Jaipal Singh Munda: रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम इन दिनों JPSC-JSSC छात्र आंदोलन की वजह से लगातार चर्चा में है. भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्र यहां डटे हैं और अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस जयपाल सिंह मुंडा के नाम पर बने स्टेडियम में ये पूरा आंदोलन चल रहा है, वह कौन थे. इस विरोध-प्रदर्शन के बीच उनका नाम क्यों चर्चा में है और उन्हें शिबू सोरेन से भी बड़ा और महान आदिवासी नेता क्यों माना जाता है. आइए जानते हैं इस आदिवासी नेता की कहानी.
जयपाल सिंह मुंडा कौन थे
जयपाल सिंह मुंडा सिर्फ एक आदिवासी नेता नहीं थे. वह एक शानदार हॉकी खिलाड़ी, 1928 की ओलंपिक गोल्ड जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के कप्तान, संविधान सभा के सदस्य और आदिवासी अधिकारों की मजबूत आवाज थे. उन्होंने पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड तक का सफर तय किया और बाद में राजनीति में उतरकर आदिवासियों के लिए अलग पहचान और अधिकार की लड़ाई लड़ी.
खूंटी के छोटे से गांव से ऑक्सफोर्ड तक का सफर
जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को तत्कालीन रांची जिले के खूंटी इलाके में एक मुंडा आदिवासी परिवार में हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई रांची के सेंट पॉल स्कूल में हुई. बचपन से ही पढ़ाई के साथ खेल में भी उनकी खास दिलचस्पी थी. उनके टैलेंट को मिशनरियों ने पहचाना और आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें इंग्लैंड जाने का मौका मिला. वहां उन्होंने सेंट जॉन्स कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई की. बाद में उन्होंने ऑक्सफोर्ड से फिलॉसफी, पॉलिटिक्स और इकोनॉमिक्स की पढ़ाई पूरी की.
पढ़ाई के साथ हॉकी में भी बनाया बड़ा नाम
जयपाल सिंह मुंडा पढ़ाई में अच्छे होने के साथ-साथ हॉकी के भी शानदार खिलाड़ी थे. ऑक्सफोर्ड में उन्होंने यूनिवर्सिटी की हॉकी टीम के लिए खेला. उनके खेल से प्रभावित होकर उन्हें 'ऑक्सफोर्ड ब्लू' (Oxford Blue) सम्मान मिला. संविधान ऑफ इंडिया की जीवनी के मुताबिक, वह हॉकी में यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय छात्र थे.उस समय किसी भारतीय छात्र के लिए ऑक्सफोर्ड में पढ़ना और साथ ही यूनिवर्सिटी स्तर पर हॉकी में पहचान बनाना बहुत बड़ी बात थी.
भारत को ओलंपिक का पहला गोल्ड दिलाने वाली टीम के कप्तान
जयपाल सिंह मुंडा का नाम भारतीय खेल इतिहास में भी बेहद खास है. 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में उन्होंने भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की थी. भारतीय टीम ने उस ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता और यह भारत का पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक था. संसद के रिकॉर्ड में भी जयपाल सिंह को 1928 की भारतीय ओलंपिक हॉकी टीम का कप्तान और 'ऑक्सफोर्ड ब्लू' बताया गया है. हालांकि, जयपाल सिंह टीम के कप्तान थे, लेकिन वह टूर्नामेंट के आखिरी मुकाबलों में टीम के साथ नहीं रहे और फाइनल भी नहीं खेल पाए.
हॉकी छोड़ आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में उतरे
भारत लौटने के बाद उनका ध्यान आदिवासी समाज की समस्याओं पर गया. उन्होंने महसूस किया कि आदिवासी समुदाय की आवाज राजनीति और प्रशासन में उतनी मजबूती से नहीं पहुंच रही थी, जितनी जरूरत थी. इसी सोच के साथ उन्होंने आदिवासी महासभा के जरिए आदिवासी समाज को एक राजनीतिक मंच देने की कोशिश की. बाद में यही संगठन आगे चलकर झारखंड पार्टी के रूप में सामने आया. उनकी राजनीति का बड़ा मुद्दा आदिवासियों को अपनी जमीन, पहचान, शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी और अधिकारों के लिए मजबूत आवाज मिलना था.
संविधान सभा में भी उठाई आदिवासियों की आवाज
जयपाल सिंह मुंडा की भूमिका आजादी के बाद और भी बड़ी हो गई. वह संविधान सभा के सदस्य थे. संविधान सभा में उन्होंने आदिवासी समाज की समस्याओं और उनके अधिकारों को लेकर कई बार अपनी बात रखी. उनके भाषणों में बार-बार यह चिंता दिखाई देती है कि देश के आदिवासी समुदाय को लोकतंत्र में बराबर की जगह और राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. उन्होंने आदिवासियों के लिए आरक्षण और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों को भी मजबूती से उठाया.
अलग झारखंड की मांग से भी जुड़ा था नाम
आज का झारखंड 2000 में बिहार से अलग होकर नया राज्य बना, लेकिन अलग झारखंड की राजनीतिक मांग इससे कई दशक पहले उठ चुकी थी. जयपाल सिंह मुंडा इस आंदोलन के शुरुआती बड़े चेहरों में शामिल थे. उनकी झारखंड पार्टी ने अलग झारखंड की मांग को राजनीतिक मंच पर मजबूती से रखा. पार्टी ने 1952 के चुनाव में बिहार विधानसभा की 33 सीटों पर जीत दर्ज की थी. बाद में 1963 में झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया, लेकिन अलग राज्य और आदिवासी पहचान से जुड़ी उनकी राजनीति का असर लंबे समय तक बना रहा.
लगातार चार बार सांसद बने
जयपाल सिंह मुंडा 1951 से 1967 तक लगातार चार बार लोकसभा के लिए चुने गए. संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में उन्हें रांची पश्चिम से झारखंड पार्टी के सांसद के तौर पर दर्ज किया गया है. बाद में 1963 में झारखंड पार्टी के कांग्रेस में विलय के बाद उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर भी चुनाव जीता.
ये भी पढ़ें - किताबों की कमी और परीक्षा के बदलते पैटर्न ने बढ़ाया बच्चों का तनाव, संसदीय समिति ने जताई चिंता
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं