Finland Education System: जब भारत में पढ़ाई और कॉम्पटिशन को लेकर हर जगह प्रेशर ही प्रेशर दिखाई दे रहा है, तब एक देश ऐसा भी है, जहां बच्चे 7 साल की उम्र तक स्कूल जाते ही नहीं. 16 साल तक कोई बड़ा एग्जाम नहीं, रिजल्ट का कोई प्रेशर नहीं, न मार्क्स की रेस और ना ही रैंक की कोई टेंशन रहती है. सुनकर लगता है जैसे ये किसी कहानी की बात हो रही है, लेकिन ये हकीकत है और इस देश का नाम फिनलैंड है. इस देश में 16 साल की उम्र तक बच्चों का कोई स्टैंडर्डाइज्ड बोर्ड एग्जाम नहीं होता, कोई ग्रेडिंग का प्रेशर नहीं होता है, फिर भी ग्लोबल रैंकिंग में वहां का एजुकेशन सिस्टम हमेशा टॉप पर रहता है. आखिर कैसे बिना किसी रेस के यह देश पढ़ाई के मामले में पूरी दुनिया को रास्ता दिखा रहा है. आइए जानते हैं इसका एजुकेशन सिस्टम.
फिनलैंड का एजुकेशन सिस्टम कैसा हैऐसा नहीं है कि फिनलैंड का सिस्टम हमेशा से ऐसा ही था. साल 1970 के दशक में फिनलैंड ने महसूस किया कि उनका पुराना तरीका बच्चों की ग्रोथ नहीं कर पा रहा है. इसके बाद उन्होंने अपने पूरे एजुकेशन मॉडल को बिल्कुल नए सिरे से डिजाइन किया. उन्होंने तय किया कि बच्चों को परफॉर्मर या रोबोट नहीं बनाना है. इस नए सिस्टम में उन्होंने तीन चीजों को सबसे ऊपर रखा. कॉम्पिटिशन से पहले कॉन्फिडेंस, रैंक से पहले क्यूरियॉसिटी और एग्जाम से पहले लर्निंग. इन्हीं तीनों चीजों पर उन्होंने काम किया और आज यह देश दुनिया में टॉप पर है.
फिनलैंड के स्कूल में ऐसा क्या होता है, जो इतना अलग हैकम एग्जाम, कम होमवर्क
बच्चों पर बार-बार टेस्ट का प्रेशर नहीं डाला जाता है. पढ़ाई का मतलब सिर्फ किताब याद करना नहीं है.
ज्यादा डिस्कशन, ज्यादा क्रिएटिविटी
क्लास में बच्चे सवाल पूछते हैं, बात करते हैं, अपना ओपिनियन रखते हैं, सिर्फ नोट्स कॉपी नहीं करते रहते हैं.
आउटडोर लर्निंग को बराबर जगह
पढ़ाई सिर्फ चार दीवारों के बीच बंद नहीं है. बाहर जाकर सीखना भी उतना ही जरूरी माना जाता है.
हर बच्चे को न्यूट्रिशस लंच बिल्कुल फ्री
स्कूल में सबको बिना किसी चार्ज के खाना मिलता है.
हर 45 मिनट के बाद एक ब्रेकफिनलैंड के स्कूलों की एक और दिलचस्प बात यह है कि वहां हर 45 मिनट की क्लास के बाद बच्चों को 15 मिनट का एक अनिवार्य (Mandatory) ब्रेक दिया जाता है. उनका मानना है कि लगातार पढ़ते रहने से दिमाग थक जाता है. इसके अलावा, वहां हर बच्चे को स्कूल में मुफ्त और न्यूट्रिशियस लंच मिलता है, ताकि सेहत और पढ़ाई दोनों का संतुलन बना रहे. वहां अमीर का बच्चा हो या गरीब का, सब एक ही जैसे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं क्योंकि वहां प्राइवेट स्कूलों का कल्चर न के बराबर है.
क्लासरूम से बाहर की सीखफिनलैंड का पूरा मॉडल एक ही सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है, क्या क्यूरियॉसिटी और क्रिएटिविटी को भी उतनी ही इंपॉर्टेंस मिलनी चाहिए, जितनी मार्क्स को मिलती है. क्योंकि आज की दुनिया को सिर्फ ऐसे लोग नहीं चाहिए जो परफॉर्म करें. आज की दुनिया को ऐसे लोग चाहिए जो इनोवेट करें, नया सोचें, नया बनाएं, और शायद यही वजह है कि फिनलैंड का एजुकेशन मॉडल दुनियाभर में इतनी बारीकी से स्टडी किया जाता है.
एग्जाम सिर्फ परफॉर्मर बना सकता हैफिनलैंड का एजुकेशन सिस्टम कहता है कि एजुकेशन का मकसद सिर्फ टॉपर्स बनाना नहीं है. मकसद है ऐसे इंसान बनाना जो सोच सकें, सवाल पूछ सकें और खुद कुछ नया बना सकें. प्रेशर और एग्जाम आपको शायद अच्छे नंबर दिला दें, लेकिन असली सोच, असली इनोवेशन वहां से आता है जहां बच्चे को सीखने की आजादी और मौका दोनों मिलते हैं.
भारत में ऐसा एजुकेशन सिस्टम क्यों नहींफिनलैंड के बारें में जानकर सबसे पहला सवाल यही आता है, क्या हमारे यहां भी ऐसा कुछ मुमकिन है. एजुकेशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि, भारत में बच्चों की संख्या, रिसोर्सेज और सिस्टम की चुनौतियां फिनलैंड से बिल्कुल अलग हैं. इसलिए सीधा कॉपी-पेस्ट मॉडल शायद काम न करे. लेकिन वहां से एक बात सीखी जा सकती है कि सीखने को सिर्फ नंबर लाने की रेस बनाने की बजाय, बच्चों में जिज्ञासा और सोचने की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा सकता है.
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