती होती है. इस आरती में तीन सौ से चार सौ लोग शामिल होते हैं. ढोल, नगाड़े, घंटी और शंख की आवाज से पूरा गांव गूंज उठता है.
आरती के समय ऐसा लगता है मानो पूरा बनगांव ही भगवती की भक्ति में डूब गया हो. बच्चे, बूढ़े, महिलाएं और पुरुष, सभी एक साथ आरती में शामिल होते हैं. यह नजारा देखने लायक होता है.

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1996 से चली आ रही सप्तशती पाठ की परंपरा
पंडित उग्रसेन झा कहते हैं कि नौ दिनों तक अखंड रूप से चलने वाले इस पाठ में शामिल होने के लिए लोग पहले से अपना नाम दर्ज करा देते हैं. फिर उनकी बारी आने से पहले उन्हें बुला लिया जाता है.
उग्रसेन झा ने बताया कि बनगांव के भगवती मंदिर में अखंड सप्तशती पाठ की परंपरा साल 1996 में गांव के ही अभिमन्यु खां ने शुरू की थी. अभिमन्यु खां नेतरहाट विद्यालय रांची के प्रधानाध्यापक थे. वे संस्कृत और देवी उपासना के बड़े ज्ञाता थे. उनकी मृत्यु के बाद भी यह परंपरा अनवरत रूप से चल रही है.
आज गांव की नई पीढ़ी भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा से निभा रही है. पाठक श्रद्धा से शामिल होते रहे हैं. यह परंपरा अब गांव की पहचान बन गई है.

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मंदिर की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता महिलाओं की भागीदारी है. आमतौर पर संस्कृत पाठ में महिलाओं की संख्या कम देखी जाती है. लेकिन बनगांव में ऐसा नहीं है. यहां लगभग 20 महिलाएं और लड़कियां प्रतिदिन पाठ में बैठती हैं. वे शुद्ध उच्चारण के साथ सप्तशती का पाठ करती हैं.
गांव की लड़कियां कहती हैं कि उन्होंने यह पाठ अपने घर के बड़े-बुजुर्गों से सीखा है. अब वे इसे आगे बढ़ा रही हैं. यह नारी शक्ति की उपासना का सबसे सुंदर उदाहरण है. जहां देवी की पूजा में महिलाएं ही सबसे आगे हैं.
देवी की पूजा तो सदियों से देशभर में होती रही है. लेकिन कुछ मंदिरों को वहां की विशिष्ट परंपराएं अलग कर देती हैं. बनगांव में भी अहर्निश सप्तशती पाठ और उसमें शामिल आधी महिलाएं नवरात्र को विशिष्ट बना देती हैं.
बनगांव का यह भगवती मंदिर आस्था, परंपरा और नारी शक्ति का एक जीवंत प्रतीक बन गया है.
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