जंतर-मंतर गोल चक्कर से लेकर टॉलस्टाय मार्ग तक हजारों युवा प्रदर्शन करने के लिए इकट्ठा हुए हैं. ये युवा कौन हैं, कहां से आए हैं और यहां कहां रहते हैंय़ ndtv की टीम ने ये जानने की कोशिश की. इस दौरान हमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का एक ग्रुप मिला. इस ग्रुप में अश्विनी कुमार, विवेक कुमार, नसीम खान और जय सिंह मौजूद थे. अश्विनी कुमार SSC की तैयारी कर रहे हैं. पिता की मौत हो चुकी है और मां के पेंशन से गुजारा चलता है. अश्विनी बताते हैं कि SSC की परीक्षा में कोचिंग से लेकर आवेदन भरने तक में पैसा खर्च होता है. परीक्षा होती है वहां जाने में खर्चा लगता है. लेकिन SSC की परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो गया. लेखपाल की परीक्षा स्थगित हो जाती है. हम क्या करें. परीक्षा हो रही है तो परिणाम घोषित नहीं कर रहे हैं.
विवेक कुमार UPSC की तैयारी कर रहे हैं. वो कहते हैं कि ये लड़ाई एक परीक्षा की नहीं है, पूरे शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की जरुरत है. बगल में खड़े नसीम खान कहते हैं कि प्रधानमंत्री फास्ट ट्रैक अदालत बनाने की बात कह रहे हैं. तीन महीना बाद याद आया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाना है. इस आंदोलन की यही जीत है कि सरकार को पहली बार छात्रों की याद आई है.
20 जुलाई से जंतर-मंतर पर
20 जुलाई से ये ग्रुप जंतर-मंतर पर बना हुआ है. जय सिंह बताते हैं यहां खाने की कोई समस्या नहीं है. खाना जोमेटो या लोग लेकर आते हैं. सड़क पर बिछी लाल दरी दिखाते कहते हैं... यहीं सोते हैं. सुबह का वक्त है जंतर-मंतर पर वो युवा ज्यादा हैं जो बाहर से आए हैं और किसी न किसी परीक्षा की तैयारी या उनके परिजन जुड़े हुए हैं. इसी भीड़ में दिल्ली के राजेंद्र नगर से आए सुशील आहुजा आए हैं, जिनको लोग गिटार अंकल के नाम से पुकारते हैं. वो गिटार से दुष्यंत कुमार की शायर गाकर छात्रों का उत्साह बढ़ा रहे हैं. राजेंद्र आहूजा छात्रों के लिए फ्री लाइब्रेरी चलाते हैं. वो कहते हैं कि मेरे कोई बच्चे नहीं है तो ये छात्र ही मेरे बच्चे हैं इनको समर्थन देने के लिए आया हूं.
शिक्षा में बदलाव की लड़ाई
जंतर-मंतर पर उत्तर प्रदेश के उन्नाव से आया एक ग्रुप भी बैठा है. इस ग्रुप को दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले संगम सिंह हैं. संगम सिंह कॉकरोच जनता पार्टी के वॉलंटियर हैं. उनके दोस्त उन्नाव से आए हैं. वो कहते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय बंद है, 26 जुलाई से खुलेगा, इसलिए वो यहां करीब 20 दिन से हैं. संगम अपने बगल बैठे छात्र की ओर इशारा करके बताते हैं कि ये इलाहाबाद विश्वविद्यालय पढ़ता है, वहां फीस तीन हजार है लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज की फीस 26000 हजार है. हॉस्टल का 85000 रुपए हैं. हमारे जैसे किसानों के बच्चे क्या इतनी फीस दे सकते हैं. ये लड़ाई शिक्षा में बदलाव की है, इसे सरकार को गंभीरता से लेना पड़ेगा.
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