वृंदावन में संत प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण की मौत के बाद गुरु-शिष्य परंपरा और दीक्षा को लेकर भी चर्चा हो रही है. धार्मिक मान्यताओं में गुरु को जीवन का मार्गदर्शक माना गया है. ऐसे में सवाल उठता है कि गुरु दीक्षा किस उम्र में लेनी चाहिए और किसी को गुरु बनाने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए. आचार्य मदन मोहन ने बताया कि गुरु चुनने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए.
माता-पिता होते हैं जीवन के पहले गुरु
आचार्य मदन मोहन ने बताया कि जन्म के बाद माता-पिता ही व्यक्ति के प्रथम गुरु माने जाते हैं. जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है और उसे सांसारिक जीवन के साथ आध्यात्मिक विषयों की समझ आने लगती है. वह आध्यात्मिक गुरु की तलाश करता है. धार्मिक परंपरा में गुरु को ऐसा मार्गदर्शक माना गया है, जो व्यक्ति को सही दिशा दिखाने में मदद करता है.
गुरु बनाने से पहले परखना जरूरी
आचार्य के अनुसार, गुरु बनाने से पहले व्यक्ति को कुछ समय गुरु की सेवा, उनके विचार और उनकी जीवनशैली को समझना चाहिए. केवल किसी के प्रसिद्ध होने या बड़ी संख्या में अनुयायी होने के आधार पर गुरु नहीं बनाना चाहिए. ऐसे में कहा जाता है कि "पानी पियो छान के, गुरु बनाओ जान के". उनके अनुसार, गुरु भी शिष्य की योग्यता और उसकी श्रद्धा को देखते हैं. इसके बााद ही मंत्र दीक्षा की परंपरा आगे बढ़ती है. इसलिए दीक्षा को केवल धार्मिक रस्म न मानकर जिम्मेदारी के रूप में समझना चाहिए.
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दीक्षा के बाद इन बातों का रखें ध्यान
आचार्य मदन मोहन ने आगे बताया कि गुरु मंत्र लेने के बाद नियमित रूप से उसका जाप करना चाहिए. सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर गुरु मंत्र का जाप और गुरु का स्मरण करने की परंपरा बतााई गई है. शिष्य को सत्य बोलने, सकारात्मक सोच रखने और गुरु के प्रति सम्मान बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए.
तीर्थ और आश्रम जाने से पहले भी रखें सावधानी
धार्मिक यात्रा के दौरान किसी आश्रम या संत के संपर्क में आने पर तुरंत दीक्षा लेने के बजाय पहले उनके विचाार और परंपरा को समझना बेहतर है. आचार्य के अनुसार, गुरु-शिष्य संबंध लंबे समय की आध्यात्मिक जिम्मेदारी है. इसलिए भावनाओं में आकर फैसला नहीं करना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि केवल मंच या माइक से मंत्र देने वाले लोगों से सावधान रहनाा चाहिए और गुरु परंपरा की प्रामाणिकता को समझना जरूरी है.
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