भोपाल:
मध्यप्रदेश में भाजपा के आठ साल के शासन काल में जहां 10 हजार आठ सौ से अधिक किसानों ने विभिन्न कारणों के चलते आत्महत्या की है वहीं किसानों की आत्महत्या के मामले में यह राज्य देश में चौथे नंबर पर पहुंच गया है।
अधिकारिक सूत्रों ने राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से बताया कि प्रदेश में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की मुख्य वजह आर्थिक तंगी, कर्ज और पारिवारिक रही है।
राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 में प्रतिदिन औसतन तीन से अधिक किसानों ने मौत को गले लगाया और विभिन्न कारणों से कुल 1326 किसानों ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया है।
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2004 से वर्ष 2011 के आठ साल के बीच 10861 किसानों ने मौत को गले लगाया।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में जिन 1326 किसानों ने मौत को गले लगाया उनके कारण अलग अलग रहे हैं। इस दौरान जिन किसानों ने आत्महत्या की है उनमें 347 ने पारिवारिक कारणों से, 16 ने आर्थिक कारणों से, 326 ने शारीरिक व मानसिक बीमारी के चलते, 120 ने नशे में और 508 ने अन्य कारणों से खुदकुशी की है।
भाजपा समर्थित भारतीय किसान संघ के पूर्व अध्यक्ष तथा किसान मजदूर प्रजा पार्टी के संस्थापक शिवकुमार शर्मा का मानना है कि किसानों की आत्महत्या की मुख्य वजह है कि किसानों के लिये खेती अब, लाभ का धंधा तो दूर लागत निकाल पाने लायक भी नहीं रह गयी है। शर्मा ने भाषा से बातचीत में कहा कि जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से संबद्ध होशंगाबाद के पवारखेडा कृषि अनुसंधान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिकों ने भी माना है कि किसान के एक क्विंटल गेहूं का लागत मूल्य साढे छह हजार रुपये आता है जबकि उसका गेहूं 13-14 सौ रुपये प्रति क्विंटल ही बिक पाता है। उन्होने कहा कि सरकार समर्थन मूल्य घोषित करते समय किसान के श्रम को जोडकर नहीं देखती। शर्मा ने किसानों की दयनीय स्थिति के लिये मध्यप्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि यहां मंडी कानून में परिवर्तन ही भ्रष्टाचार की सबसे बडी जड है। उन्होने कहा कि पूर्व में जहां किसान मंडी अध्यक्ष का चुनाव करते थे वही अब सरकार ने इस कानून में बदलाव कर दिया है और अब उसके सदस्य ही अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। उन्होने कहा कि जब अध्यक्ष ही पांच दस करोड रुपये खर्च कर चुनाव जीतेगा तो वह इस राशि को कहीं से तो निकालेगा।
शर्मा ने कहा कि इसी के चलते म.प्र. की मंडियों में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि गंजबसौदा मंडी में तुअर दाल 2200 से 2800 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है जबकि उसका समर्थन मूल्य 3500 रुपये प्रति क्विंटल है और उडद की भी यही हालत है।
उन्होने कहा कि यदि किसानों को आत्महत्या से बचाना है तो सबसे पहले खेती की लागत कम करना होगा तथा ऐसे कदम उठाने होंगे जैसे केरल, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और गुजरात की सरकारें उठा रहीं हैं। उन्होने कहा कि केरल और कर्नाटक में किसानों का मुफ्त बिजली दी जा रही है जबकि आंध्रप्रदेश में उनसे नाम मात्र का शुल्क लिया जाता है।
अधिकारिक सूत्रों ने राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से बताया कि प्रदेश में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की मुख्य वजह आर्थिक तंगी, कर्ज और पारिवारिक रही है।
राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 में प्रतिदिन औसतन तीन से अधिक किसानों ने मौत को गले लगाया और विभिन्न कारणों से कुल 1326 किसानों ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया है।
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2004 से वर्ष 2011 के आठ साल के बीच 10861 किसानों ने मौत को गले लगाया।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में जिन 1326 किसानों ने मौत को गले लगाया उनके कारण अलग अलग रहे हैं। इस दौरान जिन किसानों ने आत्महत्या की है उनमें 347 ने पारिवारिक कारणों से, 16 ने आर्थिक कारणों से, 326 ने शारीरिक व मानसिक बीमारी के चलते, 120 ने नशे में और 508 ने अन्य कारणों से खुदकुशी की है।
भाजपा समर्थित भारतीय किसान संघ के पूर्व अध्यक्ष तथा किसान मजदूर प्रजा पार्टी के संस्थापक शिवकुमार शर्मा का मानना है कि किसानों की आत्महत्या की मुख्य वजह है कि किसानों के लिये खेती अब, लाभ का धंधा तो दूर लागत निकाल पाने लायक भी नहीं रह गयी है। शर्मा ने भाषा से बातचीत में कहा कि जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से संबद्ध होशंगाबाद के पवारखेडा कृषि अनुसंधान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिकों ने भी माना है कि किसान के एक क्विंटल गेहूं का लागत मूल्य साढे छह हजार रुपये आता है जबकि उसका गेहूं 13-14 सौ रुपये प्रति क्विंटल ही बिक पाता है। उन्होने कहा कि सरकार समर्थन मूल्य घोषित करते समय किसान के श्रम को जोडकर नहीं देखती। शर्मा ने किसानों की दयनीय स्थिति के लिये मध्यप्रदेश सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि यहां मंडी कानून में परिवर्तन ही भ्रष्टाचार की सबसे बडी जड है। उन्होने कहा कि पूर्व में जहां किसान मंडी अध्यक्ष का चुनाव करते थे वही अब सरकार ने इस कानून में बदलाव कर दिया है और अब उसके सदस्य ही अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। उन्होने कहा कि जब अध्यक्ष ही पांच दस करोड रुपये खर्च कर चुनाव जीतेगा तो वह इस राशि को कहीं से तो निकालेगा।
शर्मा ने कहा कि इसी के चलते म.प्र. की मंडियों में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि गंजबसौदा मंडी में तुअर दाल 2200 से 2800 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है जबकि उसका समर्थन मूल्य 3500 रुपये प्रति क्विंटल है और उडद की भी यही हालत है।
उन्होने कहा कि यदि किसानों को आत्महत्या से बचाना है तो सबसे पहले खेती की लागत कम करना होगा तथा ऐसे कदम उठाने होंगे जैसे केरल, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और गुजरात की सरकारें उठा रहीं हैं। उन्होने कहा कि केरल और कर्नाटक में किसानों का मुफ्त बिजली दी जा रही है जबकि आंध्रप्रदेश में उनसे नाम मात्र का शुल्क लिया जाता है।
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