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मां ज्वालामुखी मंदिर, जहां गिरी थी माता सती की जिह्वा, जानें शक्तिपीठ की पौराणिक कथा

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित मां ज्वालामुखी मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. मान्यता है कि यहां माता सती की जिह्वा गिरी थी और आज भी देवी ज्योति के रूप में विराजमान हैं.

मां ज्वालामुखी मंदिर, जहां गिरी थी माता सती की जिह्वा, जानें शक्तिपीठ की पौराणिक कथा
मां ज्वालामुखी मंदिर

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की कालीधार पहाड़ियों में स्थित मां ज्वालामुखी मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि यहां प्राकृतिक ज्योतियों के रूप में माता के दर्शन होते हैं. मान्यता है कि ये दिव्य ज्वालाएं स्वयं मां ज्वाला का स्वरूप हैं, जो सदियों से प्रज्वलित हैं. इसी चमत्कारी स्वरूप के कारण यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों से अलग और विशेष स्थान रखता है.

दक्ष यज्ञ और सती का आत्मदाह

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन भगवान शिव और माता सती को नहीं बुलाया गया. जब माता सती को इस बात का पता चला तो वे बिना निमंत्रण के अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गईं. वहां उन्होंने भगवान शिव का अपमान होते देखा. पति के इस अपमान को वह सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने यज्ञ स्थल पर ही योगाग्नि द्वारा अपने प्राण त्याग दिए.

भगवान शिव का क्रोध और शक्तिपीठों की उत्पत्ति

माता सती के आत्मदाह का सूचना मिलते ही भगवान शिव को अत्यंत क्रोध आया. उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र और महाकाली को उत्पन्न कर यज्ञ को नष्ट करने और दक्ष का वध करने का आदेश दिया. इसके बाद भगवान शिव सती के जले हुए शरीर को उठाकर तांडव करने लगे. उनके क्रोध से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया. तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को अलग-अलग कर दिया. जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई.

यहां गिरी थी माता सती की जिह्वा

मान्यता है कि कालीधार की पहाड़ियों पर माता सती की जिह्वा गिरी थी. जिह्वा गिरने के स्थान पर एक विशाल ज्योतिपुंज प्रकट हुआ, जिसे देवी शक्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया. यही स्थान आगे चलकर मां ज्वालामुखी शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ. यहां आज भी ज्योति के रूप में माता की पूजा की जाती है.

राजा भूमिचंद्र ने करवाया था मंदिर का निर्माण

कहा जाता है कि इस दिव्य ज्योति के दर्शन सबसे पहले राजा भूमिचंद्र को हुए थे. उन्होंने इस पवित्र स्थल पर मंदिर का निर्माण करवाया और पूजा-अर्चना एवं दान-दक्षिणा का अधिकार भोजक वंश को सौंपा. वर्तमान में मंदिर का प्रबंधन सरकारी व्यवस्था के अंतर्गत होता है, लेकिन परंपरा के अनुसार आज भी भोजक वंश के लोग ही यहां पूजा-पाठ का कार्य करते हैं. माता ज्वालामुखी का यह मंदिर श्रद्धा, इतिहास और आस्था का अद्भुत संगम माना जाता है.

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