Padma Shri DY Patil Passes Away: देश के जाने-माने शिक्षाविद, समाजसेवी और पूर्व राज्यपाल पद्मश्री डॉ. डी.वाई. पाटिल का आज निधन हो गया. आज भारतीय शिक्षा जगत ने एक ऐसी शख्सियत को खो दिया, जिसने लाखों छात्रों के भविष्य को नई दिशा दी. यही नहीं डॉ. पाटिल के शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए किए गए कार्यों को लंबे समय तक याद रखा जाएगा. आज के इस आर्टिकल में हम समाजसेवी से लेकर राज्यपाल बनने तक सफर डी.वाई पाटिल का कैसा रहा, आइए एक नजर उस पर डालते हैं.
किसान परिवार में हुआ जन्म
डॉ. ज्ञानदेव यशवंतराव पाटिल का जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में 22 अक्टूबर 1935 को एक किसान परिवार में हुआ. डी.वाई पाटिल का बचपन से ही रुझान शिक्षा और जनसेवा के प्रति था.
लॉ की डिग्री
बता दें कि डॉ. पाटिल ने राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर से ग्रेज्युएशन की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद शिवाजी विश्वविद्यालय से फर्स्ट डिवीजन के साथ लॉ की डिग्री हासिल की.
जनसेवा से शूरू किया सफर
डॉ. पाटिल ने अपने करियर की शुरुआत जमीनी स्तर की राजनीति और जनसेवा से की. साल 1957 में वे कोल्हापुर नगर परिषद के सदस्य चुने गए. इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा में पन्हाला क्षेत्र से विधायक बने. लेकिन उनकी असली पहचान शिक्षा क्रांति के सूत्रधार के रूप में बनी.
उन्होंने डी.वाई. पाटिल ग्रुप की स्थापना की, जो समय के साथ देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में शामिल हो गया. इस समूह के अंतर्गत स्कूल, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटी और अस्पताल बनाए गए. इन संस्थानों ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि देश के कई हिस्सों के स्टूडेंट्स को बेहतर शिक्षा और प्रोफेशनल अवसर उपलब्ध कराए. यही नहीं डी.वाई पाटिल का चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने में में विशेष योगदान दिया.
राज्यपाल भी रहे
बता दें कि इनकी सार्वजनिक जीवन में भूमिका केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रही. त्रिपुरा के राज्यपाल के रूप में सेवा दी. इसके बाद बिहार के राज्यपाल (2013-2014) भी रहे. इसके अलावा उन्हें 2014 में कुछ समय के लिए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था.
1991 में मिला पद्मश्री
शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1991 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा. डॉ. डी.वाई. पाटिल को केवल संस्थानों के संस्थापक के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम माना. उनके प्रयासों से तैयार हुए हजारों डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधन विशेषज्ञ और अन्य पेशेवर आज देश और दुनिया में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
उनका निधन शिक्षा और समाज सेवा की दुनिया के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है, लेकिन उनके द्वारा स्थापित संस्थान और उनके विचार आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे.
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