- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा, सपा और कांग्रेस गठबंधन के बीच सीट बंटवारे को लेकर मंथन जारी है
- निषाद पार्टी और सुभासपा भाजपा पर आरक्षण की मांग लेकर दबाव बनाने की कोशिश कर रही हैं
- भाजपा के आंतरिक सर्वे में लगभग 40 प्रतिशत विधायकों के टिकट काटे जाने की संभावना सामने आई है
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुछ महीनों का ही वक्त बचा है. त्योहारी सीजन खत्म होते ही उत्तर प्रदेश में चुनावी मौसम की शुरुआत हो जाएगी. भाजपा की ओर से पीएम नरेंद्र मोदी, होम मिनिस्टर अमित शाह और पार्टी के तमाम नेताओं के दौरे शुरू हो जाएंगे तो वहीं सपा और कांग्रेस गठबंधन सीट बंटवारे पर अभी से मंथन में जुटा है. विपक्षी गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर रस्साकशी का दौर जारी है. सत्ता पक्ष के साथ चल रहे निषाद पार्टी और ओपी राजभर की सुभासपा भी अब तेवर दिखा रहे हैं. दोनों ही अपने समाज के लिए आरक्षण की मांग करते हुए भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश में हैं. इसके अलावा पश्चिम यूपी में जयंत चौधरी की रालोद की डिमांड भी देखने वाली होगी.
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा बीते 10 सालों से यूपी की सत्ता में है. ऐसे में एंटी-इनकम्बैंसी भी होगी और आपसी समीकरण भी साधने का दबाव रहेगा. भाजपा और संघ के आंतरिक सर्वे में विधायकों के खिलाफ नाराजगी की बात सामने आई है. इसके अलावा संगठन महामंत्री बीएल संतोष और राज्य के प्रभारी विनोद तावड़े जैसे नेताओं से व्यक्तिगत मुलाकातों में नेता और कार्यकर्ता पुलिस थाने और प्रशासन में सुनवाई न होने की शिकायतें कर रहे हैं. इस तरह कुछ विधायकों से नाराजगी और प्रशासन में सुनवाई न होने वाली शिकायत भाजपा के लिए एक चुनौती है. अब सवाल यह है कि इनसे वह कैसे निपटेगी.
अब तक इसकी कोशिशों की बात करें तो भाजपा के दिल्ली से आए नेता लगातार कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं. उन्हें अपनी बात या पीड़ा कहने का मौका दिया जा रहा है. इसके अलावा खबर है कि करीब 40 फीसदी विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं. इस तरह भाजपा कार्यकर्ता और जनता के बीच पसरी नाराजगी को दूर करने की कोशिश करेगी. यदि यह उसकी कमजोरी है तो एक ताकत भी है, जिसे विपक्ष नजरअंदाज नहीं कर सकता. यह ताकत है योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और कानून-व्यवस्था के मामले में जनता के बीच धारणा बनना कि इस सरकार के दौर में अपराधियों पर सख्ती है.
कल्याण सिंह और मायावती भी हुए थे कानून व्यवस्था के लिए लोकप्रिय
यूपी जैसे बड़े राज्य में कानून व्यवस्था हमेशा ही बड़ा मसला थी. कल्याण सिंह और मायावती जैसे मुख्यमंत्री आज भी सख्त प्रशासक होने के लिए जाने जाते हैं. योगी आदित्यनाथ भी खासे लोकप्रिय हुए हैं. हालांकि चिंता इस बात की भी होगी कि यूजीसी जैसे मसले से नाराज भाजपा के सवर्ण वोटर कितना राजी होते हैं. भाजपा सूत्रों का कहना है कि यह मामला केंद्र से जुड़ा है. इसलिए शायद यूपी में सवर्ण वोटिंग वाले दिन तक शायद योगी के पक्ष में आ जाएं. फिर राज्यसभा में दो ब्राह्मण और एक राजपूत नेता को भेजकर संकेत देने की कोशिश हुई है. चर्चा यह भी है कि EWS कोटे की इनकम लिमिट में सुधार करके भी लुभाने का प्रयास हो सकता है. इस तरह भाजपा के सामने कुछ चुनौतियां हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ का चेहरा और सामाजिक समीकरण वाली एसेट अब भी उसके पक्ष में है.
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